By रेनू तिवारी | Oct 23, 2026
देश की राजनीति में एक बार फिर मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को लेकर सियासी पारा चढ़ गया है। विपक्ष द्वारा देशव्यापी 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) अभियान में कथित गड़बड़ियों और 'वोट चोरी' के गंभीर आरोपों के बीच लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने बड़ा बयान दिया है। अध्यक्ष ने स्पष्ट किया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विपक्ष की ओर से मिलने वाले किसी भी नए नोटिस की जांच पूरी तरह से स्थापित नियमों और संसदीय प्रक्रियाओं के तहत की जाएगी। गुरुवार को नई दिल्ली में एक मीडिया ब्रीफिंग के दौरान बिरला ने यह बात तब कही, जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें कुमार के खिलाफ विपक्ष की ओर से कोई पत्र मिला है।
उनके ये बयान ऐसे समय में आए हैं जब कांग्रेस के नेतृत्व वाला 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन कुमार के खिलाफ अपनी रणनीति बना रहा है और 'वोट चोरी' के कथित आरोपों को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी कर रहा है। इससे पहले, लोकसभा में विपक्ष के नेता (LoP) सहित कई विपक्षी नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका भी दायर की थी, जिसमें कुमार के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई थी और मतदाता सूची के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) को रोकने के लिए कहा गया था।
CEC को कैसे हटाया जा सकता है?
संविधान के अनुसार, CEC को केवल संसद के माध्यम से ही हटाया जा सकता है, ठीक उसी तरह जैसे सुप्रीम कोर्ट के किसी मौजूदा न्यायाधीश को महाभियोग के जरिए हटाया जाता है। वहीं, 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023' के अनुसार, CEC अपना इस्तीफा राष्ट्रपति को सौंप सकते हैं।
अनुच्छेद 124, जो सुप्रीम कोर्ट से संबंधित है, के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायाधीश को उनके पद से तब तक नहीं हटाया जा सकता, जब तक कि संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित प्रस्ताव राष्ट्रपति के पास न भेजा जाए। इस प्रस्ताव को सदन के कुल सदस्यों के बहुमत और सदन में उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत का समर्थन प्राप्त होना चाहिए। यह प्रस्ताव उसी सत्र में राष्ट्रपति को सौंपा जाना चाहिए, और इसे साबित कदाचार या अक्षमता के आधार पर ही लाया जा सकता है। 'जजेज (इंक्वायरी) एक्ट, 1968' के अनुसार, यदि किसी जज को हटाने का प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में स्वीकार कर लिया जाता है, तो स्पीकर या चेयरमैन (जैसी भी स्थिति हो) तीन सदस्यों की एक समिति का गठन करेंगे। यह समिति उन आधारों की जांच करेगी, जिनके चलते जज को हटाने (जिसे आम भाषा में 'महाभियोग' कहा जाता है) की मांग की गई है।
इस समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) या सुप्रीम कोर्ट के कोई जज, 25 हाई कोर्टों में से किसी एक के मुख्य न्यायाधीश, और एक "प्रख्यात कानून विशेषज्ञ" (distinguished jurist) शामिल होते हैं। जांच पूरी होने के बाद, समिति अपनी रिपोर्ट स्पीकर या चेयरमैन (जैसी भी स्थिति हो) को सौंपेगी। यदि समिति का गठन स्पीकर और चेयरमैन दोनों ने मिलकर किया है, तो यह रिपोर्ट उन दोनों को सौंपी जाएगी। इस रिपोर्ट में हर आरोप पर अलग-अलग निष्कर्ष दिए जाएंगे, साथ ही पूरे मामले पर समिति अपनी उचित टिप्पणियां भी देगी।
स्पीकर या चेयरमैन (या यदि समिति का गठन दोनों ने मिलकर किया है, तो वे दोनों) उप-धारा (2) के तहत सौंपी गई रिपोर्ट को जल्द से जल्द क्रमशः 'हाउस ऑफ द पीपल' (लोकसभा) और 'काउंसिल ऑफ स्टेट्स' (राज्यसभा) के समक्ष रखवाएंगे।
यदि समिति की रिपोर्ट में यह निष्कर्ष निकलता है कि जज ने कोई कदाचार (misbehaviour) नहीं किया है और उनमें कोई अक्षमता (incapacity) नहीं है, तो संसद के किसी भी सदन में इस रिपोर्ट के संबंध में आगे कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। साथ ही, संसद के सदन या सदनों में लंबित प्रस्ताव पर भी कोई आगे की कार्यवाही नहीं होगी।
यदि समिति की रिपोर्ट में यह निष्कर्ष निकलता है कि जज ने कोई कदाचार किया है या उनमें कोई अक्षमता है, तो उस प्रस्ताव और समिति की रिपोर्ट को संसद के उस सदन या सदनों में विचार के लिए रखा जाएगा, जहां वह प्रस्ताव लंबित है। यदि संसद के प्रत्येक सदन द्वारा अनुच्छेद 124 के प्रावधानों के अनुसार, या जैसी भी स्थिति हो, संविधान के अनुच्छेद 218 के साथ पठित खंड के अनुसार प्रस्ताव पारित कर लिया जाता है, तो न्यायाधीश का कदाचार या अक्षमता सिद्ध मानी जाएगी; और जिस सत्र में यह प्रस्ताव पारित किया गया है, उसी सत्र में संसद के प्रत्येक सदन द्वारा राष्ट्रपति के समक्ष निर्धारित तरीके से एक ऐसा अनुरोध प्रस्तुत किया जाएगा जिसमें न्यायाधीश को पद से हटाने की प्रार्थना की गई हो।
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