गणतंत्र को बचाए रखने का सिर्फ संकल्प लेने से काम नहीं चलेगा

By ललित गर्ग | Jan 22, 2019

यही वह 26 जनवरी का गौरवशाली ऐतिहासिक दिन है जब भारत ने आजादी के लगभग 2 साल 11 महीने और 18 दिनों के बाद इसी दिन हमारी संसद ने भारतीय संविधान को पास किया। खुद को संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित करने के साथ ही भारत के लोगों द्वारा 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। लेकिन आज भी हमारा गणतंत्र कितनी ही कंटीली झाड़ियों में फँसा हुआ प्रतीत होता है। अनायास ही हमारा ध्यान गणतंत्र की स्थापना से लेकर 'क्या पाया, क्या खोया' के लेखे−जोखे की तरफ खिंचने लगता है। इस ऐतिहासिक अवसर को हमने मात्र आयोजनात्मक स्वरूप दिया है, अब इसे प्रयोजनात्मक स्वरूप दिये जाने की जरूरत है। इस दिन हर भारतीय को अपने देश में शांति, सौहार्द और विकास के लिये संकल्पित होना चाहिए। कर्तव्य−पालन के प्रति सतत जागरूकता से ही हम अपने अधिकारों को निरापद रखने वाले गणतंत्र का पर्व सार्थक रूप में मना सकेंगे। और तभी लोकतंत्र और संविधान को बचाए रखने का हमारा संकल्प साकार होगा।

गणतंत्र के सूरज को राजनीतिक अपराधों, घोटालों और भ्रष्टाचार के बादलों ने घेर रखा है। हमें किरण−किरण जोड़कर नया सूरज बनाना होगा। हमने जिस संपूर्ण संविधान को स्वीकार किया है, उसमें कहा है कि हम एक संपूर्ण प्रभुत्व−संपन्न, समाजवादी, पंथ−निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य हैं। यह सही है और इसके लिए सर्वप्रथम जिस इच्छा−शक्ति की आवश्यकता है, वह हमारी शासन−व्यवस्था में सर्वात्मना नजर आनी चाहिए और ऐसा नहीं हो पा रहा है, तो उसके कारणों की खोज और उन्हें दूर करने के प्रयत्न इस गणतंत्र दिवस पर चर्चा का मुख्य मुद्दा होना चाहिए।

एक राष्ट्र के रूप में हमने कुछ संकल्प लिए थे जो हमारे संविधान और उसकी प्रस्तावना के रूप में आज भी हमारी अमूल्य धरोहर हैं। संकल्प था एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, समतामूलक और लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने का जिसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने का पूर्ण अधिकार होगा। नागरिक के इन 'मूल अधिकारों' में समता का अधिकार, संस्कृति का अधिकार, शोषण के विरुद्ध अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार तथा सांविधानिक उपचारों का अधिकार उल्लिखित है। अपने मूल अधिकारों की रक्षा और इनको नियंत्रित करने की विधियां भी संविधान में स्पष्ट हैं। इनके लिये हमारे संकल्प हमारी राष्ट्रीय अस्मिता की पहचान हैं जिन्हें हम हर वर्ष 26 जनवरी को एक भव्य समारोह के रूप में दोहराते हैं। लेकिन यह भी सच है कि आजादी के बाद से जहां हमने बहुत कुछ हासिल किया, वहीं हमारे इन संकल्पों में बहुत कुछ आज भी आधे−अधूरे सपनों की तरह हैं। भूख, गरीबी, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, सांप्रदायिक वैमनस्य, कानून−व्यवस्था, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं जैसे तमाम क्षेत्र हैं जिनमें हम आज भी अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर पाए हैं। हालांकि इन्हें लेकर हमारे कदम लगातार सकारात्मक दिशा की ओर बढ़ रहे हैं। इसके लिए जरूरी है कि एक राष्ट्र के रूप में हम इन संकल्पों को लगातार याद रखें और दोहराएं।

