चिंता मत करिये, एक बार फिर मजबूत और स्थिर सरकार ही आने जा रही है

By नीरज कुमार दुबे | May 10, 2019

भाजपा को 2014 के लोकसभा चुनावों में सर्वाधिक सीटें उत्तर भारत से मिली थीं। गत वर्ष हुए विधानसभा चुनावों के बाद ऐसा माहौल बना कि उत्तर भारत से भाजपा गई लेकिन तीन से चार महीनों में भाजपा ने गजब का डैमेज कंट्रोल किया है। उत्तर प्रदेश जहाँ महागठबंधन की वजह से भाजपा को सर्वाधिक नुकसान की संभावनाएँ अधिकांश सर्वेक्षण दर्शा रहे हैं वहां भाजपा एक बार फिर बड़ी जीत की ओर अग्रसर है। यही नहीं आप मध्य प्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा आदि उत्तरी राज्यों को देखेंगे तो यहाँ भी भाजपा का प्रदर्शन कमोबेश 2014 जैसा ही रहने की संभावना है। अब सवाल उठता है कि यह डैमेज कंट्रोल कैसे किया गया और क्यों नहीं यह बात टीवी चैनलों के सर्वेक्षणों में उभर कर आ रही है?

गत वर्ष हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा को जिन बड़े कारणों से नुकसान हुआ था, पार्टी ने उन कारणों पर तुरंत गौर किया। अब एससी-एसटी एक्ट के प्रावधानों को कड़ा बनाने से नाराज हुए सवर्ण समाज को ही लीजिये। सवर्णों ने सपाक्स नामक संगठन बनाकर विधानसभा चुनाव तो लड़ा ही साथ ही नोटा पर बटन दबाने का एक बड़ा अभियान भी चलाया जिससे भाजपा को जबरदस्त नुकसान हुआ। सवर्णों की नाराजगी दूर करने के लिए केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने सवर्णों को आर्थिक आधार पर 10 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था करवायी और इसे संसद से पारित करवा कर लागू भी कर दिया। इस विधेयक को बनाते समय कानूनी रूप से इतना ध्यान दिया गया था कि कहीं यह मामला अदालती चक्कर में उलझ कर ना रह जाये। मोदी सरकार की इस पहल का सवर्ण समाज में सकारात्मक संदेश गया। हमने पिछले डेढ़ महीने के लगातार दौरे में विभिन्न राज्यों के दौरे पर जब लोगों से बात की तो यह चीज उभर कर आयी कि सवर्ण समाज को यह महसूस हो रहा है कि आजादी के बाद किसी सरकार ने उनके लिए कुछ सोचा तो सही, और आज सोचा है तो शायद कल कुछ करेगी भी।

इसके अलावा विधानसभा चुनावों में किसानों की नाराजगी भाजपा की हार का एक बड़ा कारण बनी थी। हमने उत्तरी ही नहीं दक्षिणी, पूर्वी और पश्चिमी राज्यों का भी दौरा किया और किसानों से बातचीत में अधिकांश जगह हमें यही सुनने को मिला कि केंद्र सरकार की किसान सम्मान निधि योजना के तहत भेजी गयी राशि उनके खाते में सीधी और पूरी आ गयी है। भले यह राशि कुछ ज्यादा नहीं हो लेकिन किसान खुश है कि कुछ शुरुआत तो हुई। यही नहीं हम जब विदर्भ के गाँवों में, असम के गाँवों में, उत्तर प्रदेश के गाँवों में गये तो आयुष्मान भारत योजना के लाभार्थियों से मिल कर ऐसा लगा कि शायद किसी सरकार ने इनकी पहली बार बात सुनी है। गाँवों के लोग जब आपसे कहते हैं कि 'भैया मोदीजी ने हमारी इलाज कराने की चिंता खत्म कर दी' तो आपको यकीन होता है कि जमीन पर कुछ काम तो हुआ ही है। 

