आजादी के आराधक थे प्रफुल्ल चंद्र चाकी, सरफोशी की तमन्ना रखते थे

By शिवकुमार शर्मा | Dec 10, 2022

गुलामी की जंजीरें तोड़कर भारत को आजाद कराने के लिए संसार के सुख का कोई लालच नहीं बांध पाया। आत्मोत्सर्ग की भावना और सरफरोशी की तमन्ना के साथ आजादी का आराधक इंकलाब की राह पर चल पड़ा। जिंदगी वतन के नाम कर अमर हो गए। शहीद प्रफुल्ल चन्द्र चाकी का आज जन्मदिवस है। उनका जन्म उत्तरी बंगाल के बोगुरा जिले, जो कि अब बांग्लादेश में स्थित है, के बिहारी गांव में हुआ था जब प्रफुल्ल 2 वर्ष के थे तभी पिता श्री राज नारायण चाकी का निधन हो गया था मां स्वर्णमयी देवी ने बड़ी कठिनाई से पालन पोषण किया। वे उनकी की पांचवी संतान थे।

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खुदीराम बोस को युगांतर की ओर से दो पिस्तौल और प्रफुल्ल चाकी को एक पिस्तौल और कारतूस देकर मुजफ्फरपुर भेज दिया गया। प्रफुल्ल को अपनी पहचान छुपाने के लिए दिनेश चंद्र रॉय नाम दिया गया मोती झील के पास धर्मशाला में रुके (लक्ष्मेन्द्र चौपड़ा)। किंग्सफोर्ड की पूरी तफ्तीश की। गुप्त गतिविधि की भनक लगने के कारण फैयाजुद्दीन और तहसीलदार "हो" को उनकी सुरक्षा में लगाया गया था। किंग्सफोर्ड के विक्टोरिया बंकी स्थित क्लब से लौटते समय मारने की तैयारी की। 30 अप्रैल 1908 को किंग्स कोर्ट के बंगले के पास बग्गी आते देख बम फेंका परंतु उसमें मुजफ्फरपुर बार के एक प्रमुख वकील मिस्टर प्रिंगल कनेडी की पत्नी और उनकी बेटी मारी गई। दोनों क्रांतिकारी रेलवे के किनारे 24 किलोमीटर अंधेरे में भागकर बेनी स्टेशन पहुंचे जहां से दोनों लोग अलग हो गए। 

खुदीराम बोस को पकड़े जाने पर मुजफ्फरपुर में 11 अगस्त 1908 को फांसी दी गई। प्रफुल्ल चंद समस्तीपुर आए, जहां एक रेल कर्मचारी त्रिगुणा चरण घोष ने शरण दी। कपड़े बदल कर 1 मई 1908 को मोकामा के लिए जाने वाली गाड़ी में इंटर क्लास टिकट से बैठा दिया। उसी डिब्बे में यात्रा कर रहे पुलिस स्पेक्टर नंदलाल बनर्जी ने शक के आधार पर मोकामा स्टेशन पर खबर कर दी, जहां होने चारों ओर से घेर लिया गया। फल स्वरुप उन्होंने स्वयं को दो गोलियां मारकर शहादत का दिव्य अनुष्ठान पूरा किया। नंदलाल बनर्जी ने क्रूरता की सारी हदें पार करते हुए उनका सिर काटकर मुजफ्फरपुर कोर्ट में पेश किया शिनाख्त के लिए जैसे ही खुदीराम बोस के सामने लाया गया, उन्होंने प्रणाम किया वहीं शिनाख्त का काम पूरा हो गया। 9 नवंबर 1998 को शिरीष चंद्र पाल और कवेन्द्र नाथ गांगुली ने नंदलाल बनर्जी को गोली मारकर बदले का अनुष्ठान पूरा किया। भारत माता के इंकलाबी सपूत को कृतज्ञतापूर्ण नमन।

- शिवकुमार शर्मा

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