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समाजवादी मूल्यों से प्रभावित एक समतावादी समाज की कल्पना और उसे तैयार करने के हमारे संकल्प सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक तीनों स्तर पर अब तक पूर्णतः सफल नहीं रहे। उदाहरण के लिए, जब हमने समाज से जातिगत भेद−भाव को दूर करने का प्रयास किया तो उसे राजनैतिक पनाह मिल गई। नतीजन, दबे−कुचलों के बीच भी कई सामंत फलने−फूलने लगे। कुछ शोषित शक्तिसंपन्न तो जरूर हुए पर शोषित समाज वहीं−का−वहीं रहा। फर्क सिर्फ इतना हुआ कि कल तक जो समाज उपेक्षित था, आज तो 'वोट−बैंक' बन गया। यही कारण है कि हर बार की तरह इस बार के पांच राज्यों के चुनाव में जाति एवं धर्म के आधार पर वोट की राजनीति न करने का प्रस्ताव सामने आया है और यह चुनाव आयोग के लिये एक चुनौती के रूप में खड़ा है।

अपने देश में हमने सामाजिक न्याय के लिए कदम तो उठाए पर सामाजिक सौहार्द बनाए रखने की जरूरत को भूल कर। हमने सिर्फ और सिर्फ आरक्षण की राजनीति से सामाजिक न्याय को परिभाषित करना चाहा। नतीजतन, समाज दो टुकड़े नहीं बल्कि टुकड़े−टुकड़े में विखंडित हो गया। आज बार−बार होने वाली जाट, गुर्जर, मीणा और अन्य जातियों की आपसी कलह और आरक्षण के लिए आंदोलन देश की रफ्तार को रोक देते हैं और कोई सरकार कुछ करने में विफल दिखती है। निश्चय ही यह नीति नहीं राजनीति की विफलता है। अगड़े−पिछड़ों की लड़ाई अब पिछड़ों और अति पिछड़ों तथा दलित और महादलित की लड़ाई बन चुकी है। 

सामाजिक और राजनैतिक स्तर पर देश एक संक्रमण−काल से गुजर रहा है। सर्वव्यापी भ्रष्टाचार एक राष्ट्रव्यापी मुद्दा बन चुका है। अचानक घोटालों की संख्या और उनके वित्तीय आकार ने मानो इस राजनैतिक व्यवस्था में हमारे विश्वास की जड़ें हिला दी हैं। हर घोटाले के साथ जुड़े चेहरे जब उजागर होते हैं। आम आदमी विश्वास करे तो किस पर? इस हमाम में तो सभी नंगे दिखते हैं अब चाहे वो राजनैतिक गुरु हों या आध्यात्मिक।

आज हमारी समस्या यह है कि हमारी ज्यादातर प्रतिबद्धताएं व्यापक न होकर संकीर्ण होती जा रही हैं जो कि राष्ट्रहित के खिलाफ हैं। राजनैतिक मतभेद भी नीतिगत न रह कर व्यक्तिगत होते जा रहे हैं। नतीजन, लोकतांत्रिक परम्पराओं की दुहाई देते हुए भ्रष्टाचार एवं कालेधन जैसे गंभीर मुद्दों पर नियंत्रण के लिये की गयी नोटबंदी भी सकारात्मक रूप नहीं ले पायी। भ्रष्टाचार एवं कालेधन पर विरोध करने वाले भी सिर्फ राजनैतिक गुटबंदी और गतिरोध का मुजाहिरा ही बन कर रह गये हैं। लोकतंत्र में जनता की आवाज की ठेकेदारी राजनैतिक दलों ने ले रखी है, पर ईमानदारी से यह दायित्व कोई भी दल सही रूप में नहीं निभा रहा है। "सारे ही दल एक जैसे हैं" यह सुगबुगाहट जनता के बीच बिना कान लगाए भी स्पष्ट सुनाई देती है। क्रांति तो उम्मीद की मौजूदगी में ही संभव होती है। हमारे संकल्प अभी अधूरे हैं पर उम्मीदें पुरजोश। हम एक असरदार सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक क्रांति की आस लगाए बैठे हैं। इसे शांतिपूर्ण तरीके से हो ही जाना चाहिए बिना किसी बाधा के। गणतंत्र दिवस का अवसर इस तरह की सार्थक शुरूआत के लिये शुभ और श्रेयस्कर हैं।

