By नीरज कुमार दुबे | Oct 31, 2026
जम्मू-कश्मीर की सियासत में इन दिनों नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर जो कुछ घट रहा है, वह महज मंत्रिमंडल विस्तार से उपजी नाराजगी नहीं है। इसके पीछे सत्ता की हिस्सेदारी, पार्टी में लोकतंत्र, अब्दुल्ला परिवार का नेतृत्व और चुनावी वादों को पूरा करने की जवाबदेही जैसे कई सवाल एक साथ खड़े हो गए हैं। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के लिए मुश्किल यह है कि विपक्ष से ज्यादा चुनौती अब उनकी अपनी पार्टी के भीतर से उठती दिखाई दे रही है। जिस नेशनल कॉन्फ्रेंस को एकजुट रखकर उन्होंने सत्ता हासिल की थी, उसी पार्टी के भीतर अब असंतोष खुलकर सामने आने लगा है।
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इन विधायकों की नाराजगी केवल मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिलने तक सीमित नहीं बताई जा रही। उनकी मांग है कि मुख्यमंत्री के सलाहकार नासिर असलम वानी को हटाया जाए, उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी सहित कुछ मंत्रियों को मंत्रिमंडल से बाहर किया जाए और पूरे मंत्रिमंडल का नए सिरे से पुनर्गठन हो। इसके साथ ही पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र, विधायकों को निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी और चुनावी घोषणापत्र को लागू करने के लिए स्पष्ट रोडमैप तैयार करने की मांग भी उठाई गई है।
असंतुष्ट विधायकों का आरोप है कि पार्टी और सरकार कुछ चुनिंदा लोगों के इर्द-गिर्द सिमटती जा रही है। विधायकों को जनता के बीच जाना पड़ता है, लेकिन सरकार के फैसलों में उनकी आवाज को पर्याप्त महत्व नहीं मिल रहा। बैठक में कुछ वरिष्ठ नेताओं के भावुक होने और पार्टी नेतृत्व तथा मुख्यमंत्री के सलाहकार के व्यवहार को लेकर शिकायतें सामने आने की खबरें भी हैं। यह घटनाक्रम बताता है कि नाराजगी की जड़ें काफी गहरी हैं।
दरअसल, उमर अब्दुल्ला सरकार का पहला मंत्रिमंडल विस्तार ही पार्टी के भीतर नई राजनीतिक लड़ाई का कारण बन गया। मंगलवार को उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने अली मोहम्मद सागर, शमीमा फिरदौस, मीर सैफुल्लाह और अल्ताफ अहमद कालू को मंत्री पद की शपथ दिलाई। इसके साथ मुख्यमंत्री समेत मंत्रियों की संख्या नौ हो गई, जो 90 सदस्यीय विधानसभा के लिए निर्धारित अधिकतम सीमा है। लेकिन इस विस्तार ने सभी को संतुष्ट करने के बजाय कई वरिष्ठ विधायकों को नाराज कर दिया। अब्दुल मजीद लरमी की सार्वजनिक नाराजगी इसका सबसे बड़ा उदाहरण बनी। मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिलने पर वह भावुक हो गए और उन्होंने कहा कि वह कैबिनेट में शामिल होने के योग्य थे। उन्होंने यहां तक सवाल उठाया कि जिस विधायक को मंत्री बनाया गया है, वह मैट्रिक भी पास नहीं है, जबकि वह स्वयं कानून के स्नातक हैं।
दूसरी तरफ मुबारक गुल के समर्थकों ने पार्टी मुख्यालय में प्रदर्शन किया। गुल को महासचिव बनाए जाने के बाद संगठनात्मक स्तर पर हुए फैसलों ने भी विवाद को हवा दी। अब उन्हें महासचिव पद से हटाए जाने और सलमान अली सागर को इस पद पर बनाए रखने के घटनाक्रम ने पार्टी के भीतर असमंजस और बढ़ा दिया है। मुबारक गुल ने 4 नवंबर को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर पार्टी के अंदरूनी घटनाक्रम पर खुलासा करने का ऐलान किया है। उनका यह बयान आने वाले दिनों में नेशनल कॉन्फ्रेंस के लिए नई मुश्किलें पैदा कर सकता है।
