तीन दशकों तक देश के विभिन्न प्रधानमंत्रियों की जरूरत बने रहे थे पासवान

By ललित गर्ग | Oct 10, 2020

बिहार की राजनीति में चमत्कार घटित करने वाले, भारतीय दलित राजनीति के शीर्ष नेता एवं केन्द्रीय खाद्य आपूर्ति मंत्री रामविलास पासवान का निधन भारतीय राजनीति की एक अपूरणीय क्षति है। उन्होंने लोक जनशक्ति पार्टी की वर्ष 2000 में स्थापना की एवं संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से उनका राजनीति सफर शुरू हुआ। वे अकेले ऐसे राजनीतिक व्यक्तित्व थे जिन्हें अनेक प्रधानमंत्रियों के साथ काम करने का मौका मिला और वे दो बार लोकसभा में सदन के नेता भी रहे। उन्होंने 1977 में हाजीपुर से रिकॉर्ड मतों से चुनाव जीत कर एक अनूठा इतिहास बनाया। उन्होंने दलितों से लेकर सर्वहारा वर्ग के लिये हमेशा आगे बढ़कर एक कर्मयोद्धा की भांति लड़ाई लड़ी। 1969 से अपना राजनीतिक सफर शुरू करने वाले रामविलासजी ने जेपी आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभाई और फायरब्रांड समाजवादी के रूप में उभरे। वे वंचित वर्गों की आवाज मुखर करने वाले तथा हाशिए के लोगों के लिए सतत संघर्षरत रहने वाले जनसेवक थे। हम उनके निधन को राजनीति में न केवल दलितों-वंचितों के उन्नायक महानायक की बल्कि उच्च चारित्रिक एवं नैतिक मूल्यों के एक युग की समाप्ति कह सकते हैं।

पासवानजी का राजनीति जीवन अनेक विशेषताओं एवं विलक्षणताओं का समवाय है। वे पिछले 32 वर्षों में 11 चुनाव लड़ चुके हैं और उनमें से नौ बार जीत चुके हैं। इस बार उन्होंने लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा लेकिन उन्होंने मोदी सरकार में एक बार फिर से उपभोक्ता मामलात मंत्री पद की शपथ ली। बिहार में कभी बड़ी ताकत नहीं बन पाए पासवान ने दिल्ली की राजनीति में खुद को एक ताकत बनाए रखा और तीन दशकों तक देश के विभिन्न प्रधानमंत्रियों की जरूरत बने रहे। विश्वनाथ प्रताप सिंह, एचडी देवगौड़ा, इंद्रकुमार गुजराल, अटल बिहारी बाजपेयी, मनमोहन सिंह और अब नरेंद्र मोदी की सरकारों में भी वह अहम पदों पर रहे। भारतीय राजनीति के इस जुझारू एवं जीवट वाले नेता ने राजनीति में कर्मयोगी की भांति जीवन जीया।

यह सच है कि वे बिहार के थे, यह भी सच है कि वे लोजपा के थे किन्तु इससे भी बड़ा सच यह है कि वे राष्ट्र के थे, राष्ट्रनायक थे। देश की वर्तमान राजनीति में वे दुर्लभ एवं संवेदनशील व्यक्तित्व थे। गरीबों, वंचितों, दलितों की आवाज बनने वाले इस विलक्षण राजनेता के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की अनेक विशेषताएं थीं, वे उदात्त संस्कार, लोकजीवन से इतनी निकटता, इतनी सादगी-सरलता, इतना धर्म-संस्कृति प्रेम और इतनी सच्चाई ने उनके व्यक्तित्व को बहुत और बहुत ऊँचा बना दिया था। वे अन्तिम साँस तक देश की एवं दलितों-वंचितों की सेवा करते रहे। उनका निधन एक राष्ट्रवादी सोच की राजनीति एवं सर्वहारा वर्ग के मसीहा महानेता का अंत है। वे सिद्धांतों एवं आदर्शों पर जीने वाले व्यक्तियों की श्रृंखला के प्रतीक थे। उनके निधन को राजनैतिक जीवन में शुद्धता की, मूल्यों की, संस्कृति की, दलित राजनीति की, सर्वहारा वर्ग के लिये संघर्ष की, सिद्धांतों पर अडिग रहकर न झुकने, न समझौता करने की समाप्ति समझा जा सकता है। रामविलासजी ने पांच दशक तक सक्रिय राजनीति की, अनेक पदों पर रहे, पर वे सदा दूसरों से भिन्न रहे। भ्रष्ट राजनीति में बेदाग। विचारों में निडर। टूटते मूल्यों में अडिग। घेरे तोड़कर निकलती भीड़ में मर्यादित। उनके जीवन से जुड़ी विधायक धारणा और यथार्थपरक सोच ऐसे शक्तिशाली हथियार थे जिसका वार कभी खाली नहीं गया। बिहार के लिए सचमुच वे ‘राम’ यानी सबके प्रिय एवं चेहते थे। एक युवा नेता के रूप में उन्होंने आपातकाल के दौरान अत्याचार और लोकतंत्र पर हमले का सशक्त एवं प्रभावी विरोध करते हुए अपनी स्वतंत्र राजनीतिक सोच एवं दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया।

