By नीरज कुमार दुबे | Oct 13, 2026
उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 का चुनाव अभी कुछ समय दूर है, लेकिन शह-मात का खेल अभी से गरमाने लगा है। समाजवादी पार्टी के दरवाजे पर गठबंधन की उम्मीद लेकर पहुंचे असदुद्दीन ओवैसी को जब अखिलेश यादव ने भाव नहीं दिया, तो AIMIM प्रमुख ने आजमगढ़ की धरती से ऐसा सियासी तीर छोड़ा, जिसका निशाना सीधे लाल टोपी और मुलायम-अखिलेश की मुस्लिम राजनीति पर जा लगा। ओवैसी ने मुसलमानों से यादव परिवार की ‘गुलामी’ छोड़कर अपनी सियासी रहनुमाई खुद करने का आह्वान कर दिया। यानी गठबंधन की मेज पर जगह नहीं मिली, तो अब सियासी मैदान में हिस्सेदारी का हिसाब मांगा जाएगा!
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यही वह सवाल है, जो अखिलेश यादव के लिए सियासी सिरदर्द बन सकता है। क्योंकि यूपी की राजनीति में वोट का गणित सिर्फ जातियों की गिनती से नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी से भी तय होता है। ओवैसी इसी हिस्सेदारी के मुद्दे को हथियार बनाकर सपा के उस मजबूत सामाजिक समीकरण में सेंध लगाने की तैयारी में हैं, जिसके सहारे अखिलेश 2027 में बीजेपी को चुनौती देने का सपना देख रहे हैं।
साथ ही आजमगढ़ को लेकर ओवैसी ने अखिलेश को घेरने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। शिब्ली नेशनल कॉलेज को विश्वविद्यालय का दर्जा न मिलने, शिब्ली अकादमी को कथित तौर पर महज पांच लाख रुपये देने, खराब सड़कों, बंद पड़े हवाई अड्डे और महंगी शिक्षा का सवाल उठाकर उन्होंने सपा के विकास के दावों पर चोट की। साथ ही उन्होंने यह भी तंज कसा कि जब आजमगढ़ में सपा के दो सांसद, दस विधायक और जिला पंचायत अध्यक्ष तक पार्टी के हैं, तो जमीन पर विकास की तस्वीर इतनी बदहाल क्यों है? देखा जाये तो सवाल स्थानीय है, लेकिन निशाना सीधे अखिलेश की सियासी साख पर है।
उधर, योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव के अयोध्या से चुनाव लड़ने की चुनौती पर ओवैसी ने दोनों को क्रमशः संभल और गोरखपुर से उतरने की नसीहत देकर राजनीतिक अखाड़े में नया दांव चल दिया। साथ ही मोदी और योगी सरकार पर मुठभेड़ों, बुलडोजर कार्रवाई और मुसलमानों के घरों-दुकानों पर कार्रवाई को लेकर हमला बोलते हुए उन्होंने खुद को मुस्लिम अधिकारों की मुखर आवाज के रूप में पेश किया।
लेकिन इस पूरी लड़ाई का असली सवाल यही है कि क्या ओवैसी मुस्लिम समाज के भीतर स्वतंत्र राजनीतिक नेतृत्व खड़ा कर पाएंगे, या उनका वोट काटने वाला चेहरा होने का आरोप ही उनके रास्ते की सबसे बड़ी बाधा बनेगा? इसमें कोई दो राय नहीं कि सपा के साथ गठबंधन की कोशिश नाकाम होने के बाद ओवैसी के सामने अपनी ताकत साबित करने की चुनौती है। वहीं अखिलेश के सामने यह भरोसा कायम रखने की परीक्षा है कि उनका सामाजिक गठबंधन सिर्फ चुनाव जीतने का समीकरण नहीं, बल्कि सत्ता में भागीदारी का भी रास्ता है।
देखा जाये तो यूपी में 2027 की जंग अभी शुरू नहीं हुई है, मगर मुस्लिम वोटों की चौसर बिछ चुकी है। ओवैसी ने चाल चल दी है, अखिलेश को जवाब देना है और बीजेपी इस खींचतान का सियासी फायदा उठाने की ताक में रहेगी। आखिरकार, चुनाव में न नारा अकेले जीतता है, न आरोप, जीतता वही है, जिसके साथ जनता का भरोसा, संगठन की ताकत और वोटों का ठोस गणित होता है।
-नीरज कुमार दुबे