प्रो.कोरोना की क्लास में हम (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Mar 23, 2020

प्रो. कोरोना ने सबकी क्लास ले डाली है। कितनों को तो इम्तहान से पहले ही फेल कर दिया। उचित प्रबंध के नाम पर बड़ी बड़ी हांकने वाले हांफ रहे हैं। किसी को नहीं छोड़ेंगे की तर्ज पर चौदह दिन का वनवास देना है लेकिन नियमानुसार कुछ भी करना मुश्किल होता है बिना जान पहचान के इतने बंदों को इतने दिन मुफ्त का खाना पिलाना महंगा सौदा है। कहते हैं न मुसीबत सिखाती है, अब सही तरीके से छींकना, मुंह पर हाथ रख कर खांसना, कम पानी में उच्च स्तरीय हाथ धोना भी सीख जाएंगे। इस बहाने राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान को भी अप्रत्याशित बल मिलेगा। वैसे भी ज़्यादातर लोग हाथ, दिल से तो मिलाते नहीं थे इसलिए दूर से हाथ जोड़ना सीख जाना ज्यादा बेहतर व सुरक्षित रहेगा। अब तो पांव मिलाकर भी अभिवादन करना सीख रहे हैं। बीमारी में भी गंदी जगह में रहना सीख जाएंगे साथ साथ वाकई भूखे और सचमुच प्यासे रहना भी आ जाएगा।

 

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व्हाट्सऐप स्कूल के ज्ञानवान अध्यापक बीस, तीस चालीस सेकिंड तक हाथ अच्छे से धोने के लिए समझा रहे हैं। वो अलग बात है कि पानी भी होना चाहिए और साफ़ होना चाहिए। हमारे देश में करोड़ों लोगों को पीने का पानी नसीब नहीं है। गर्मी आ रही है पानी कम पड़ेगा तो हाइड्रोजन व आक्सीजन गैस मिलाकर बनाना सीख जाएंगे। भविष्य में यह एक व्यवसाय भी बन सकता है। बढ़िया सैनिटाइज़र हो तो पानी बच सकता है लेकिन चार गुना कीमत पर नकली घटिया सैनिटाइज़र ही मिले तो कीर्तन ही बचा सकता है। बाज़ार में मास्क नहीं मिल रहे, बहुत  महंगे मिल रहे, जो बीमार नहीं वे लगाए घूम रहे हैं, फैशन पसंद रोज़ अलग रंग का लगा रहे  स्कूल बंद है, कई जगह बच्चों को छुट्टी कर दी है अध्यापकों को स्कूल जाकर आपस में पढ़ाना है। प्रो. कोरोना अपना गेम खेल रहे हैं, लोगों की जान आफत में हैं, दिग्गज क्रिकेटर कह रहे कि पैसे का खेल हर हाल में होना चाहिए। विकास की इंतेहा है लेकिन दूर दूर खड़े होने तो क्या बैठने की भी जगह नहीं है। सैंकड़ों लोगों को कई कई घंटे हवाई अड्डे पर कुछ न खिलाकर, पानी नहीं, वाशरूम न बताकर आइसोलेट कर उनकी सहनशक्ति बढ़ाई जा रही है। उन्हें विश्व स्तरीय महामारी के दौरान विरोध करना सिखाया जा रहा है। यह हमारा अदभुत सरकारी नियंत्रण है।  

 

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उचित व्यवस्था उपलब्ध है यह प्रेस रिलीज़ देने में और उचित व्यवस्था सचमुच होने में फर्क रह जाता है। दिशा निर्देश हमेशा व्यापक दिशाओं में चले जाते हैं। हर स्थिति को निबटने के लिए प्रभावी दिशा निर्देश दिए जा रहे हैं। ऐसी विकट स्थिति से निबटने के लिए क्या होना चाहिए इस बारे नया क़ानून बनाने बारे सोचा जा रहा होगा। पुराने क़ानून ही समझदारी से लागू हो जाएं ऐसी जागरूकता कब आएगी। क्या प्रो. कोरोना की क्लास में पढने से यह हो जाएगा या अभी नए प्रोफेसर का इंतज़ार करना होगा। 


- संतोष उत्सुक

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