By दिव्यांशी भदौरिया | Sep 26, 2026
धार्मिक शास्त्रों में पितृ पक्ष का महीना बेहद पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है। विष्णु पुराण से लेकर गरुड़ पुराण के साथ-साथ भविष्य पुराण में महर्षि विश्वामित्र के हवाले से श्राद्ध के विभिन्न रुपों में वर्णन देखने को मिलता है। आज यानी 26 सितंबर से पितृपक्ष की शुरुआत हो चुकी है और इसका समापन आश्विन अमावस्या पर होगा। इन 16 दिनों में विधिवत रुप से पितरों का तर्पण किया जाता है, जिससे हमारे पूर्वजों की आत्मा तृप्त होती है और वह अपने परिवार पर हमेशा सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
वहीं, भारत में अलग-अलग क्षेत्रों में इसे विभिन्न नामों से जाना जाता है। जैसे कि उत्तर भारत व उत्तर-पूर्व भारत में श्राद्ध पक्ष कहा जाता है, वहीं तमिलनाडु में इसे 'आदि अमावसाई', केरल में 'करिकडा वावुबली' और महाराष्ट्र में ' 'पितृ पंधरवडा' कहा जाता है। आइए आपको इस लेख में बताते हैं श्राद्ध के 12 प्रकार, जिसके बारे में आपको जरुर पता होना चाहिए।
श्राद्ध के 12 प्रमुख प्रकार
नित्य श्राद्ध: रोजाना बिना किसी स्पेशल काम्य भावना के जल, तिल व अन्न से किया जाने वाला सामान्य श्राद्ध।
नैमित्तिक श्राद्ध: किसी एक विशेष पितर की वार्षिक मृत्यु तिथि पर संपन्न किया जाने वाला श्राद्ध।
काम्य श्राद्ध: किसी भी विशेष मनोकामना या सिद्धि की प्राप्ति हेतु किया जाने वाला श्राद्ध।
नान्दी श्राद्ध: अपने घर में किसी प्रकार के मांगलिक कार्य या शुभ अवसर के समय किया जाने वाला श्राद्ध।
पार्वण श्राद्ध: पितृपक्ष की तिथियों, पर्वों या अमावस्या तिथि पर किया जाने वाले प्रमुख श्राद्ध।
सपिण्डन श्राद्ध: किसी व्यक्ति की मृत्यि के पश्चात प्रेत-पिंड को पितृ-पिंड में सम्मिलित करने हेतु किया जाने वाले श्राद्ध ( यह आत्मा को पितरों से मिलन कराता है)।
गोष्ठी श्राद्ध: किसी भी परिवार , कुल या स्वजातीय समूह के लोगों द्वारा सामूहिक रूप से किया जाने वाला श्राद्ध।
शुद्धयर्थ श्राद्ध: आत्म-शुद्धि एवं पापों के क्षलन के उद्देश्य से किया जाने वाला श्राद्ध।
कर्मांग श्राद्ध: जीवन के 16 संस्कारों (जैसे कि गर्भाधन, नामकरण, उपनयन आदि) के अवसर पर किया जाने वाला श्राद्ध।
दैविक श्राद्ध: इस श्राद्ध के जरिए देवताओं की कृपा प्राप्त करने मुख्य उद्देश्य का श्राद्ध।
यात्रार्थ श्राद्ध: तीर्थ यात्रा पर जाने से पूर्व या तीर्थ स्थानों (जैसे कि गया, प्रयागराज) में जाकर किया जाने वाला श्राद्ध।
पुष्ट्यर्थ श्राद्ध (वृद्धि श्राद्ध): इसके खुद व परिवार की आर्थिक उन्नति, सुख-समृद्धि संतान प्राप्ति एवं विवाह आदि वृद्धि कारक अवसरों हेतु किया जाने वाला श्राद्ध है।
आखिर प्रेत श्राद्ध क्या है?
जब किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, तो उसके देह त्यागने से लेकर सपिंडीकरण (सपिण्डन श्राद्ध) होने तक की अवधि में जो श्राद्ध कर्म किए जाते हैं, उन्हें प्रेत श्राद्ध के नाम से जाना जाता है। मुत्यु के पश्चात जीवात्मा प्रेत योनि के सूक्ष्म प्रभाव में रहती है। उन्हें इस कष्टदायक स्थिति से मुक्त करने, मार्ग में संबल प्रदान करने और उसे पितृलोक में स्थान दिलाने के उद्देश्य से 10 गात्र श्राद्ध, एकादशाह (11वें दिन का श्राद्ध) और द्वादशाह (12वें दिन का श्राद्ध) जैसे प्रेत श्राद्ध संपन्न किए जाते हैं। जब यह पूर्ण हो जाता है, आत्मा प्रेत भाव से मुक्त होकर पितरों की श्रेणी में चली जाती है।