सामान, सम्मान और वक़्त (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Apr 30, 2026

इंसान कभी डर कर नहीं रहा हांलाकि बुरा वक़्त बिना बताए आकर समझाता ज़रूर है। साहिर लुधियानवी ने कई दशक पहले समझाया था, ‘आदमी को चाहिए वक़्त से डर कर रहे, कौन जाने किस घडी वक़्त का बदले मिजाज़'। भुलक्कड़ आदमी ऐसी महत्त्वपूर्ण बातों को कहां याद रख पाता है। कभी कभार बातचीत के दौरान मान ज़रूर लेता है कि वक़्त बहुत कीमती है और हर इंसान के समय का महत्त्व है। एक बार मिली ज़िंदगी में सामान और सामान इकट्ठा करना ही नहीं, आपसी सहयोग, सदभाव, सम्मान करना ज्यादा ज़रूरी है। राजनीति का सम्मान करने के अभ्यस्त लोगों ने वोट के साथ साथ मेहनत, कर्मठता, समर्पण को भी सामान समझना शुरू कर दिया है। 

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सम्मानित हो रहे व्यक्ति के सामने ताली बजा दी जाए तो उसका उत्साह भी बढ़ जाता है। संभावना है इससे भूख भी कम लगती होगी। भविष्य में विशाल भव्य मूर्तियों को ऐसा बनाया जा सकता है कि इनके पड़ोस में काफी देर खड़े होकर भजन कीर्तन करने से कई दिन भूख न लगने का प्रभाव पैदा हो जाए। ऐसा प्रावधान भी हो कि ख़ास मूर्ति को चाटने से, एक सप्ताह तक कुछ भी खाने की ज़रूरत न पड़े।  

सम्मान या सामान सब को नहीं दिया जा सकता। कई बार सुपात्र को अनदेखा पड़ता है और आपसी संबंधों की कद्र करने वालों को सम्मान और सामान, समान रूप से देने पड़ते हैं। रिश्तों को सामान समझने वाले सम्मान पाने वालों की होड़ में भी आगे बढ़ते देखे जाते हैं। आजकल सामान से ज्यादा सम्मान देने की परम्परा है। राष्ट्रीय स्तर की बात करना तो बड़ी बात होगी नगर स्तरीय सम्मान भी सामने वाले का बढ़िया वक़्त देखने के बाद दिया जाता है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों में आग्रह कर तालियां बजवानी पड़ती हैं लेकिन अब मेहनत, कर्मठता, समर्पण के नाम पर कहीं भी तालियां बजाने का समय है। जिनके सम्मान में तालियां बजाई जाती हैं उन्हें अच्छा लगता है लेकिन वक़्त निकल या बदल जाने के बाद भी सम्मान जारी रहेगा यह पता नहीं होता।

वक़्त की किताब में दर्ज है, सामान की वास्तविकता में डूबे हुए सब नंगे हैं लेकिन एक दूसरे से कह रहे हैं, देखो, हमने एकता, समानता, सदभाव के कितने रंग बिरंगे स्वच्छ, सुगन्धित भव्य वस्त्र पहन रखे हैं। भरोसा, यकीन, विशवास, वायदे, मुस्कुराहटों के सहारे वंचित वर्ग को जिलाए रखना ही उनका सम्मान हो गया है लेकिन साहिर ने कुछ और भी कहा है, ‘वक़्त है फूलों की सेज, वक़्त है कांटों का ताज'। हर लम्हा बदलते वक़्त का पता नहीं चलता किसके लिए कैसा वक़्त लेकर आए। 

- संतोष उत्सुक

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