By एकता | Jul 13, 2026
पंजाब सरकार के नियमित कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए महंगाई भत्ता एक बड़ा मुद्दा बन चुका है। कर्मचारी यूनियनों की लगातार मांग और अदालत के पक्ष में फैसले के बावजूद, राज्य सरकार ने अभी तक उनके लंबे समय से रुके हुए डीए को जारी नहीं किया है। इस पूरे मामले में एक बड़ी असमानता यह है कि पंजाब में तैनात आईएएस और आईपीएस अधिकारियों को केंद्र सरकार के नियमों के तहत बढ़ा हुआ डीए मिल रहा है, जबकि राज्य के करीब 3.5 लाख कर्मचारियों और 4 लाख से अधिक पेंशनभोगियों को इससे वंचित रखा गया है। साल 2026 में आए पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले से यह साफ हुआ था कि इस राहत से राज्य के 7.5 लाख से ज्यादा परिवारों को सीधा फायदा मिल सकता है।
महंगाई भत्ते को लेकर चल रही इस कानूनी लड़ाई में फरवरी 2026 में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया था। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि महंगाई भत्ता और महंगाई राहत कर्मचारियों का कानूनी अधिकार है, कोई सरकारी खैरात या तोहफा नहीं। सरकार वित्तीय तंगी या खाली खजाने का बहाना बनाकर इसे अनिश्चितकाल के लिए नहीं रोक सकती। हाई कोर्ट ने पंजाब सरकार को तुरंत बकाया डीए जारी करने और देरी के लिए ब्याज देने का भी आदेश दिया था। बाद में अदालत ने इस फैसले पर रोक लगाने से भी इनकार कर दिया, जिससे कर्मचारी यूनियनों का पक्ष और मजबूत हो गया है।
पंजाब सरकार लगातार राज्य की खराब वित्तीय स्थिति, कर्ज और पेंशन के बोझ का हवाला देकर डीए देने से बच रही है। वहीं, कर्मचारी संगठनों का कहना है कि सरकार का वित्तीय तंगी का तर्क गले नहीं उतरता। सूचना के अधिकार (RTI) से मिली जानकारी के मुताबिक, मार्च 2022 से मार्च 2025 के बीच पंजाब सरकार ने केवल प्रिंट मीडिया में प्रचार-प्रसार और विज्ञापनों पर ₹317.17 करोड़ खर्च कर दिए। कर्मचारियों का आरोप है कि सरकार के पास बड़ी-बड़ी प्रचार मुहिमों के लिए तो फंड है, लेकिन अपने ही कर्मचारियों को महंगाई से बचाने के लिए पैसे नहीं हैं। इसके अलावा वीआईपी दौरों और सरकारी विमानों के इस्तेमाल पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।
महंगाई भत्ते के मामले में पंजाब अपने पड़ोसी राज्यों की तुलना में काफी पीछे छूट गया है। जहां एक तरफ हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों ने अपने कर्मचारियों का महंगाई भत्ता केंद्र सरकार की तर्ज पर बढ़ाकर 60% कर दिया है, वहीं पंजाब के नियमित कर्मचारी आज भी 42% के स्तर पर ही अटके हुए हैं। इस बड़े अंतर के कारण कर्मचारियों का मनोबल गिर रहा है और स्थानीय बाजारों में आम लोगों की खरीदने की क्षमता भी कम हो रही है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर केंद्र और पड़ोसी राज्य अपने कर्मचारियों को महंगाई से राहत दे सकते हैं, तो पंजाब सरकार ऐसा करने में नाकाम क्यों साबित हो रही है?