By नीरज कुमार दुबे | Aug 14, 2026
रूस और जापान के बीच दशकों से चला आ रहा कुरिल द्वीप विवाद एक बार फिर भड़क उठा है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के विवादित इतुरुप द्वीप पहुंचते ही टोक्यो भड़क गया। जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने इस यात्रा को “बिल्कुल अस्वीकार्य” बताते हुए कहा कि इससे जापानी जनता की भावनाओं को ठेस पहुंची है। लेकिन मॉस्को के लिए यह सिर्फ एक यात्रा नहीं, बल्कि साफ शक्ति-प्रदर्शन है। पुतिन ने दुनिया को दिखा दिया कि रूस इन विवादित द्वीपों पर अपने नियंत्रण को किसी चुनौती से पीछे हटने वाला नहीं है।
जापानी प्रधानमंत्री ताकाइची ने दो टूक कहा कि ये द्वीप जापान के “ऐतिहासिक और अंतरराष्ट्रीय कानून” के तहत अभिन्न क्षेत्र हैं। विदेश मंत्री तोशिमित्सु मोतेगी ने भी रूस के खिलाफ कड़ा विरोध दर्ज कराया और टोक्यो ने रूसी राजदूत निकोलाई नोजद्रेव को तलब किया। लेकिन मॉस्को ने जापान की आपत्ति को लगभग ठेंगा दिखाते हुए साफ कर दिया कि इतुरुप समेत पूरा कुरिल क्षेत्र रूस का अभिन्न हिस्सा है। रूसी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया जखारोवा ने जापानी प्रतिक्रिया को “अस्वीकार्य” बताया, जबकि रूसी दूतावास ने कहा कि रूसी राष्ट्रपति अपने देश के भीतर जहां चाहें यात्रा कर सकते हैं।
यहीं से मामला महज पुराने क्षेत्रीय विवाद से निकलकर शक्ति राजनीति का रूप ले लेता है। पुतिन ने इतुरुप में स्कूल, अस्पताल और मछली प्रसंस्करण संयंत्र का दौरा किया तथा स्थानीय लोगों से बातचीत की। मछली के अंडे का स्वाद लेने और द्वीप के मौसम की तुलना रिसॉर्ट से करने वाली उनकी तस्वीरें और टिप्पणियां भी सामने आईं। लेकिन इन दृश्यों के पीछे संदेश कहीं ज्यादा कठोर है। संदेश यह है कि रूस इन द्वीपों को सिर्फ सैन्य चौकी नहीं, बल्कि सामान्य रूसी भूभाग के रूप में पेश कर रहा है।
देखा जाये तो रणनीतिक दृष्टि से कुरिल द्वीपों की अहमियत बेहद बड़ी है। ये द्वीप जापान के होक्काइडो और रूस के कामचात्का प्रायद्वीप के बीच स्थित हैं और प्रशांत महासागर तथा ओखोत्स्क सागर के बीच समुद्री पहुंच को प्रभावित करते हैं। रूस पिछले एक दशक में यहां अपनी सैन्य मौजूदगी लगातार मजबूत करता रहा है। इतुरुप क्षेत्र में उसका प्रमुख सैन्य हवाई अड्डा है और द्वीपों के आसपास नियमित सैन्य अभ्यास होते रहे हैं।
और यही वह बिंदु है जहां इस विवाद का असली सामरिक चेहरा सामने आता है। कुरिल रूस के लिए प्रशांत बेड़े, कामचात्का और ओखोत्स्क सागर की सुरक्षा का हिस्सा हैं। जापान के लिए ये उसके उत्तरी समुद्री और हवाई सुरक्षा घेरे के ठीक सामने स्थित संवेदनशील क्षेत्र हैं। ऐसे में पुतिन का इतुरुप पहुंचना केवल संप्रभुता का प्रदर्शन नहीं, बल्कि जापान की बढ़ती सैन्य क्षमता और अमेरिका के साथ उसके गठजोड़ के सामने शक्ति संतुलन का प्रदर्शन भी है।
