चाय पर राजनीति (व्यंग्य)

By - डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ | Nov 29, 2024

यह एक छोटे से गाँव का दृश्य था, जहाँ हर बात पर गहमा-गहमी मचती थी, लेकिन सबसे ज़्यादा शोर उस चाय की दुकान पर होता था, जहाँ हर किसी की राय बनती और हर विवाद का समाधान मिलता था। चाय न हो, तो यहां का माहौल अधूरा रहता। और यदि चाय हो, तो भले ही हलचल हो, मगर समस्या सुलझती नहीं।


गाँव के चौक पर स्थित एक छोटी सी चाय की दुकान थी, जिसका मालिक रामनाथ, न केवल चाय बनाने में माहिर था, बल्कि राजनीति के गहरे घाघ भी थे। हर दिन सुबह-सुबह वह अपने दुकानदार मित्रों को "चाय पर राजनीति" का पाठ पढ़ाते। हर एक चर्चा का अंतिम निष्कर्ष यही होता कि अगर नेताओं को चाय पर बुला लिया जाए तो हर समस्या का समाधान हो सकता है। उन्होंने कभी भी किसी समस्या को गंभीरता से नहीं लिया, सिर्फ उसे घुमा-फिराकर हल कर दिया।

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आज भी कुछ ऐसा ही हो रहा था। चाय की दुकानदारों की टोली (जिसमें विशेष रूप से पन्नालाल और सत्तू थे) और गाँव के कुछ "महान" नागरिक रामनाथ के चाय के प्यालों के आस-पास घेरा डाले बैठे थे, और बड़े आराम से एक राष्ट्रीय संकट पर चर्चा कर रहे थे।


"क्या तुम जानते हो, सत्तू भाई?" पन्नालाल ने जैसे ही सवाल पूछा, उसकी आँखों में एक उत्साही भाव था, "अगर हमारे गाँव के नेता चुनावी बहस में हारे, तो क्या होगा?"


सत्तू ने अपनी चाय की प्याली को एक कश लिया और कहा, "पन्नालाल भाई, चुनाव तो वैसे भी हमारे गाँव में एक खेल बन गया है। एक महीने पहले जो 'नेता' थे, वे अब चायवाले बन गए हैं, और जो चायवाले थे, वे अब नेता बन गए हैं।"


रामनाथ ने मुस्कुराते हुए कहा, "अरे! यह तो हमारा ही गाँव है। यहाँ नेता बनने का यही तरीका है। बस चुनाव से पहले थोड़ा सा शेर बनने का ढोंग करो, और बाद में बकरा बनकर गाँववालों से मिन्नतें करो।"


सत्तू ने इसे गंभीरता से लिया और कहा, "बिलकुल, रामनाथ भाई! आप तो जानते ही हैं, अब गाँव में हर कोई अपनी बात रखता है, लेकिन जब चुनाव नजदीक आते हैं, तब सब लोग अपने-अपने बर्तन में पानी भरने लगते हैं।"


पन्नालाल ने चाय की चुस्की लेते हुए चुटकी ली, "यही तो असली राजनीति है, सत्तू भाई। यहाँ के नेताओं का काम है, सबको धोखा देना, और फिर चाय की प्याली लेकर सबका दिल बहलाना।"


उसी वक्त गाँव के एक पुराने नेता, जिनका नाम लख्खू था, आकर रामनाथ के पास बैठ गए। वह अपनी आँखों में गहरी चिंता के साथ बोले, "तुम दोनों क्या समझते हो? गाँव में नेता होना बहुत कठिन काम है। हर समय जनता के बीच रहते हुए भी अपनी शान बनाए रखना, यह कोई आसान काम नहीं है।"


रामनाथ ने हंसी रोकते हुए कहा, "लख्खू भाई, आप ठीक कह रहे हैं, लेकिन हमारा गाँव हमेशा से ही राजनीति का गढ़ रहा है। यहाँ हर कोई अपनी बत्ती की मच्छरदानी के भीतर खुश रहता है। नेताओं का काम बस इतना है कि जनता को छोटे-छोटे वादे दें और फिर आराम से बैठकर चाय पीते रहें।"


लख्खू ने चिढ़ते हुए कहा, "तुम लोग क्या समझते हो? क्या चाय के प्यालों से राजनीति चलती है?"


"नहीं, लख्खू भाई," रामनाथ ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा, "लेकिन चाय के प्यालों से राजनीति की सच्चाई समझी जा सकती है। जब तक चाय गरम रहती है, तब तक सब खुश रहते हैं। जैसे ही चाय ठंडी होती है, लोग शिकायत करने लगते हैं। यही राजनीति का खेल है।"


लख्खू ने कुंठित होकर कहा, "तुम दोनों तो बहुत बड़े समझदार हो गए हो। अगर इतनी समझ होती तो हम भी कुछ करते। अब देखो, हमारी पार्टी से हर कोई उम्मीदवार बना हुआ है, और हर किसी के पास अपना-अपना चाय का स्टॉल है।"


रामनाथ और सत्तू दोनों की हँसी फूट पड़ी। फिर सत्तू ने अपनी चाय की प्याली को रामनाथ की ओर बढ़ाते हुए कहा, "वो दिन दूर नहीं, जब नेता अपने वोट पाने के लिए चायवाले से सलाह लें और चाय पर राजनीति की बातें करें।"


लख्खू उखड़ते हुए उठ खड़ा हुआ और बोला, "तुम दोनों कभी कुछ नहीं समझ पाओगे। राजनीति चाय नहीं है, यह तो मेहनत का काम है!"


रामनाथ ने उसकी ओर देखा और कहा, "तुम सही कह रहे हो लख्खू भाई, लेकिन जो मेहनत से राजनीति की राह पर चला, वही आज चाय का स्टॉल खोलकर खुश है।"


लख्खू ने गुस्से में अपनी चाय की प्याली रखी और चुपचाप चला गया।


रामनाथ और सत्तू हँसी में डूबे रहे, और पन्नालाल ने कहा, "देखा, अब चाय की चुस्की के बाद भी वह राजनीति की गहरी सोच में खो गया।"


"बिलकुल, पन्नालाल भाई," रामनाथ ने मुस्कुराते हुए कहा, "यहाँ चाय ही राजनीति का काजल है, और बाकी सब धूल।"


- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’,

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

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