गणतंत्र बनने से लेकर आज तक हमने अनेक कीर्तिमान स्थापित किये हैं। इन पर समूचे देशवासियों को गर्व है। लेकिन साक्षरता से लेकर महिला सुरक्षा जैसे कई महत्वपूर्ण मोर्चों पर अभी भी बहुत काम करना बाकी है। आज देश में राष्ट्रीय एकता, सर्वधर्मसमभाव, संगठन और आपसी निष्पक्ष सहभागिता की जरूरत है। क्योंकि देश के करोड़ों गरीब उस आखिरी दिन की प्रतीक्षा में हैं जब सचमुच वे संविधान के अन्तर्गत समानता एवं सन्तुलन के अहसास को जी सकेंगे। उन्हें साधन उपलब्ध कराए जाएंगे, क्योंकि देश की गरीबी अभिशाप होती है। और सच भी यही है कि अमीरी और गरीबी के फासले ही नैतिक फैसले नहीं होने देते। गरीब अपना हक, न्याय पाने के लिए बैसाखियों को ढूंढ़ता रह जाता है और अमीरों की विरासत रातों−रात अपना खेल कर जाती है। भ्रष्टाचार के काले कारनामों पर डाले गए ईमानदारी के मुखौटों को उतारने में सबूतों और गवाहों की खोज में इतना विलम्ब हो जाता है कि सच भी सवालों के घेरे में बंदी बनकर खड़ा रह जाता है। इन विसंगतियों एवं विषमताओं को दूर करने के साथ−साथ हमें शिशु मृत्यु दर को नियंत्रित करना होगा, सड़क हादसों एवं रेल दुर्घटना पर काबू पाना होगा, प्रदूषण के खतरनाक होते स्तर को रोकना होगा, संसद में होने वाले व्यवधान एवं न्यायपालिका में लंबित होते मामले भी अहम मुद्दे हैं। बेरोजगारी का बढ़ना एवं महिलाओं का शोषण भी हमारी प्रगति पर ग्रहण की तरह है।

देश का प्रत्येक नागरिक अपने दायित्व और कर्तव्य की सीमाएं समझें। विकास की ऊंचाइयों के साथ विवेक की गहराइयां भी सुरक्षित रहें। हमारा अतीत गौरवशाली था तो भविष्य भी रचनात्मक समृद्धि का सूचक बने। बस, वर्तमान को सही शैली में, सही सोच के साथ सब मिल जुलकर जी लें तो विभक्तियां विराम पा जाएंगी। सरकार संचालन में जो खुलापन व सहजता होनी चाहिए, वह गायब है। सहजता भी सहजता से नहीं आती। पारदर्शिता का दावा करने वाले सत्ता की कुर्सी पर बैठते ही चालबाजियों का पर्दा डाल लेते हैं। पर एक बात सदैव सत्य बनी हुई है कि कोई पाप, कोई जुर्म व कोई गलती छुपती नहीं। वह रूस जैसे लोहे के पर्दे को काटकर भी बाहर निकल आती है। वह चीन की दीवार को भी फाँद लेती है। 

आज उद्देश्यों की ऊंचाइयों तक पहुंचने के लिए औरों की बैसाखियं नहीं चाहिए। हमें खुद सीढ़ियां चढ़कर मंजिल तक पहुंचना है। अपनी क्षमताओं पर अविश्वास पर ज्योतिषियों के दरवाजे नहीं खटखटाने हैं। हमें खुद ब्रह्मा बनकर अपना भाग्यलेख लिखना है। औरों के विचारों पर अपना घर नहीं बनाना है। उद्देश्यों को सुरक्षा देने वाली उन दीवारों से घर बनाने का प्रयत्न करना है जो हर मौसम में धूप−छांव दे सके। संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य होने के महत्व को सम्मान देने के लिये मनाया जाने वाला यह राष्ट्रीय पर्व मात्र औपचारिकता बन कर न रह जाये, इस हेतु चिन्तन अपेक्षित है।

- ललित गर्ग

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