New Zealand Election: त्रिशंकु स्थिति के बीच Christopher Luxon संभालेंगे कार्यवाहक सरकार

By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Nov 08, 2026

(ग्रांट डंकन, ऑकलैंड विश्वविद्यालय) ऑकलैंड, आठ नवंबर (द कन्वरसेशन) न्यूजीलैंड के चुनाव के प्रारंभिक नतीजों से काफी अनिश्चितता पैदा हुई है, जिससे कई मतदाता निराश महसूस कर सकते हैं। हालांकि, राहत की बात यह है कि इस अनिश्चितता के दौर में राजनीतिक दलों और सरकार के कामकाज की प्रक्रिया के लिए दिशानिर्देश तय हैं। अंतिम नतीजे, जिनमें बड़ी संख्या में विशेष मत भी शामिल होंगे, 27 नवंबर तक घोषित नहीं होंगे।

इसके बाद किसी व्यवहार्य गठबंधन समझौते पर पहुंचने के लिए राजनीतिक दलों के बीच कई सप्ताह तक बातचीत चलेगी। अब इस दौरान कार्यवाहक सरकार से जुड़े नियमों और ‘कैबिनेट मैनुअल’ के दिशानिर्देशों की भूमिका अहम हो जाती है। ‘कैबिनेट मैनुअल’ को ‘केंद्र सरकार के निर्णय लेने की प्रक्रिया का आधिकारिक मार्गदर्शक’ माना जाता है।

आज की स्थिति में न तो वामपंथी और न ही दक्षिणपंथी खेमा कोई समझौता करने को तैयार है। विपक्षी नेता और लेबर पार्टी के क्रिस हिपकिंस ने चुनाव में हार स्वीकार नहीं की। हालांकि, वह जीत का दावा करने की स्थिति में भी नहीं थे।

निवर्तमान प्रधानमंत्री और नेशनल पार्टी के क्रिस्टोफर लक्सन ने कहा, ‘‘नेशनल पार्टी एक बार फिर संसद में सबसे बड़ी पार्टी है और हमारे पास अगली सरकार बनाने का रास्ता है।’’ व्यापक स्तर पर मतों के बंटवारे के कारण संसद में सीटों की संख्या में असंतुलन पैदा हुआ है। इसके चलते नेशनल पार्टी को लेबर पार्टी की तुलना में 3,650 वोट कम मिले हैं, लेकिन प्रारंभिक नतीजों में नेशनल पार्टी के पास 42 सीट हैं, जबकि लेबर पार्टी को 36 सीट मिली हैं। यह स्पष्ट रूप से उस आनुपातिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं है, जिसके लिए मिश्रित सदस्य आनुपातिक प्रणाली (एमएमपी) बनाई गई है।’’ हालांकि, सबसे अधिक सीट जीतने वाले दल का ही अगली सरकार बनाना जरूरी नहीं है।

ऐसा 2017 में भी देखने को मिला था, जब जैसिंडा अर्डर्न की लेबर पार्टी ने ‘न्यूजीलैंड फर्स्ट’ के समर्थन से सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत हासिल कर लिया था। प्रारंभिक नतीजों के अनुसार, लक्सन के तीन दलों के गठबंधन (नेशनल, एसीटी और न्यूजीलैंड फर्स्ट) को 131 में से 67 सीट मिली हैं, जिससे उसे मामूली बहुमत हासिल हुआ। हालांकि, विशेष मतों की गिनती के बाद यह संख्या घट सकती है।

ऐसे में हिपकिंस के पास अब भी चार दलों (लेबर, ग्रीन, ते पाती माओरी और ऑपर्च्युनिटी) के गठबंधन का नेतृत्व करने का मौका है। दोनों पक्षों का मूल उद्देश्य प्रतिनिधि सभा में बहुमत का आंकड़ा हासिल करना है। फिलहाल सवाल यह है कि उस गठबंधन का नेतृत्व कौन करेगा और उसमें कौन-कौन से दल शामिल होंगे।

कोई सरकार तभी तक सत्ता में रहती है, जब तक उसे सदन का विश्वास प्राप्त होता है। कार्यवाहक सरकार की परंपरा के तहत निवर्तमान प्रधानमंत्री लक्सन और उनके मंत्रिमंडल के मंत्री अपने पदों पर बने रहते हैं। यह कहना सही नहीं है कि ‘सरकार नहीं है’।

गवर्नर जनरल के पास हमेशा जिम्मेदार सलाहकार होने चाहिए और रोजमर्रा का प्रशासनिक कामकाज जारी रहना चाहिए। इस अवधि के दौरान महत्वपूर्ण फैसलों को टाल दिया जायेगा या उन पर बहुत सावधानी से विचार किया जायेगा। हालांकि, यदि कोई राष्ट्रीय आपात स्थिति पैदा होती है, तो ऐसी स्थिति में कार्यवाहक सरकार आवश्यकता के अनुसार कार्रवाई जरूर करेगी।

विशेष मतों का रुझान आमतौर पर वामपंथी दलों की ओर रहता है। ऐसे में अंतिम मतगणना के बाद एक या दो सीट पर नतीजे बदल सकते हैं। गवर्नर जनरल न तो गठबंधन वार्ता में मार्गदर्शन करते हैं और न ही उसमें भाग लेते हैं।

हालांकि, यह स्पष्ट हो जाने के बाद कि किन दलों को सदन का विश्वास प्राप्त है, वह नयी सरकार के मंत्रियों की नियुक्ति करते हैं। नये सिरे से चुनाव कराने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए। अब यह राजनीतिक दलों पर निर्भर है कि वे बहुमत जुटाएं।

कोई भी दल देश को दोबारा चुनाव में धकेलने के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहेगा। यदि अंतिम नतीजों के कारण लक्सन के मौजूदा गठबंधन के पास बहुमत नहीं रहता है, तो ज्यादातर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऑपर्च्युनिटी पार्टी की इसमें भूमिका हो सकती है। हालांकि, ऑपर्च्युनिटी पार्टी की नीतियां वामपंथी खेमे के तीनों दलों से अधिक मेल खाती हैं।

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