इसके अलावा, नेशनल कॉन्फ्रेंस के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक झटका श्रीनगर के सांसद आगा सैयद रुहुल्लाह मेहदी का पार्टी छोड़ने का ऐलान है। उन्होंने 3 नवंबर को नेशनल कॉन्फ्रेंस और लोकसभा सदस्यता दोनों से इस्तीफा देने की घोषणा की है। रुहुल्लाह ने अपने तीखे बयान में अब्दुल्ला परिवार के नेतृत्व पर सीधा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि पार्टी और जम्मू-कश्मीर को एक राजनीतिक विरासत की तरह चलाया जा रहा है, जहां जनता से वोट तो मांगे जाते हैं, लेकिन फैसलों में उसकी आवाज की कोई जगह नहीं होती।
रुहुल्लाह की नाराजगी का सबसे बड़ा आधार अनुच्छेद 370 की बहाली, राजनीतिक बंदियों की रिहाई और जम्मू-कश्मीर के अधिकारों की रक्षा से जुड़े चुनावी वादे हैं। उनका आरोप है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस ने सत्ता हासिल करने के लिए इन मुद्दों को जनता के सामने रखा, लेकिन सरकार बनने के बाद उन वादों पर अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाई गई। रुहुल्लाह का कहना है कि वह उस संसदीय सीट पर बने रहकर इस कथित राजनीतिक विश्वासघात का हिस्सा नहीं बनना चाहते, जिसे जनता ने वादों के आधार पर उन्हें सौंपा था। 3 नवंबर को वह अपने पिता आगा सैयद मेहदी की पुण्यतिथि पर बडगाम में लोगों को संबोधित करेंगे। यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि रुहुल्लाह कभी नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रमुख प्रवक्ताओं में शामिल थे और 2009 में सबसे युवा कैबिनेट मंत्री बने थे।
दूसरी ओर पार्टी नेतृत्व बगावत की खबरों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए जाने का दावा कर रहा है। प्रवक्ता इफरा जान ने 20 विधायकों की बैठक को लेकर सवाल उठाए हैं, जबकि महासचिव सलमान अली सागर ने असंतोष को सामान्य आंतरिक चर्चा बताया है। उनका कहना है कि विधायकों को अपनी शिकायतें रखने का अधिकार है और नेतृत्व उन पर विचार करेगा।
लेकिन राजनीतिक सवाल यह है कि यदि सब कुछ सामान्य है तो फिर एक के बाद एक वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी क्यों सामने आ रही है? मुबारक गुल की प्रेस कॉन्फ्रेंस का ऐलान, आगा रुहुल्लाह का इस्तीफा और विधायकों की सामूहिक बैठक आखिर किस राजनीतिक बेचैनी का संकेत हैं?
हम आपको बता दें कि 90 सदस्यीय विधानसभा में नेशनल कॉन्फ्रेंस के 41 विधायक हैं। छह निर्दलीय विधायकों का समर्थन और कांग्रेस के छह विधायकों का बाहर से सहयोग सरकार की ताकत है। ऐसे में 24 विधायकों के असंतुष्ट खेमे में होने की खबरें सरकार की राजनीतिक स्थिरता पर सवाल खड़े करती हैं। देखा जाये तो जम्मू-कश्मीर की राजनीति में अब असली परीक्षा उमर अब्दुल्ला की है। उन्हें तय करना होगा कि सरकार और पार्टी अब्दुल्ला परिवार के राजनीतिक नेतृत्व के इर्द-गिर्द चलेगी या उन विधायकों को भी बराबर की हिस्सेदारी मिलेगी, जिनके दम पर नेशनल कॉन्फ्रेंस सत्ता तक पहुंची है।
बहरहाल, फिलहाल 3 और 4 नवंबर की तारीखें नेशनल कॉन्फ्रेंस के लिए बेहद अहम हो गई हैं। एक तरफ आगा रुहुल्लाह पार्टी और संसद से विदाई का ऐलान करेंगे, दूसरी तरफ मुबारक गुल पार्टी के भीतर की कहानी सार्वजनिक करने वाले हैं। सवाल अब केवल मंत्रिमंडल में जगह पाने का नहीं है, बल्कि नेशनल कॉन्फ्रेंस के राजनीतिक भविष्य, उसके नेतृत्व और जम्मू-कश्मीर की जनता से किए गए वादों की विश्वसनीयता का है। कश्मीर की सियासत में अब लड़ाई विपक्ष बनाम सरकार की नहीं, बल्कि नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर नेतृत्व बनाम असंतोष की बनती दिखाई दे रही है।