भीषण आग से अमेरिका ही नहीं, दुनिया सबक ले

By ललित गर्ग | Jan 14, 2025

अमेरिका के लॉस एंजेलिस में जंगल की बेकाबू आग फेलने, भारी तबाही, महाविनाश और भारी जन-धन की क्षति ने साबित किया है कि दुनिया की नंबर एक महाशक्ति भी कुदरत के रौद्र के सामने बौनी ही साबित हुई है। न केवल अमेरिका के इतिहास में बल्कि दुनिया के इतिहास यह जंगल की आग सबसे भयावह, सर्वाधिक विनाशकारी एवं डरावनी साबित हुई है। आग धीमी होने का नाम नहीं ले रही है। बल्कि और तेजी से बढ़ती जा रही है और इसका कारण 160 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली हवाएं हैं। ये हवाएं इस आग को और भड़का रही हैं, तबाही का मंजर बन रही है, जिसे रोकना अमेरिका प्रशासन के लिए एक चुनौती बन गया है। अमेरिकी सेना के सी-130 विमान और फायर हेलीकॉप्टर हर संभव कोशिश कर रहे हैं। लेकिन हवा की गति और आग की लपटों की ताकत के आगे दुनिया की सबसे बड़ी ताकत के तमाम प्रयास नाकाफी एवं बेबस साबित हो रहे हैं।

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दुनिया को सुरक्षा एवं विकास का आश्वासन देने वाला देश आज खुद अपनी रक्षा नहीं कर पा रहा है। वहां के आधुनिक तकनीक से लेस दमकल विभाग व सुरक्षा बलों की तमाम कोशिशों के बावजूद आग बेकाबू है। लोग असहाय होकर अपनी जीवन भर की पूंजी को स्वाह होते देख रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के चलते तल्ख होते मौसम से हालात और खराब होने की आशंका जतायी जा रही है। आग के बाद का जो मंजर नजर आ रहा है उसे देखकर ऐसा लगता है मानो कोई बम गिराया गया हो। विडंबना यह है कि आपदा में अवसर तलाशने वाले कुछ लोग खाली कराये गए घरों में लूटपाट से भी बाज नहीं आ रहे हैं। हॉलीवुड हिल्स इलाके में करीब साढ़े पांच हजार से अधिक इमारतों के नष्ट होने की खबर है। कई नामी फिल्मी हस्तियों के घर, जैसे बिली क्रिस्टल, मैंडी मूर, जेमी ली कर्टिस और पेरिस हिल्टन शामिल हैं एवं व्यावसायिक इमारतें व सार्वजनिक संस्थान आग की भेंट चढ़े हैं। वहां की आस्थाएं एवं निष्ठाएं इतनी जख्मी हो गयी कि विश्वास जैसा सुरक्षा-कवच मनुष्य-मनुष्य के बीच रहा ही नहीं। साफ चेहरों के भीतर कौन कितना बदसूरत एवं उन्मादी मन समेटे है, कहना कठिन है। अमेरिका की विकास की होड़ एवं तकनीकीकरण की दौड़ पूरी मानव जाति को ऐसे कोने में धकेल रही है, जहां से लौटना मुश्किल हो गया है। ईश्वर की बनायी संरचना में दखल का ही परिणाम है कि प्रकृति इतना रौद्र एवं विध्वंसक रूप धारण किया है। 

अमेरिका आज दुनिया में प्रकृति के दोहन, अपराध का सबसे बड़ा अड्डा है और हिंसा की जो संस्कृति उसने दुनिया में फैलाई, आज वह स्वयं उसका शिकार है। अमेरिका के इतिहास में यह जंगल की आग सबसे भयावह साबित हुई है। चिंता की बात यह है कि इलाके में हाल-फिलहाल बारिश होने की संभावना नहीं है, जिससे जंगल की आग जल्दी काबू में आ सकती। एक बड़े इलाके में बिजली आपूर्ति ठप होने व पानी की आपूर्ति में बाधा संकट को और बढ़ा रही है। लोगों की सुरक्षित स्थानों में जाने के लिये अफरा-तफरी से जगह-जगह ट्रैफिक जाम लग रहे हैं। पानी का दबाव कम होने से दमकल कर्मियों को आग बुझाने में परेशानी आ रही है। घोर अव्यवस्था एवं कुप्रशासन फेला है। दरअसल यह आग लॉस एंजेलिस के उत्तरी भाग में लगी, जिसने बाद में कई बड़े शहरों को अपनी चपेट में ले लिया। तेज हवाओं व सूखे मौसम के कारण आग ज्यादा भड़की है। सूखे पेड़-पौधे तेजी से आग की चपेट में आ गए। हालांकि, आग लगने का ठोस कारण अभी तक पता नहीं चला है। हकीकत है कि जंगलों में 95 फीसदी आग इंसानों द्वारा ही लगायी जाती है। वैसे जलवायु परिवर्तन प्रभावों के चलते बदले हालात में अब पूरे साल आग लगने की आशंका बनी रहती है।

