राधाकृष्णन से संसदीय परंपराओं की उम्मीद

By उमेश चतुर्वेदी | Aug 20, 2025

1999 के आम चुनावों के बाद तमिलनाडु से चुनकर आए युवा सांसद को उसकी पार्टी की ओर से राजधानी दिल्ली में बने रहने की ताकीद की गई थी.. ऐसी ताकीद का मतलब होता है, या तो संसद की महत्वपूर्ण बैठक होने जा रही है और उसमें सांसद का रहना जरूरी है या फिर मंत्रिमंडल का गठन और फेरबदल होने वाला है..हो सकता है कि उसका नाम मंत्री बनने की सूची में शामिल हो और उसे अचानक राष्ट्रपति भवन से बुलावा आ जाए। चूंकि लोकसभा के चुनाव जल्द ही हुए थे, लिहाजा उम्मीद थी कि वह सांसद भी मंत्री बनने वाली लिस्ट में शामिल है। लेकिन उसे बुलावा नहीं आया। बाद में पता चला कि नाम को लेकर भ्रम होने की वजह से उसकी तरह मिलते-जुलते नाम वाले सांसद को बुलावा मिल गया और वह युवा सांसद मंत्री बनने से रह गया था। इस घटना के बाद ढाई दशक की देर भले हुई, लेकिन उसे मंत्रिमंडल में भले ही जगह नहीं मिली, लेकिन अब वह देश का उपराष्ट्रपति बनने जा रहा है। जी हां,ठीक समझा आपने सीपी राधाकृष्णन की जिंदगी से जुड़ी यह घटना है। तब वाजपेयी सरकार में उनकी जगह पी राधाकृष्णन को बुलावा मिल गया और वे मंत्री बन गए थे। पी राधाकृष्णन भी उस बार तमिलनाडु से चुने गए बीजेपी के चार सांसदों में से एक थे।


सीपी राधाकृष्णन के साथ अब तक दो तरह के संयोग ज्ञात थे। वे प्रधानमंत्री मोदी की तरह दाढ़ी रखते हैं और उन्हें तमिलनाडु का मोदी कहा जाता है। दूसरा संयोग यह है कि देश के सर्वोच्च पद पर आसीन राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू झारखंड की राज्यपाल रही हैं, अब उपराष्ट्रपति बनने जा रहे राधाकृष्णन भी झारखंड के राज्यपाल रहे हैं। यानी अब देश के दो सर्वोच्च पदों पर झारखंड के दो पूर्व राज्यपाल होंगे। इन संदर्भों में देखें तो झारखंड दोनों के लिए शुभ रहा। जब भारतीय जनता पार्टी ने सीपी राधाकृष्णन का नाम उपराष्ट्रपति पद के लिए घोषित किया, उसके कुछ वक्त बात उनकी मां जानकी अम्माल ने बताया कि उन्होंने सीपी राधाकृष्णन  का नाम देश के पहले उपराष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन के नाम पर रखा था। इसे संयोग ही कहेंगे कि सर्वपल्ली के बाद सीपी राधाकृष्णन भी देश के उपराष्ट्रपति बनने जा रहे हैं। वैसे तमिलनाडु राज्य से उपराष्ट्रपति बनने वाली तीसरी शख्सियत होंगे।

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कोयंबटूर के धमाके की चर्चा अरसे तक भारतीय राजनीति में सुनाई देती रही है। कट्टरपंथी संगठन अल्ल उम्माह ने 14 फरवरी 1998 को कोयंबटूर में ग्यारह जगहों पर बारह धमाके किए थे, जिसमें 58 लोग मारे गए और दो सौ से ज्यादा लोग घायल हुए थे। इन धमाकों के निशाने पर बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, जो सीपी राधाकृष्णन के चुनाव प्रचार के लिए वहां गये थे। सीपी तभी से राष्ट्रीय राजनीति में चर्चा में आ गए। तब अन्नाद्रमुक पार्टी से बीजेपी का राज्य में गठबंधन था, जिसकी वजह से कोयंबटूर लोकसभा सीट से उन्हें भारी मतों में जीत मिली। अगले साल एक वोट से वाजपेयी सरकार के गिरने के बाद जब आम चुनाव हुए तो बीजेपी ने फिर से सीपी राधाकृष्णन को अपना उम्मीदवार बनाया। इस बार बीजेपी का उसी द्रमुक से समझौता था, जो इन दिनों भाषा, नई शिक्षा नीति और मतदाता सूची में गहन पुनरीक्षण को लेकर बीजेपी पर हमलावर है। उस चुनाव में भी सीपी राधाकृष्णन को जीत मिली। 


लेकिन उसके बाद सीपी से जीत लगातार दूर रही। 2004 और 2014 एवं 2019 की प्रचंड मोदी लहर में भी उन्हें हार मिली। जबकि 2009 में उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा था। 