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जरूरतमंदों की सहायता करते हुए, नये राजनीतिक चेहरों को गढ़ते हुए, मुस्कराते हुए और हंसते हुए छोटों से स्नेहपूर्ण व्यवहार और हम उम्र लोगों से बेलौस हंसी-मजाक करने वाले रामविलास पासवान की जिंदगी प्रेरक, अनूठी एवं विलक्षण इस मायने में मानी जाएगी कि उन्होंने जिंदगी के सारे सरोकारों को छुआ। वह राजनेता थे तो उन्होंने दलित-वंचितों के लिये आवाज उठाई, सर्वहारा वर्ग की चिन्ता की, उनके अधिकारों की लड़ाई लड़ी। उनका दृष्टिकोण व्यापक था और दलित हितों से प्रतिबद्ध था। वे दलित आंदोलनकारी और राजनीतिक घटनाक्रमों के सूत्रधार भी रहे। क्रांतिकारियों व वरिष्ठ स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के सरोकारों से भी वे हमेशा जुड़े दिखे। बड़े व व्यस्त राजनेता होने के बावजूद विभिन्न धर्मों एवं सांस्कृतिक गतिविधियों में सहज भागीदारी- उनके जीवन के विविध आयाम थे। जितना वे दलित हित की चिन्ता करते उतनी ही आदिवासी उत्थान के लिये तत्पर रहते। गुजरात के बडौदा-छोटा उदयपुर के आदिवासी क्षेत्रों में गणि राजेन्द्र विजयजी के नेतृत्व में एवं सुखी परिवार फाउण्डेशन के द्वारा संचालित गतिविधियों में उनका भरपूर सहयोग मिला।

बिहार में जैन तीर्थंकरों की कल्याण भूमि को लेकर उनके मन में बड़ी योजना थी। बिहार के जैन तीर्थंकरों के सरोकारों, संस्कृति और इतिहास से जुड़ा शायद ही कोई पहलू ऐसा रहा हो जो उनके दिलों की धड़कन में न धड़कता रहा हो। उनकी गिनती बिहार की मिट्टी से जुड़े कद्दावर नेताओं में थी और उनके सभी दलों के साथ अच्छे संबंध थे। रामविलास पासवानजी बहुत ही जुझारू नेता थे, सभी के प्रति उनका भाव हमेशा सृजनात्मक रहा, यही उन्हें दूसरों से हमेशा अलग बनाता रहा। उनका रूख हमेशा सकारात्मक राजनीति के प्रति रहता था। उनके सुझाव इतने गंभीर होते थे कि हर किसी का ध्यान खींचते थे। वे राजनीति से एक कदम आगे विकास की दिशा में बढ़ने के लिए सुझाव देते थे। वह एनडीए गठबंधन के सहयोगी ही नहीं, बल्कि उसकी सफलता के मुख्य सूत्रधार थे। वे गठबंधन की राजनीति के अहम किरदार रहे। उनकी कोशिश होती थी कि समाज के वंचित वर्ग को न्याय मिले और उसके अधिकारों का सम्मान किया जाए।

रामविलास पासवान ने अपनी समन्वय नीति, सादगी एवं सरलता से राजनीति को एक नया दिशाबोध दिया। वे बिहार की सांस्कृतिक विरासत को जीवंतता देने एवं बिहार की जैन-बौद्ध संस्कृति के लिए अपनी आवाज उठाने और उसके हक में लड़ने वाले विशिष्ट नेताओं में से एक थे। वे एनडीए गठबंधन के लिए एक धरोहर थे। उन्होंने बिहार के समग्र विकास के लिए कठोर परिश्रम किया। वे अपने क्षेत्र की जनता के लिए हमेशा सुलभ रहते थे। वे युवावस्था में ही सार्वजनिक जीवन में आये और काफी लगन और सेवा भाव से समाज की सेवा की। वे नंगे पांव चलने वाले एवं लोगों के दिलों पर राज करने वाले राजनेता थे, वे साधारण कार्यकर्ता की तरह कहीं भी रह जाते थे। उनके दिलो-दिमाग में बिहार एवं वहां की जनता हर समय बसी रहती थी। काश! सत्ता के मद, करप्शन के कद, व अहंकार के जद्द में जकड़े-अकड़े रहने वाले राजनेता उनसे एवं उनसे बोधपाठ लें। निराशा, अकर्मण्यता, असफलता और उदासीनता के अंधकार को उन्होंने अपने आत्मविश्वास और जीवन के आशा भरे दीपों से पराजित किया।

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छात्र राजनीति में सक्रिय रहे रामविलास पासवान बिहार पुलिस की नौकरी छोड़कर सक्रिय राजनीति के मैदान में उतरे। उन्होंने कांशीराम और मायावती की लोकप्रियता के दौर में भी बिहार के दलितों के मजबूत नेता के तौर पर अपनी स्वतंत्र और मजबूत पहचान बनायी। वे भारतीय राजनीति के एक रत्न थे। वन नेशन-वन राशन के ड्रीम प्रोजेक्ट को अमलीजामा पहनाने में उन्होंने अहम भूमिका निभाई। कोरोना महामारी में लॉकडाउन के दौरान गरीबों को फ्री में भोजन एवं राशन उपलब्ध कराने के लिये उन्होंने व्यापक प्रयत्न किये। उन्होंने हमेशा अच्छे मकसद के लिए काम किया, तारीफ पाने के लिए नहीं। खुद को जाहिर करने के लिए जीवन जीया, दूसरों को खुश करने के लिए नहीं। उनके जीवन की कोशिश रही कि लोग उनके होने को महसूस ना करें बल्कि उन्होंने काम इस तरह किया कि लोग तब याद करें, जब वे उनके बीच में ना हों। इस तरह उन्होंने अपने जीवन को एक नया आयाम दिया और जनता के दिलों पर छाये रहे। उनका व्यक्तित्व एक ऐसा आदर्श राजनीतिक व्यक्तित्व है जिन्हें सर्वहारा वर्ग के विकास, संस्कृति, सेवा और सुधारवाद का अक्षय कोष कहा जा सकता है।

-ललित गर्ग

(लेखक, पत्रकार, स्तंभकार)

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