इस बार के विधानसभा चुनावों में दलबदलुओं को जनता ने अच्छा सबक सिखाया है

By नीरज कुमार दुबे | Mar 12, 2022

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ऐन पहले दलबदल करने वाले ज्यादातर विधायकों का दांव खाली गया और ऐसे 80 प्रतिशत जनप्रतिनिधि सियासी संग्राम में सफलता हासिल नहीं कर सके। दलबदल कर विभिन्न राजनीतिक दलों का हाथ थामने वाले इन 21 विधायकों में से सिर्फ चार को ही जीत नसीब हुई है। हम आपको बता दें कि पाला बदलने वाले इन विधायकों में से 9 भाजपा जबकि 10 सपा के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे थे। जिन प्रमुख नेताओं को हार का सामना करना पड़ा उनमें उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य व धर्म सिंह सैनी के अलावा बरेली की पूर्व महापौर सुप्रिया ऐरन शामिल हैं। ये नेता चुनाव से ऐन पहले समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए थे।

उत्तर प्रदेश की ही तरह यदि उत्तराखण्ड की ओर देखें तो वहां भी भाजपा को मटियामेट कर देने के दावे करने वाले यशपाल आर्य और हरक सिंह रावत खुद ही राजनीतिक रूप से मटियामेट हो गये। उत्तराखण्ड की भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे यशपाल आर्य मुख्यमंत्री पद की महत्वाकांक्षा के चलते कहीं के नहीं रहे। ऐन चुनावों से पहले वह अपने बेटे और भाजपा विधायक संजीव आर्य के साथ पार्टी छोड़कर कांग्रेस में चले गये। कांग्रेस ने दोनों विधायक पिता-पुत्र को टिकट भी दे दिया लेकिन बाजपुर विधानसभा सीट से यशपाल आर्य बस हारते-हारते बचे और उनके बेटे संजीव आर्य नैनीताल से चुनाव हार गये। अब यशपाल आर्य के पास विपक्ष में बैठने के अलावा कोई चारा नहीं है। वहीं हरक सिंह रावत की बात करें तो वह भी भाजपा को चुनौती देते हुए चुनावों से पहले पार्टी छोड़ गये थे। हरक सिंह रावत खुद तो चुनाव नहीं लड़े थे लेकिन अपनी पुत्रवधू अनुकृति को कांग्रेस के टिकट पर लैंसडाउन से चुनाव लड़वाया। मगर मोदी लहर को वह भांप नहीं सके और लैंसडाउन से भाजपा जीत गयी। इस तरह हरक सिंह रावत भी अब घर बैठ गये हैं और भाजपा को भी रोजाना रूठने वाले नेताओं से छुटकारा मिल गया है। वहीं ऐन चुनावों के समय कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आये किशोर उपाध्याय और सरिता आर्य विधानसभा चुनाव जीत कर विधायक बन गये। किशोर उपाध्याय को तो नयी भाजपा सरकार में मंत्री बनाये जाने के भी आसार हैं।

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दलबदलुओं के बारे में बात करते हुए यदि आपको वापस उत्तर प्रदेश ले चलें तो आंकड़े बताते हैं कि अदिति सिंह (रायबरेली), अनिल कुमार सिंह (पुरवा) और मनीष कुमार (पड़रौना) ने दलबदल के बाद भाजपा के टिकट पर चुनाव में जीत हासिल की। जबकि योगी आदित्यनाथ सरकार में मंत्री रहे दारा सिंह चौहान ने चुनाव से ठीक पहले सपा का हाथ थामा व घोसी सीट से विजयी रहे। हम आपको याद दिला दें कि अदिति सिंह ने हाल ही में कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामा था और उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की लोकसभा सीट के अंतर्गत आने वाली विधानसभा सीट से प्रत्याशी बनाया गया था। 

दलबदल के बाद जिन विधायकों ने भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत नहीं सके उनमें राकेश सिंह (हरचंदपुर), नरेश सैनी (बेहट) वंदना सिंह (सगड़ी), रामवीर उपाध्याय (सादाबाद), सुभाष पासी (सैदपुर) और हरिओम यादव (सिरसागंज) शामिल हैं। पाला बदलकर सपा के टिकट पर चुनाव लड़कर जीत से वंचित रहे विधायकों में ब्रजेश प्रजापति (तिंदवारी) रौशन लाल वर्मा (तिहर), भगवती सागर (घाटमपुर), दिग्विजय नारायण (खलीलाबाद), माधुरी वर्मा (नानपारा) और विनय शंकर त्रिपाठी (चिल्लूपार) शामिल हैं।

वहीं, रामपुर की स्वार सीट पर कांग्रेस का टिकट ठुकराकर भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन में अपना दल (एस) से चुनाव मैदान में उतरे नवाब परिवार के हैदर अली खान को सपा उम्मीदवार अब्दुल्ला आजम खान ने 61 हजार मतों से हराया। बलिया जिले के बैरिया क्षेत्र में 2017 में भाजपा से चुनाव जीते सुरेंद्र सिंह इस बार टिकट नहीं मिलने पर विद्रोह कर विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) प्रत्याशी के तौर पर मैदान में उतरे, लेकिन मतदाताओं ने उन्हें तीसरे नंबर पर धकेल दिया। अपने विवादित बयानों के लिए सुर्खियों में रहने वाले सुरेंद्र सिंह को 28,615 मत मिले। तो इस प्रकार दलबदलुओं पर से जनता का विश्वास उठता दिख रहा है। जनता सिर्फ विकास की राजनीति को तरजीह देती है। नेताओं की अवसरवादिता को अब वह और सहने के मूड में नहीं है।

-नीरज कुमार दुबे

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