छायावाद व प्रकृति के सुकुमार चितेरे कवि सुमित्रानंदन पंत

By देवेन्द्रराज सुथार | Dec 28, 2018

'वियोगी होगा पहला कवि, 

निकलकर आंखों से चुपचाप, 

बही होगी कविता अनजान..।' 

ये पंक्तियां प्रकृति के सुकुमार कवि व छायावाद के चार स्तंभों में से एक, सर्वथा अनूठे और विशिष्ट कवि सुमित्रानंदन पंत की हैं, जिनकी आज पुण्यतिथि है। अपनी कविताओं में प्रकृति की सुवास को चहुंओर बिखेरने वाले चितेरे कवि सुमित्रानंदन पंत का जन्म अल्मोड़ा (उत्तर प्रदेश) के कौसानी गांव में 20 मई, 1900 को हुआ था। जन्म के कुछ समय बाद ही मां का निधन होने से उन्होंने प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण अपने गांव की प्रकृति को ही अपनी मां मान लिया।

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बाल्यकाल से ही अल्मोड़ा में हारमोनियम और तबले की धुन पर गीत गाने के साथ ही उन्होंने सात वर्ष की अल्पायु में अपनी सृजनशीलता व रचनाधर्मिता का परिचय देते हुए काव्य सृजन करना शुरू कर दिया। नन्हीं उम्र में नेपोलियन की तस्वीर को देखकर उनकी तरह अपने बालों को ताउम्र बड़े रखने का निर्णय लेने के साथ ही उन्होंने अपने नाम गुसाई दत्त को बदलकर सुमित्रानंदन पंत रख लिया। अपने नम्र व मधुर स्वभाव, गौरे वर्ण, आंखों पर काला चश्मा और लंबे रेशमी घुंघराले बाल एवं शारीरिक सौष्ठव के कारण वे हमेशा कवियों के मध्य आकर्षण का केंद्र रहें। पंत को बचपन से ही ईश्वर में अटूट आस्था थीं। वे घंटों घंटों तक ईश्वर के ध्यान में मग्न रहते थे। अपने काव्य सृजन को भी ईश्वर पर आश्रित मानकर कहते थे- 'क्या कोई सोचकर लिख सकता है भला, उसे जब लिखवाना होगा, वो लिखवाएगा।' उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा अल्मोड़ा से लेने के बाद अपने बड़े भाई देवीदत्त के साथ आगे की शिक्षा के लिए काशी आकर क्वींस कॉलेज में दाखिला लिया और अपनी कविताओं से सबके चहेते बन गए। पंत 25 वर्ष तक केवल स्त्रीलिंग पर कविता लिखते रहें। वे नारी स्वतंत्रता के कटु पक्षधर थे। उनका कहना था कि 'भारतीय सभ्यता और संस्कृति का पूर्ण उदय तभी संभव है, जब नारी स्वतंत्र वातावरण में जी रही हो।' वे स्वयं कहते हैं- 

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'मुक्त करो नारी को मानव, 

चिर वन्दिनी नारी को। 

युग-युग की निर्मम कारा से, 

जननी सखि प्यारी को।'

वे गांधी से बेहद ही प्रभावित रहे, जिन परिस्थितियों में गांधी ने अहिंसा का प्रयोग किया वो शायद ही कोई कर सकता है। उन्होंने अपना रचना धर्म निभाते हुए गांधी के असहयोग आंदोलन में भी योगदान दिया। इस बीच उन्हें आर्थिक तंगहाली से भी गुजरना पड़ा। स्थिति इतनी विकट हुई कि उन्हें अल्मोड़ा की जमीन जायदाद बेचने के साथ कर्ज चुकाने के लिए अपना पुश्तैनी घर भी बेचना पड़ा। इसी दरमियान अपने भाई और बहन के आकस्मिक निधन के आघात से उनके पिता भी चल बसे। 28 वर्ष की उम्र में इतने आघात सहने के बाद पंत विरक्ति की भावना में डूब गए। लेकिन, जल्द ही 1931 में कालाकांकर जाकर अपने मकान नक्षत्र में कई कालजयी कृतियों की रचना की। पंत ताउम्र अविवाहित रहें। उनकी शादी में उनकी आर्थिक स्थिति बाधक रही। सच्चाई यह है कि पंत ने ईश्वर को पाने के सिवाए कभी व्यक्तिगत सुख की जीवन में चाह नहीं रखी। जिनका मन प्रकृति और ईश्वरीय आराधना में रम गया हो, वे आखिर किसी सुंदरी के भ्रम जाल में कैसे फंस सकते हैं। बकौल कवि पंत- 


'छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, 

तोड़ प्रकृति से भी माया, 

बाले ! तेरे बाल-जाल में

कैसे उलझा दूं लोचन?'

इसके बावजूद भी पंत के काव्य में नारी के विविध रूपों मां, पत्नी, सखी, प्रिया आदि सम्मान पाते हुए मिलते हैं। सन 1955 से 1962 तक वे प्रयाग स्थित आकाशवाणी स्टेशन में मुख्य कार्यक्रम निर्माता तथा परामर्शदाता रहे और भारत में जब टेलीविजन के प्रसारण प्रारंभ हुए, तो उसका भारतीय नामकरण 'दूरदर्शन' उन्होंने ही किया। खास बात यह है कि सदी के महानायक अमिताभ बच्चन का नामकरण भी उन्होंने किया। अमिताभ बच्चन के पिता कवि हरिवंशराय बच्चन और पंत दोनों अच्चे मित्र थे। सन 1971 में पंत की मामेरी बहन शांता दो वर्ष की बच्ची को गोद ले आई। पंत ने उसका नाम सुमिता रखा। सुमिता के आने से मानो उनके जीवन का बचपन लौट आया और उन्हें जीने की एक नई प्रेरणा मिल गई। 

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पंत के कृतित्व की बात करें तो उन्होंने चींटी, सेम, पल्लव जैसे विषयों पर कविता लिखकर घोषणा की कि हिंदी काव्य अब तुतलाना छोड़ चुका है। ब्रज भाषा के सौंदर्य में नहाती, कान्हा के विरह अग्नि में जलती गोपियों के बाद हिन्दी काव्य कालिदास के प्रकृति से जुड़े जिन उपमानों को भूल गया था, पंत उन्हें वापस लेकर आए। पंत ने भले ही अपने काव्य में सार्वधिक प्रकृति के सुकोमल पक्ष की प्रबलता की हो, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उन्होंने नारी चेतना और उसके सामाजिक पक्ष के साथ ही ग्राम्य जीवन की विसंगतियों को भी उजागार किया है। भाषा के समृद्ध और सशक्त हस्ताक्षर व संवेदना एवं अनुभूति के कवि सुमित्रानंदन पंत ने चिदंबरा, उच्छवास, वीणा, गुंजन, लोकायतन समेत अनेक काव्य कृतियों की रचना की हैं। गुंजन को तो वे अपनी आत्मा का गुंजन मानते हैं। पंत की प्रारंभिक कविताएं 'वीणा' में संकलित हैं। उच्छवास तथा पल्लव उनकी छायावादी कविताओं का संग्रह है। ग्रंथी, ग्राम्या, युगांत, स्वर्ण किरण, स्वर्ण धूलि, कला और बूढ़ा चांद, सत्यकाम आदि उनकी अन्य प्रमुख कृतियां हैं। उन्होंने गेय और अगेय दोनों में अपनी लेखन कला का लौहा मनवाया है। साहित्य में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें पद्मभूषण, ज्ञानपीठ, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार से विभूषित किया गया और 28 दिसंबर,1977 को हृदयाघात के कारण उनका निधन हो गया।  

- देवेन्द्रराज सुथार

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