मामला इसलिए भी विस्फोटक है क्योंकि रूस अकेला नहीं है। पिछले महीने रूसी और चीनी युद्धपोतों ने कुरिल द्वीपों के बीच एक जलडमरूमध्य से संयुक्त गश्त की थी। इसी बीच रूसी और चीनी राजदूतों ने द्वितीय विश्वयुद्ध के परिणामों को बदलने के प्रयासों और एशिया-प्रशांत के पुनःसैन्यीकरण के खिलाफ संयुक्त बयान दिया। यह भाषा सीधे जापान की बढ़ती रक्षा तैयारियों पर निशाना साधती दिखाई देती है।
दूसरी तरफ उत्तर कोरिया का हालिया मिसाइल प्रक्षेपण और अमेरिका-दक्षिण कोरिया के बड़े सैन्य अभ्यासों का माहौल इस पूरे घटनाक्रम को और खतरनाक बनाता है। यानी जापान के चारों ओर सुरक्षा दबाव एक साथ बढ़ रहा है। उत्तर कोरिया से मिसाइल खतरा, चीन से समुद्री और सैन्य दबाव और अब रूस की कुरिल में खुली शक्ति प्रदर्शनी।
इसका समय भी संयोग नहीं माना जा सकता। पुतिन का दौरा जापान के द्वितीय विश्वयुद्ध में आत्मसमर्पण की 81वीं वर्षगांठ से ठीक पहले हुआ। ऐसे समय में कुरिल की रूसी संप्रभुता का सार्वजनिक प्रदर्शन इतिहास, राष्ट्रवाद और वर्तमान भू-राजनीति, तीनों को एक ही मंच पर ला खड़ा करता है।
हम आपको याद दिला दें कि 2022 में यूक्रेन पर रूस के पूर्ण पैमाने के हमले के बाद जापान ने पश्चिमी देशों के साथ मिलकर मॉस्को पर प्रतिबंध लगाए थे। इससे पहले शांति संधि और आर्थिक सहयोग की दिशा में जो भी सीमित उम्मीदें थीं, वे लगभग खत्म हो गईं। पुतिन की यात्रा उस दरवाजे पर भी ताला जड़ती दिखाई देती है। रूस के पूर्व राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव ने भी बयान को और जहरीला बनाते हुए कहा कि ये द्वीप रूसी जमीन “थे, हैं और रहेंगे”। उन्होंने जापान को समझने की सलाह दी कि इस वास्तविकता को चुनौती देने वालों को “भयानक परिणाम” भुगतने पड़ सकते हैं।
अब असल कहानी यही है कि कुरिल द्वीपों पर रूस-जापान का पुराना विवाद अब नए एशियाई शक्ति-संघर्ष का अग्रिम मोर्चा बन रहा है। पुतिन ने इतुरुप पर उतरकर सिर्फ जमीन पर कदम नहीं रखा है। उन्होंने जापान की सुरक्षा नीति, अमेरिका के साथ उसके गठबंधन और एशिया-प्रशांत में बदलते शक्ति-संतुलन को सीधे चुनौती दी है। टोक्यो के लिए अब सवाल केवल चार द्वीपों का नहीं है। सवाल यह है कि क्या वह रूस-चीन-उत्तर कोरिया के बढ़ते दबाव के बीच अपनी उत्तरी सुरक्षा सीमा को कितनी तेजी से मजबूत कर सकता है।
बहरहाल, कुरिल का विवाद इसलिए खतरनाक है क्योंकि यहां इतिहास हथियार है, भूगोल मोर्चा है और सैन्य शक्ति संदेश। पुतिन ने अपनी चाल चल दी है। अब जापान के सामने सिर्फ विरोध दर्ज कराने का विकल्प नहीं, बल्कि यह तय करने की चुनौती है कि वह इस नई एशियाई शतरंज में कितनी दूर तक जवाबी चाल चलेगा।