राधाकृष्णन को तमिलनाडु का मोदी क्यों कहा जाता है, इसकी भी एक कहानी है। साल 2013 में जब नरेंद्र मोदी को बीजेपी ने अगले आम चुनाव के लिए प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित किया तो उन्हें तमिल टीवी चैनलों पर बहस के लिए बुलाया जाने लगा। इसी एक बहस के दौरान उन्होंने बीजेपी का पक्ष जोरदार तरीके से रखा। उनकी बहस को देख-सुन रहे दर्शकों ने उन्हें तमिलनाडु का मोदी कहना शुरू कर दिया। देखते ही देखते, तमिल चैनल भी उन्हें तमिलनाडु का मोदी कहकर बुलाने लगे। वैसे उन्हें तमिलनाडु में सीपीआर के नाम से ज्यादा जाना जाता है, जबकि उत्तर भारत के उनके नजदीकी सर्किल में वे राधाजी के नाम से प्रसिद्ध हैं। 


नरेंद्र मोदी एक दौर में अटल-आडवाणी की जोड़ी के चहेते रहे हैं। वैसे तमिलनाडु में उनकी छवि कुछ-कुछ अटल बिहारी वाजपेयी की तरह है। उनके बेटे और बेटी की शादी में कई दलों में फैली तमिल राजनीति के नेताओं की भीड़ देखते ही बनती थी। उनके हर दल के नेता से बेहतर संबंध रहे हैं। हालांकि एक दौर में अन्नाद्रमुक से उनकी ज्यादा नजदीकी रही। उनकी दोस्ती हर दल में है। शायद यही वजह है कि राज्य के सत्ताधारी द्रमुक पर दबाव बढ़ गया है कि उपराष्ट्रपति चुनाव में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन से अलग होकर तमिल अस्मिता के नाम पर सीपीआर का समर्थन करे। लोकसभा में द्रमुक के 22 और राज्यसभा में दस सांसद हैं। अगर ऐसा होता है तो सीपीआर की जीत बड़ी हो सकती है। हालांकि द्रमुक के कई नेता उनके खिलाफ तो नहीं, अलबत्ता बीजेपी के खिलाफ बयान जरूर दे रहे हैं। माना जा रहा है कि बीजेपी ने सीपीआर को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार अगले साल तमिलनाडु में होने जा रहे विधानसभा चुनाव को देखते हुए बनाया है। उत्तर भारत की तरह तमिल राजनीति भी जातीय खांचे में बंटी हुई है। सीपीआर अन्य पिछड़ा वर्ग की कौंडर जाति से आते हैं। जनसंख्या के लिहाज से इस जाति का दबदबा भले ही न हो, लेकिन वह राज्य में बीजेपी का मजबूत आधार वोट बैंक है। बीजेपी उन्हें उम्मीदवार बनाकर राज्य को यह संदेश देने की कोशिश में है कि वही ऐसा दल है, जो राष्ट्रीय स्तर पर उसके प्रतिनिधि को महत्व दे सकता है। अगर द्रमुक सीपीआर का सहयोग नहीं करता तो उसके सामने बीजेपी चुनौती पेश कर सकती है। राज्य के विधानसभा चुनावों में वह कह सकती है कि तमिल अस्मिता की दुहाई देने वाले स्टालिन ने तमिल बेटे का साथ नहीं दिया। जिसका जवाब देना द्रमुक के लिए मुश्किल हो सकता है।


सीपीआर बेहद धार्मिक व्यक्ति हैं। पूजा-पाठ और शाकाहार में उनकी गहरी आस्था है। दिल्ली के तमिलनाडु भवन के बाहर भगवान मुरूगेशन का एक मंदिर है। तमिलनाडु भवन में राज्यपाल बनने के पहले सीपीआर ठहरते रहे हैं। उस वक्त उन्हें जब भी कहीं बाहर जाना होता था, मुरूगेशन के सामने मत्था जरूर टेकते थे। सादा खान-पान में सीपीआर का यकीन है। अक्सर भोजन में वे इडली और चटनी लेते देखे जा सकते हैं।  

सीपीआर को 2023 में झारखंड का राज्यपाल बनाया गया। 18 फरवरी को उन्होंने शपथ ली। तब वे किंचित निराश बताए जा रहे थे। उन्हें लगता था कि उनके हाथ से सक्रिय राजनीति की डोरी पीछे छूट रही है। इसके करीब डेढ़ साल बाद यानी 31 जुलाई 2014 को उन्हें अपेक्षाकृत महत्वपूर्ण राज्य महाराष्ट्र के राजभवन की जिम्मेदारी मिली। उन्होंने अपनी मधुर मुस्कान के साथ उसे निभाया है। झारखंड का राज्यपाल रहते कुछ समय तक उनके पास तेलंगाना के राज्यपाल और पुदुचेरी के उपराज्यपाल की भी जिम्मेदारी रही। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि मोदी और शाह की जोड़ी के वे विश्वासपात्र हैं। 2016 से 2020 तक कयर बोर्ड के चेयरमैन रह चुके सीपी राधाकृष्णन अब देश के दूसरे सर्वोच्च पद से कुछ कदम दूर हैं। भारतीय संसदीय परंपरा में नया उत्साह भरने की जिम्मेदारी उनके पास है। वे चाहें तो देश की राजनीति और संसदीय परंपरा को नई दिशा दे सकते हैं। जैसा उनका व्यक्तित्व है, उसमें कोई कारण नहीं कि वे सफल ना हो पाएं।


-उमेश चतुर्वेदी

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं

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