By अनन्या मिश्रा | May 19, 2026
पत्रकार, हिंदू राष्ट्रवादी और महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का 19 मई को जन्म हुआ था। नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की गोली मारकर हत्याकर दी थी। दरअसल, गोडसे महात्मा गांधी को हिंदुओं की बर्बादी का कारण मानते थे। माना जाता था कि गोडसे धर्म के आधार पर देश का बंटवारा नहीं चाहते थे। इस कारण वह गांधी जी से नफरत करने लगे थे। वहीं महात्मा गांधी की हत्या करने के बाद नाथूराम ने खुद पर गर्व होने की बात कही थी। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर नाथूराम गोडसे के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...
देश के अलग-अलग राज्यों में जाकर महात्मा गांधी छात्रों, महिलाओं और आम लोगों के बीच भाषण देते और खादी अपनाने और कांग्रेस में शामिल होने को कहते। महात्मा गांधी की इस यात्रा की वजह से लोग कांग्रेस से जुड़ने लगे। वहीं नाथूराम के पिता डाक विभाग में थे, उनको पोस्टिंग रत्नागिरी में होने से नाथूराम गोडसे कांग्रेस के नेताओं से मिलाकर सभाओं में जाने लगे। कांग्रेस की सभाओं में नाथूराम भी भाषण देने लगे।
रत्नागिरी में गोडसे की मुलाकात वीर सावरकर से हुई। इस मुलाकात के बाद गोडसे की विचारधारा में परिवर्तन आने लगा और वह हिंदुत्व की राह पर चलने लगा। वीर सावरकर इस दौरान काला पानी की सजा काटकर लौटे थे। सावरकर हिंदुत्व के सिद्धांत के अनुसार भाषण देते थे। गोडसे इन भाषणों से प्रभावित था और उन्होंने कांग्रेस की सभाओं से दूरी बनाना शुरूकर दिया।
सावरकर के विचारों से प्रभावित होकर गोडसे RSS से जुड़ा था। साल 1937 में जब सावरकर हिंदू महासभा के अध्यक्ष बने तो गोडसे भी इससे जुड़ गया। गोडसे के RSS नेताओं से जान-पहचान होने लगी। साल 1942 में विश्व युद्ध की आहट के बीच RSS पर कई तरह की पाबंदी लगी थी। इसी के चलते गोडसे ने अपना एक नया संगठन हिंदू राष्ट्र दल बना लिया। जिसको RSS और हिंदू महासभा दोनों का समर्थन मिला। इसी संगठन में नाथूराम गोडसे की मुलाकात नारायण दत्तात्रेय आप्टे से हुई, जोकि गांधी हत्या में शामिल था।
महात्मा गांधी की हत्या के पीछे का कारण देश का बंटवारा माना जाता है। नाथूराम गोडसे नहीं चाहते थे कि धर्म के आधार पर देश को बांटा जाए। यह सब देखकर गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या की प्लानिंग की। जिसके बाद गोडसे ने दत्तात्रेय आप्टे, विष्णु करकरे और मदन लाल पहवा के साथ मिलकर गांधी को मारने की सोचा। 20 जनवरी 1948 को पहवा ने प्रार्थना सभा में विस्फोट किया, लेकिन एक महिला ने पहवा को देख लिया और वह गिरफ्तार हो गया।
साथी की गिरफ्तारी के बाद भी गोडसे ने नफरत की आग को बुझाने के लिए 30 जनवरी 1948 को दिल्ली के बिड़ला भवन में महात्मा गांधी के सीने में तीन गोलियां मारी। जिसके बाद गोडसे को पकड़ लिया गया और 15 नवंबर 1949 को नाथूराम गोडसे को फांसी दी गई।