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भारत का मध्यम वर्ग शुरू से ही भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहा है। यही वह वर्ग है जोकि ईमानदारी से अपना कर समय पर भरता है और देश के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान देता है। लेकिन इस वर्ग की समस्याओं की ज्यादातर सरकारों ने अनदेखी की। इस वर्ष का जब अंतरिम बजट आया तो मोदी सरकार ने पांच लाख रुपए तक की आय को करमुक्त कर के इस वर्ग को बड़ा फायदा तो पहुँचाया ही है साथ ही जीएसटी की दरें कम होने के कारण जब बहुत-सी वस्तुओं की कीमतों में गिरावट आयी है तो निम्न और मध्यम वर्ग को जबरदस्त राहत पहुँची है। हमें उत्तर प्रदेश के कुछ गाँवों में ऐसी महिलायें मिलीं जिन्होंने बताया कि पांच साल पहले हम अरहर की दाल सिर्फ घर में मेहमानों के लिए लाते थे लेकिन अब यह इतनी सस्ती है कि हम इसे खुद के खाने के लिए भी लाते हैं। यह बात आपको भले छोटी-सी लगे लेकिन लोगों के जीवन में क्या परिवर्तन आये हैं, उसकी एक बड़ी बानगी है।

भाजपा ने अपने उन नेताओं को भी साइड लाइन कर दिया है जिनसे कुछ नकारात्मक बातें जुड़ी हैं। अब राजस्थान में वसुंधरा राजे को ही हार का कारण माना गया तो इस बार लोकसभा चुनावों में सारे प्रचार अभियान की कमान खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह संभाले रहे। यही नहीं केंद्र और राज्य इकाई के बीच समन्वय बनाने का काम केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को सौंप दिया गया जिन्होंने चुनावी रणनीति बनाने में राज्य के किसी भी नेता को हावी नहीं होने दिया। इसी प्रकार आप चाहे छत्तीसगढ़ को ले लीजिये, जहाँ रमन सिंह के 15 साल के शासन का अंत हुआ और इस समय रमन सिंह अपने दामाद से जुड़े विवाद में उलझे हुए हैं। वहां भाजपा ने रमन सिंह और उनके बेटे को चुनाव प्रचार में ज्यादा तवज्जो नहीं दी। इसी प्रकार कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा को भी सीमित दायरे में ही रखा गया। 

इसके अलावा भाजपा ने इस पूरे चुनाव को नरेंद्र मोदी पर केंद्रित कर दिया। राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा और मजबूत सरकार का मुद्दा भाजपा ने इस तरह आगे बढ़ाया कि विकास और पिछले चुनाव के वादे पूरे नहीं होने जैसी बातें बहुत पीछे चली गयीं। विपक्ष में नेतृत्व को लेकर जो अस्पष्टता है उसका सीधा-सीधा फायदा भाजपा को मिलने जा रहा है। राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर भी लोग मानते हैं कि यह सरकार खरी उतरी है और मजबूत सरकार नरेंद्र मोदी दे सकते हैं ऐसी जनभावना जम्मू-कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक नजर आती है। मोदी सरकार पर विपक्ष ने भले भ्रष्टाचार के आरोप लगाये लेकिन ज्यादातर लोग उससे सहमत नहीं दिखे। उत्तर भारत में खासतौर पर एक बात और देखने को मिली कि विधानसभा चुनावों में जो भाजपा की तीन राज्यों में हार हुई उससे लोगों का भाजपा के खिलाफ गुस्सा निकल चुका है।

लोग यह भी मानते हैं कि राज्य के चुनावी मुद्दे अलग होते हैं और उसमें क्षेत्रीय पार्टियों को मौका दिया जा सकता है लेकिन जब बात देश की हो तो उसी पार्टी को वोट देना चाहिए जिसकी आर्थिक, विदेश और रक्षा नीति के बारे में भी स्पष्टता हो। इस बार का चुनाव इस मायने में अलग होने जा रहा है कि देश का मतदाता पहले से अधिक जागरूक है और हमें डेढ़ महीने के इस चुनाव प्रचार कवरेज अभियान में यह बात पूरी तरह समझ आ चुकी है कि मतदाता ने एक मजबूत और स्थिर सरकार के लिए मन बना लिया है और उसी के आधार पर मतदान भी हो रहा है। जो लोग त्रिशंकु संसद की संभावना जता रहे हैं वह सब 23 मई को खारिज होने वाले हैं।

-नीरज कुमार दुबे

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