कांग्रेस के 'हाऊ इज द जोश' सवाल का जवाब जनता चुनावों में देगी

By राकेश सैन | Jan 08, 2022

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार ने हाल ही में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में पटाक्षेप किया कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील मोर्चा सरकारों में वह और स. मनमोहन सिंह नहीं चाहते थे कि गुजरात के तत्कालीन मुख्यमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ विद्वेष पाला जाए। उस समय कुछ लोगों द्वारा मोदी के खिलाफ राजनीतिक बदले की कार्रवाईयां हुईं। जिस दल के लोग सत्ता में रहते हुए मोदी के विरुद्ध राजनीतिक बदलाखोरी की कार्रवाईयां करते रहे वे आज विपक्ष में आकर पागलपन की सीमा तक उनका विरोध करते दिख रहे हैं। पंजाब में उनकी सुरक्षा को लेकर हुई चूक की घटना ने साबित कर दिया है कि इन लोगों को सत्ता के लिए मोदी या किसी की भी जान को संकट में डालना पड़े तो उन्हें गुरेज नहीं।

इस किस्म के ये कांग्रेसी नेता अपनी ही पार्टी के कुछ सुलझे हुए जिम्मेवार नेताओं के संयत बयानों की अनदेखी कर यही साबित कर रहे हैं कि ये पार्टी वैचारिक रूप से किस तरह बिखरी हुई है। साफ है कि प्रधानमन्त्री की सुरक्षा से खिलवाड़ पर छिछले बयान दे रहे कांग्रेसी मामले की गम्भीरता को समझने से इनकार कर रहे हैं। यह उसी दल के नेता हैं जिसने श्रीमती इन्दिरा गान्धी, श्री राजीव गान्धी व स. बेअन्त सिंह के रूप में अनेक वरिष्ठ नेता आतंकियों के हाथों खोए हैं। पंजाब की कांग्रेस सरकार व इस दल को आभास होना चाहिए कि पुलिस की ढिलाई से सड़क पर आ धमके प्रदर्शनकारियों के कारण प्रधानमन्त्री का काफिला एक फ्लाईओवर पर करीब 15-20 मिनट तक फंसा रहा। पाकिस्तानी सीमा के निकट सुरक्षा और तस्करी की दृष्टि से अत्यन्त संवेदनशील इलाके में ऐसा होना अकल्पनीय ही नहीं, शर्मनाक और चिन्तनीय भी है। ऊपर से कांग्रेसी नेताओं के स्तरहीन ब्यान और इसी तरह की राजनीति अशोभनीय भी है। ठीक है कि लोकतन्त्र में विपक्ष का काम विरोध करना भी है परन्तु केवल विरोध के लिए विरोध और इसके लिए प्रधानमन्त्री की सुरक्षा से समझौते को उचित ठहराया जा सकता है? विरोध के नाम पर ये पागलपन नहीं तो क्या है ?

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कांग्रेस की हालत पर शरद पवार ने ही पिछले साल 10 सितम्बर को एक मीडिया समूह के कार्यक्रम में कहानी सुनाई। कहानी अनुसार, ‘उत्तर प्रदेश के जमींदारों के पास काफी जमीन और बड़ी हवेलियां थीं। भूमि नियन्त्रण अधिनियम से जमीन कम हो गई, हवेलियां बनी रहीं लेकिन उनकी मरम्मत की क्षमता जमींदारों की नहीं रही। हजारों एकड़ से सिमटकर उनकी जमीन 15-20 एकड़ रह गई। एक बार जमींदार सुबह उठा, उसने आसपास के हरेभरे खेतों को देखा और कहा कि सारी जमीन जो है, वो हमारी खानदानी है।’ यही हालत कांग्रेस की है, किसी समय केन्द्र के साथ-साथ कश्मीर से कन्याकुमारी तक सभी राज्यों में उसकी सरकारें थीं जो अब कुछ राज्यों तक सिमट गईं। पार्टी लोकसभा में विपक्षी नेता के पद को भी तरस रही है परन्तु लगता है वह दिल से स्वीकार नहीं पाई है कि उसके सुख भरे दिन बीत चुके। वह येन केन प्रकारेण दोबारा सत्ता हासिल करना चाहती है और इसके लिए उसे किसी भी सीमा तक जाना पड़े तो वह मौका नहीं छोड़ती।

कांग्रेस संसद से सड़क तक को अवरुद्ध कर मोदी सरकार के लिए असुखद स्थिति पैदा करने का प्रयास करती है। केवल विरोध के लिए विरोध कितना उचित है ? जिस आर्थिक सुधारों का ढिण्ढोरा पीट कर वह अपनी पीठ थपथपाती नहीं अघाती, जब मोदी सरकार उन्हीं सुधारों को आगे बढ़ाती है तो उसका विरोध क्यों किया जाता है ? वह क्यों उन कानूनों का विरोध करती है जिसे बनाने का वायदा अपने चुनावी घोषणापत्रों में करती है ? देश की सुरक्षा, विदेश नीति, सुरक्षा सेनाओं, आतंकवाद जैसे सर्वमान्य माने जाने वाले मुद्दों पर देश का मनोबल तोड़ने वाला दृष्टिकोण क्यों पेश करती है? जब संवैधानिक तरीकों से काम नहीं चलता तो क्या प्रधानमन्त्री की सुरक्षा तक को दांव पर लगा दिया जाना चाहिए ? विरोध का यह कौन-सा तरीका है ? अगर ये विपक्ष का विरोध है तो फिर पागलपन किसे कहते हैं ?

संविधान सभा में सदस्यों का आभार व्यक्त करते हुए बाबा साहिब भीमराव रामजी आम्बेडकर ने कहा था कि- स्वतन्त्रता के बाद हमें आन्दोलन और प्रदर्शन जैसे असंवैधानिक तरीके त्याग देने चाहिएं। जब देश को संवैधानिक अधिकार नहीं थे तब उक्त तरीकों की सार्थकता थी परन्तु अब हमारे हाथ में मताधिकार, संसद, विधान मण्डलों के रूप में संवैधानिक तरीके हैं और अपनी अपेक्षाएं पूरी करने के लिए इन्हीं का सहारा लेना चाहिए। शाहीन बाग और किसान आन्दोलन पर बाबा साहिब से मिलती जुलती राय सर्वोच्च न्यायालय भी व्यक्त कर चुका है कि अपनी बात रखने का हर किसी को अधिकार है परन्तु इसके लिए सड़कों को नहीं रोका जा सकता। सड़कें-रेल मार्ग आवागमन के लिए हैं न कि आन्दोलन के लिए। एक साल तक चले किसान आन्दोलन से देश को कितना नुक्सान उठाना पड़ा और भारत की छवि पर इसका क्या प्रभाव पड़ा इस पर पहले ही बहुत कुछ लिखा व कहा जा चुका है। पिछले सप्ताह ही पंजाब के खन्ना जिले में नौकरी मांग रहे आन्दोलनकारी युवाओं के बीच रोगी-वाहिनी फंस गई। उसमें सवार महिला लाख अनुनय-विनय करती रही परन्तु युवाओं ने रास्ता नहीं दिया जिससे उस महिला का एक साल का बच्चा ईलाज के अभाव में संसार छोड़ गया। विरोध के नाम पर यह पागलपन नहीं तो क्या है ? क्या सत्ता की कुर्सियां, सरकारी नौकरियां मानव जीवन से भी अधिक कीमती हो गईं?

-राकेश सैन

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