पानी पाकिस्तान का बंद हुआ है, मगर गला यहां के 'शांति दूतों' का क्यों सूख रहा है?

By नीरज कुमार दुबे | Jul 01, 2026

पहलगाम हमले के बाद भारत ने जिस दृढ़ता के साथ पाकिस्तान को उसकी असली जगह दिखानी शुरू की है, उससे इस्लामाबाद की सत्ता, सेना और वहां के कथित लोकतांत्रिक चेहरे बुरी तरह बौखला गए हैं। सिंधु जल संधि को स्थगित करने के भारत के फैसले ने पाकिस्तान की नसों में ऐसा डर भर दिया है कि वहां के नेता लगातार धमकियां दे रहे हैं, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर रो रहे हैं और दुनिया को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि भारत ने उनके अस्तित्व पर हमला कर दिया है।

लेकिन पाकिस्तान के इन आंसुओं के पीछे छिपा सच पूरी दुनिया जानती है। पहलगाम में 26 निर्दोष नागरिकों की हत्या करने वाले आतंकवादी कहां से आए थे? जम्मू-कश्मीर में दशकों से आतंकवाद को कौन पालता रहा है? भारत के सैनिकों और नागरिकों का खून बहाने के लिए हथियार, प्रशिक्षण और धन कौन देता रहा है?

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिल्कुल सही कहा था कि खून और पानी साथ साथ नहीं बह सकते। भारत ने सिंधु जल संधि को स्थगित करके यह स्पष्ट कर दिया कि अब नई दिल्ली पुरानी नीति पर नहीं चलेगी। यदि पाकिस्तान आतंकवाद को अपनी सरकारी नीति बनाए रखेगा तो उसे हर मोर्चे पर कीमत चुकानी होगी। भारत ने पश्चिमी नदियों पर अपने अधिकार वाले जल के उपयोग को तेज करने का फैसला किया है। यह कोई युद्ध नहीं, बल्कि अपने अधिकारों का प्रयोग है।

साथ ही सबसे बड़ा सवाल उन लोगों से पूछा जाना चाहिए जो भारत में बैठकर पाकिस्तान से वार्ता की मांग कर रहे हैं। हम आपको बता दें कि एक सौ से अधिक तथाकथित बुद्धिजीवियों, नेताओं और सामाजिक हस्तियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शाहबाज शरीफ को पत्र लिखकर बातचीत बहाल करने, वीजा सेवाएं शुरू करने, दूतावास सामान्य करने और यहां तक कि कश्मीर पर फिर से बातचीत करने की मांग की है। इस पत्र पर फारूक अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती, मीरवाइज उमर फारूक और कुछ अन्य भारतीय हस्तियों के हस्ताक्षर भी हैं।

इन लोगों से देश पूछना चाहता है कि आखिर पाकिस्तान से इतनी मोहब्बत क्यों है? जो देश भारत में आतंकवादी भेजता है, हमारे नागरिकों की हत्या करवाता है, सीमा पार से गोलियां चलाता है, उसी देश के लिए इनके दिल में इतनी बेचैनी क्यों उमड़ती है? भारत ने जब पाकिस्तान का पानी रोकने की दिशा में कदम उठाया तो प्यास पाकिस्तान को लगी, लेकिन गला यहां बैठे तथाकथित शांति दूतों का सूखने लगा। आखिर क्यों? क्या इन लोगों को भारत की सुरक्षा से ज्यादा चिंता पाकिस्तान की खेती और उसकी बिजली व्यवस्था की है?

ये लोग कहते हैं कि वार्ता ही समाधान है। लेकिन देश जानना चाहता है कि आखिर कितनी वार्ताएं हो चुकी हैं? लाहौर बस यात्रा से लेकर आगरा शिखर वार्ता तक और उफा से लेकर शरम अल शेख तक भारत ने हर बार शांति का हाथ बढ़ाया। बदले में मिला क्या? कारगिल, संसद हमला, मुंबई हमला, उरी, पुलवामा और अब पहलगाम। पाकिस्तान हर बार वार्ता की मेज पर मुस्कुराता है और पीठ पीछे आतंकियों को भेजता है।

आज जब भारत पहली बार कठोर नीति पर डटा है तो देश के भीतर बैठे कुछ लोग बेचैन हो उठे हैं। उन्हें आतंकवाद पर गुस्सा नहीं आता, लेकिन पाकिस्तान का पानी रुकने पर दर्द होने लगता है। उन्हें भारत के शहीदों की चिंता कम और इस्लामाबाद की परेशानी ज्यादा दिखाई देती है। यह वही मानसिकता है जिसने दशकों तक भारत को कमजोर नीति में बांध कर रखा।

सच यह है कि सिंधु जल संधि का सबसे ज्यादा लाभ पाकिस्तान ने उठाया। भारत ने वर्षों तक उदारता दिखाई, जबकि पाकिस्तान आतंकवाद फैलाता रहा। अब जब नई दिल्ली ने स्पष्ट कर दिया है कि आतंक और व्यापार, आतंक और वार्ता, आतंक और पानी साथ साथ नहीं चल सकते, तब पाकिस्तान दुनिया भर में सहानुभूति जुटाने निकला है। लेकिन दुनिया भी समझ रही है कि समस्या की जड़ कहां है।

पाकिस्तान को यह समझ लेना चाहिए कि धमकियों से भारत डरने वाला नहीं है। पानी को लेकर युद्ध जैसे बयान देने वाले पहले अपने घर की हालत देखें। वहां की अर्थव्यवस्था डगमगा रही है, जनता महंगाई से त्रस्त है और सेना तथा सरकार अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए भारत विरोध का सहारा ले रही हैं।

देखा जाये तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पाकिस्तान नीति ने स्पष्ट संदेश दिया है कि नया भारत अब केवल प्रतिक्रिया नहीं देगा, बल्कि अपने हितों की रक्षा के लिए निर्णायक कदम भी उठाएगा। आतंकवाद को पालने वालों को अब हर क्षेत्र में जवाब मिलेगा। पाकिस्तान यदि वास्तव में शांति चाहता है तो उसे पहले आतंकवाद की फैक्टरी बंद करनी होगी। जब तक उसकी धरती से भारत विरोधी आतंक जारी रहेगा, तब तक कोई भी वार्ता केवल छलावा मानी जाएगी।

बहरहाल, भारत की जनता अब भ्रम में नहीं है। देश समझ चुका है कि शांति की सबसे पहली शर्त सुरक्षा है। और जो लोग पाकिस्तान के लिए आंसू बहा रहे हैं, उन्हें यह याद रखना चाहिए कि भारत की सहनशीलता को कमजोरी समझने की भूल अब कोई नहीं कर सकता। नया भारत अपने सैनिकों के खून का हिसाब भी लेगा और अपने पानी का अधिकार भी बचाएगा।

-नीरज कुमार दुबे

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