नेता जी की 'जनता सेवा' (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ | Mar 26, 2025

चुनावी मौसम आ चुका था, और मोहल्ले के नुक्कड़ से लेकर चाय की दुकानों तक सिर्फ़ एक ही चर्चा थी—इस बार असली जनसेवक मिलेगा! नेता जी ने मंच से गरजते हुए ऐलान किया, "हम जनता की सेवा के लिए ही राजनीति में आए हैं!" भीड़ में तालियाँ गूंज उठीं, नारे बुलंद हो गए। लेकिन मोहल्ले के अनुभवी काका जी मुस्कराते हुए बोले, "अरे! इनकी सेवा से तो जनता ही सेवा मांगने लगेगी!" कुछ लोगों ने उनकी बात पर हंसी उड़ाई, मगर पुराने लोग जानते थे कि चुनावी वादों की उम्र दीवाली के दिये से भी कम होती है।  

इसे भी पढ़ें: खुश रहने की वजह (व्यंग्य)

सेवा की असली परिभाषा

चुनाव जीतने के लिए नेता जी ने जनता के हर सुख-दुःख को अपना बना लिया। मोहल्ले में किसी का बेटा बीमार पड़ा तो नेता जी वहाँ पहुंच गए। किसी की बेटी की शादी थी तो वरमाला पकड़ने खुद मंच पर दिखे। जनता ने पहली बार खुद को खास महसूस किया। ऐसा लगा कि कोई अपना आदमी सत्ता में आ रहा है।  

वोटिंग का दिन आया। मोहल्ले में हर किसी ने बढ़-चढ़कर वोट डाला। बुजुर्गों ने कहा, "अबकी बार अच्छे दिन आएंगे!" युवाओं ने जोश में कहा, "अब कुछ बदलेगा!" और परिणाम आया—नेता जी प्रचंड बहुमत से जीत गए। मोहल्ले में ढोल-नगाड़े बजे, मिठाइयाँ बंटी। नेता जी ने मुस्कुराते हुए कहा, "अब असली काम शुरू होगा।"  

लेकिन जनता यह नहीं जानती थी कि असली काम किसका होगा! जीत के कुछ दिनों तक नेता जी नज़र आए, फिर धीरे-धीरे उनकी व्यस्तता बढ़ गई। अब वे जनता की सेवा कम, अपनी सेवा ज़्यादा करने लगे। नई गाड़ी खरीदी गई, आलीशान बंगले का इंटीरियर बदला गया, महंगे सूट सिलवाए गए। जनता की परेशानियाँ तो वहीं की वहीं रह गईं, मगर सोशल मीडिया पर उनकी ‘जनसेवा’ तेज़ हो गई।  

अब नेता जी अख़बारों में दिखते—कभी गरीब को कंबल ओढ़ाते, कभी किसी अस्पताल का उद्घाटन करते। मोहल्ले के लोग इंतज़ार करते रहे कि कब उनकी टूटी सड़कें बनेंगी, कब पानी आएगा, कब अंधेरे में डूबी गलियों में रोशनी होगी। पर नेता जी का काफिला तो अब बड़े नेताओं की रैलियों में दौड़ रहा था।  

काका जी ने एक दिन ठहाका मारते हुए कहा, "देखो, नेताजी ने सेवा का वादा पूरा कर दिया! फर्क बस इतना है कि जनता को छोड़कर बाकी सबकी सेवा कर दी!" मोहल्ले के लोग चुप थे, लेकिन मन ही मन उनकी बात सही लगी। जब नेता जी पहली बार इलाके से गुज़रे, तो उनका काफिला धूल उड़ाते निकल गया। गाड़ी का शीशा बंद था। काका जी ने मज़ाक में कहा, "अब नेताजी हमें पहचानेंगे भी नहीं!" और सच में, पहचानने का तो सवाल ही नहीं था—नेता जी के लिए जनता अब सिर्फ़ एक नंबर थी, जिसे अगले चुनाव में फिर से जोड़ा जाना था।  

गली में वही टूटी सड़कें थीं, लेकिन नेता जी का बंगला संगमरमर से सज चुका था। बिजली अभी भी आँख-मिचौली खेलती थी, लेकिन उनके ड्राइंग रूम में महंगे झूमर जगमगा रहे थे। जनता के घरों में आज भी सीलन थी, मगर नेता जी का घर इटालियन मार्बल से चमक रहा था।  

समय बीता, फिर से चुनावी बयार आई। नेता जी फिर से मोहल्ले में लौटे, वही मीठे वादे, वही मीठी मुस्कान। जनता भी दिलचस्प थी—"शायद इस बार कुछ बदले!" लेकिन काका जी मुस्कराते हुए बोले, "अरे भई, जनता भी तो हर बार नई उम्मीदों के साथ सेवा करवाने के लिए तैयार बैठी होती है!"  

और सच में, जनता फिर तैयार थी—एक बार फिर चुनावी रणभूमि में, एक बार फिर वादों के झांसे में, और एक बार फिर अपनी सेवा करवाने के लिए!

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’,

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

प्रमुख खबरें

Prahlad Joshi ने NTA को दिया युद्ध स्तर पर Exam सुधार का आदेश, 50 कर्मचारी बर्खास्त

Delhi Excise Policy: HC ने Kejriwal, Sisodia को CBI की नई दलीलों पर दिया 4 हफ्ते का समय

Piyush Goyal को BJP में बड़ी जिम्मेदारी, क्या Modi Cabinet में अब होगा फेरबदल?

Galle Test: India ने Sri Lanka को समेटा, 178 रनों की विशाल बढ़त हासिल; जीत की तरफ कदम!