By रेनू तिवारी | Oct 27, 2026
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के पुनर्गठन और बहुपक्षवाद (Multilateralism) को समावेशी बनाने की दिशा में भारत ने वैश्विक मंच पर एक बार फिर अपना कड़ा और स्पष्ट रुख अपनाया है। भारत ने जोर देकर कहा है कि सुरक्षा परिषद में किसी भी प्रकार का सुधार ऐसा नहीं होना चाहिए, जो नए स्थायी सदस्यों को "दूसरे दर्जे" (Second-class) का भागीदार बना दे। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि, राजदूत हरीश पर्वथनेनी ने स्पष्ट किया है कि जब तक UNSC में वीटो पावर (Veto Power) का प्रावधान अस्तित्व में है, तब तक पुनर्गठित परिषद के सभी नए और पुराने स्थायी सदस्यों को समान अधिकार और जिम्मेदारियां मिलनी चाहिए।उन्होंने जोर देकर कहा कि निष्पक्षता और न्याय के लिए सभी स्थायी सदस्यों के पास समान अधिकार और जिम्मेदारियां होनी चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र महासभा में 'इंटरगवर्नमेंटल नेगोशिएशन्स' (IGN) के पूर्ण सत्र के दौरान वीटो के मुद्दे पर बात करते हुए उन्होंने तर्क दिया कि बिना वीटो पावर वाले स्थायी सदस्यों की एक और श्रेणी बनाने से परिषद के निर्णय लेने के ढांचे में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आएगा।
उन्होंने कहा कि इस तरह के सुधार से नए सदस्य असल में "दूसरे दर्जे" के भागीदार बनकर रह जाएंगे, जबकि पांच मौजूदा स्थायी सदस्यों के बीच सत्ता का संतुलन पहले जैसा ही बना रहेगा।
15 सदस्यों वाली मौजूदा सुरक्षा परिषद में पांच स्थायी सदस्य हैं—चीन, फ्रांस, रूस, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका—इन सभी के पास वीटो पावर है। बाकी 10 सदस्य दो साल के कार्यकाल के लिए चुने जाते हैं और उनके पास वीटो का अधिकार नहीं होता है।
भारत लगातार सुरक्षा परिषद में स्थायी और अस्थायी, दोनों तरह के सदस्यों की संख्या बढ़ाने की वकालत करता रहा है। भारत का तर्क है कि अगर सुधार केवल अस्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने तक सीमित रहे, तो इससे कोई सार्थक बदलाव नहीं आएगा।
1945 में स्थापित सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग लगातार बढ़ रही है, ताकि यह आज की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं और बदलती वैश्विक शक्ति संतुलन को दर्शा सके। नई दिल्ली का मानना है कि परिषद का मौजूदा ढांचा आज की दुनिया का सही प्रतिनिधित्व नहीं करता है, इसलिए भारत ने स्थायी सीट की मांग की है।
इसके अलावा, भारत 2028-29 के कार्यकाल के लिए अस्थायी सीट भी हासिल करना चाहता है। चुनाव जून 2027 में होने हैं, जिसमें भारत और ताजिकिस्तान एशिया-प्रशांत समूह के लिए आवंटित एकमात्र सीट के लिए मुकाबला करेंगे।
भारत पिछली बार 2021-22 के दौरान परिषद में शामिल था, जो उसका आठवां कार्यकाल था। इससे पहले भारत 1950-51, 1967-68, 1972-73, 1977-78, 1984-85, 1991-92 और 2011-12 में परिषद का सदस्य रह चुका है।
वीटो सुधार की मांग का क्या अर्थ है?
भारत का रुख एक ऐसी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की वकालत करता है जो अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण हो, जिसमें उभरती हुई शक्तियों की वैश्विक निर्णय-प्रक्रिया में सार्थक भूमिका हो। नई दिल्ली का तर्क है कि यदि नए स्थायी सदस्यों को वीटो शक्ति के बिना शामिल किया जाता है, तो इससे परिषद में सदस्यों की संख्या तो बढ़ जाएगी, लेकिन इसकी मूल शक्ति संरचना में कोई बदलाव नहीं आएगा। यह बात इस साल की शुरुआत में भारत में आयोजित ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन में अपनाए गए 'नई दिल्ली घोषणापत्र' में भी झलकती है।
भारत के लिए, समान वीटो अधिकार यह सुनिश्चित करने में मदद करेंगे कि भविष्य में मिलने वाली स्थायी सीट को भी उतनी ही शक्ति प्राप्त हो, जितनी वर्तमान पांच शक्तियों के पास है। यह सिद्धांत का भी मामला है: भारत का मानना है कि स्थायी सदस्यता के साथ समान अधिकार और जिम्मेदारियां मिलनी चाहिए, न कि स्थायी सदस्यों के बीच कोई पदानुक्रम (hierarchy) बनाया जाना चाहिए।
यह बहस स्थायी सीट के लिए भारत के लंबे समय से चल रहे अभियान का मुख्य हिस्सा है। नई दिल्ली का मानना है कि परिषद को आज की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को बेहतर ढंग से प्रतिबिंबित करना चाहिए, जिसमें उन देशों का बढ़ता प्रभाव भी शामिल है, जिनका स्थायी सदस्यता में अभी भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है।
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