By अभिनय आकाश | Jul 08, 2025
अभी हाल ही में आपने खबर पढ़ी होगी कि भारत ने आईएनएस तमाल को कमीशन किया है। ये मल्टीरोल फ्रीगेड है। ये रूस की शिपयार्ड द्वारा बनाई गई आखिरी फ्रीगेड है, जो भारतीय नौसेना कमीशन कर रहा है। अब रूस से बनी आगे कोई फ्रीगेड भारतीय नौसेना कमीशन करने की योजना में नहीं है। इससे पहले तक 90 प्रतिशत डिफेंस एक्सपोर्ट भारत रूस से करता था। 2009 तक 76 प्रतिशत हो गया और अब 2024 आते आते ये 36 प्रतिशत तक गिर चुका है। रूस पर हमारी निर्भरता कम हो रही है। वहीं फ्रांस और अमेरिका जैसे देशों से भारत की निर्भरता बढ़ रही है। इसके पीछे का मकसद साफ है कि भारत एकाधिकारिक रूप से केवल रूस पर ही अपनी डिफेंस निर्भरता नहीं रखना चाहता था। इसलिए फ्रांस और अमेरिका से भी भारत हथियार खरीदने लगा। भारत ने रूस से फ्रीगेड को कमीशन करना बंद किया, टैंक की निर्भरता को भी खत्म किया। अब भारत सुखोई 57 जैसे ऑफर को भी रिजेक्ट करता नजर आ रहा है। जिसके बाद सवाल ये उठ रहे हैं कि रूस से भारत हथियार नहीं लेगा तो आखिर भारत आगे क्या करने वाला है?
ऐसा कहा जाता है कि भारत ने कभी भी पूरी तरह से डील को रिजेक्ट नहीं किया है। हालाँकि इसने FGFA परियोजना में भागीदारी को निलंबित कर दिया, लेकिन बाद में विमान खरीदने का विकल्प खुला रखा। जुलाई 2018 में, तत्कालीन रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया, फरवरी में रूसियों को यह बता दिया गया था कि वे हमारे बिना लड़ाकू विमान विकसित करने के लिए आगे बढ़ सकते हैं। लेकिन विकल्प अभी भी बना हुआ है, और हम बाद में वापस जाकर लड़ाकू विमान खरीदने के लिए कह सकते हैं।
साल 2019 में वायु सेना प्रमुख, एयर चीफ मार्शल बीएस धनोआ ने रूसी सशस्त्र बलों के आधिकारिक समाचार पत्र क्रास्नाया ज़्वेज़्दा को बताया कि भारत Su-57 को कार्रवाई में देखने और रूस द्वारा भारत में विमान का प्रदर्शन करने के बाद इस पर निर्णय लेगा। तब से, Su-57 को संघर्ष क्षेत्रों में परिचालन रूप से तैनात किया गया है, और रूसी और पश्चिमी दोनों रिपोर्टों के अनुसार, इसका प्रदर्शन सराहनीय रहा है। इसके अलावा, सुपरक्रूज़ क्षमता की कमी पर चिंताओं को दूर किया जा रहा है।