अमेरिका दुनिया पर अपना एकछत्र शासन चाहता है। कनाडा, ग्रीनलैंड एवं पनामा को अमेरिका में शामिल करना चाहते हैं। मतलब सीधा सा है जिसकी लाठी उसकी भैंस यानी पावर और पैसे के बल पर खुद को बलवान और सुपरपावर मुल्क समझने वाला अमेरिका एक आग के आगे बेबस नजर आ रहा है। कैलिफोर्निया के दक्षिणी हिस्से में शुरू हुई इस जंगल की आग ने अब लॉस एंजेलिस जैसे बड़े शहर को राख बना दिया है। पैलिसेड्स में 20 हजार एकड़, ईटन में 14 हजार एकड़, कैनेथ में 1000 एकड़, हर्स्ट में 900 एकड़, लिडिआ में 500 एकड़ में आग फैली है। इन इलाके में राख के बारीक कणों व धुएं की चादर के कारण स्थानीय स्वास्थ्य इमरजेंसी घोषित की गई है। लोगों का जीवन इन सभी स्थानों पर दुर्भर हो गया है। लॉस एंजलिस की इस आग ने न केवल जीवन और संपत्ति को नुकसान पहुंचाया है, बल्कि सूखे और जलवायु परिवर्तन के प्रति गंभीर चेतावनी भी दी है। इससे निपटने के लिए दीर्घकालिक समाधान तलाशना बेहद जरूरी है।

आज अमेरिका विकास की चरम अवस्था पार कर चुका है। यह आशंका सदैव बनी रही है कि अनियंत्रित विकास एवं प्रकृति विनाश के प्रति समय रहते नहीं चेतने की कीमत सृष्टि के विनाश एवं मानवता के धंस से चुकानी होती है, धरती का पर्यावरण नष्ट हो जाता है। धरती पर मंडराते इसी संकट का प्रतीक है यह आग। बात बहुत ही सीधी सी है कि जब तक प्रकृति डराती नहीं विकास की राहें ऐसे ही बेतहाशा एवं अनियंत्रित आगे बढ़ती रहती हैं। किंतु जब प्रकृति मुस्कुराना भूल जाए तो वह विकास, विकास नहीं रहता। वहाँ कृत्रिमता दस्तक देने लगती है, धरती करवट बदलने लगती है, अम्बर चीत्कार कर उठता है तब मनुष्य को समझ लेना चाहिए कि अब विनाश की पदचाप सुनाई देने लगी हैं। अपनी राहें सुरक्षित रखने के वास्ते राहों को मोड़ने पर विचार करना चाहिए। ज़िद एवं अहंकार में बाज़ी पलट सकती है, वरना विनाश का दावानल अमेरिका की आग की तरह सब कुछ राख कर देता है। ‘मन जो चाहे वही करो’ की मानसिकता वहां पनपती है जहां ईश्वर की सत्ता एवं इंसानी रिश्तों के मूल्य समाप्त हो चुके होते हैं, ऐसी स्थिति में शक्तिशाली देश अपनी अनंत शक्तियों को भी बौना बना देता है। यह दकियानूसी ढंग है भीतर की अस्तव्यस्तता को प्रकट करने का। ऐसे देशों एवं लोगों के पास सही जीने का शिष्ट एवं अहिंसक सलीका नहीं होता। वक्त की पहचान नहीं होती। ऐसे लोगों में संतुलित विकास, शांतिपूर्ण सहजीवन, सृष्टि का संतुलन एवं सर्वोच्च ईश्वर सत्ता के प्रति सम्मान आदि का कोई खास ख्याल नहीं रहता। भौतिक सुख-सुविधाएं ही जीवन का अंतिम लक्ष्य बन जाता है। एक राष्ट्र मूल्यहीनता, प्रकृति उपेक्षा एवं अहंकारी सोच में कैसे शक्तिशाली बन सकता है? पक्षी भी एक विशेष मौसम में अपने घोंसले बदल लेते हैं। पर मनुष्य अपनी वृत्तियां नहीं बदलता। वह अपनी वृत्तियां तब बदलने को मजबूर होता है जब दुर्घटना, दुर्दिन या दुर्भाग्य का सामना होता है। अमेरिका की आग पक्षियों के इस संदेश को समझने व समय रहते जागने को कह रही है। इस आग से अमेरिका ही नहीं, समूची दुनिया को सबक लेने की जरूरत है।

- ललित गर्ग

लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

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