मान्यताओं और परम्पराओं में लिपटी है हिमाचल प्रदेश की राजनीति

By संतोष उत्सुक | May 16, 2019

महाविविधताओं के देश भारत के अनेक हिस्सों में, राजनीति में जीत हासिल करने का विश्वास उगाने के लिए तरह तरह के प्रचलन हैं। यह प्रयोग बहुत सफल हैं। दो रुपए किलो चावल, बेटी की शादी में मंगल सूत्र, प्रेशर कुकर, बोतल या फिर नकद ऐसे पारंपरिक रास्ते हैं जिन पर चलकर चुनाव लड़ने वाले आम लोगों का विश्वास हासिल करते हैं, उनका आत्मविश्वास बढ़ जाता है, उन्हें लगने लगता है कि यह चुनाव हम ही जीतेंगे। माहौल के मुताबिक अनेक बार ऐसा होता है कि मुंह ज़बानी वायदा किया जाता है, सद्भावना भेंट भी ले ली जाती है लेकिन मुहर लगाते लगाते मन बदल जाता है। हिमाचल प्रदेश के कुछ इलाकों में युगों से ‘लोटा नमक’ की रीति चल रही है जो ज़िला सिरमौर के गिरिपार क्षेत्र व ज़िला शिमला के दुर्गम इलाकों में, लोक मान्यताओं के रूप में आज भी विद्यमान हैं। बताते है लोटा नमक परंपरा के तहत सामूहिक रूप से कसम खाई जाती है कि हम आपको समर्थन देंगे। 

इसे भी पढ़ें: गुरू की नगरी में पुरी के सामने स्थानीय कांग्रेसी की चुनौती

पंचायत, विधान सभा या लोकसभा के आम चुनाव में इस परंपरा का सहारा लिया जाता रहा है। स्थानीय देवी देवताओं को साक्षी मानते हुए सदियों से यह रीत चल रही है यद्यपि शिक्षा और जागरूकता के साथ इसका इसका प्रचलन धीरे धीरे कम हो रहा है। परंपरा के निमित, मान लीजिए यदि किसी गाँव के लोग अमुक नेता से नाराज़ हैं तो चुनाव के दौरान सुलह करवाकर पुनः गांववालों का विश्वास जीतने का एक बढ़िया रास्ता लोटा नमक (लोटा नूण) है। नेता उस गाँव में जाकर बातचीत के बाद लोटा नमक परंपरा के माध्यम से रूठे लोगों को मनाने में कामयाब होते देखे गए हैं। वोट नेता की झोली में पड़ें इसके लिए गाँव वालों से, परिवारों से स्थानीय देवता के नाम पर कसमें ली जाती हैं। इस अनोखी रिवायत में बिना खर्च किए वोट बैंक पक्का हो जाता है। जो नेता पहले गाँव पहुँच कर इस परंपरा के बहाने विश्वास हासिल कर ले, गाँव वाले उस के साथ बांध जाते हैं। लोटा नूण करने का तरीका सरल है। एक लोटे में पानी डालकर उसमें नमक दाल दिया जाता है। कसम लेने के लिए स्थानीय निवासी, देवता को साक्षी मानकर, सामूहिक रूप से एकत्र होकर बारी बारी लोटे को हाथ लगाकर कसम लेते हैं। यह कहते हैं कि अगर मैं अपनी कसम तोड़ूँ तो देवता मुझे सज़ा दें।

इसे भी पढ़ें: मोदी-योगी सहित कई दिग्गजों की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा दांव पर

एक बार कसम खा ली फिर कायम रहती है। नेता ऐसी पहल करते ही विश्वस्त हो जाते हैं। माना जाता है छोटे चुनाव में यह ज़्यादा कारगर है। पंचायती राज चुनाव में एक वोट भी कीमती होती है तभी परिवारों पर ध्यान दिया जाता है। लोटा नूण हो गया तो समझिए दूसरे व्यक्ति को कोई लाभ नहीं होता है। बुजुर्ग बताते हैं कि पहले देवी देवताओं में आस्था ज़्यादा रखते थे, बुज़ुर्गों की बात मानते थे। यह परंपरा किसी का नमक खाने के बाद उसे निभाना जैसी ही है। देव दोष के डरते थे लेकिन सामाजिक बदलावों के कारण अब लोग डरते नहीं, वादा खिलाफी भी करते हैं। वैसे भी समाज में हर तरह के भरोसे की गारंटी कम होती जा रही है तो परम्पराएँ भी तो विकास के सामने टूटेंगी ही।

 

- संतोष उत्सुक

 

All the updates here:

प्रमुख खबरें

Women Health Care: 40 के बाद महिलाएं न करें सेहत से खिलवाड़, ये 5 Test बचाएंगे Serious Diseases से

ट्रंप के आगे खामनेई का सरेंडर! न्यूक्लियर प्रोग्राम रोकने पर ग्रीन सिग्नल? US से डील के लिए तेहरान ने बदला अपना रुख

इतिहास में पहली बार, 12 महीने में 5 Trade Deals, क्‍यों हिंदुस्तान संग बिजनेस करने को आतुर है दुनिया

Bangladesh Election: क्या दूसरी आजादी का सपना होगा पूरा? शेख हसीना के निर्वासन के बाद सबसे बड़े चुनाव पर एक नजर