संघ परिवार की योजना कामयाब, राम मंदिर मुद्दे ने राफेल को पीछे धकेल दिया

By आशीष वशिष्ठ | Nov 12, 2018

इसमें कोई दो राय नहीं है कि राम मंदिर ने राफेल डील की हवा निकालने का काम किया है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव और आगामी लोकसभा चुनाव के लिये मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस जोर-शोर से राफेल डील को मुद्दा बनाने में लगी थी। कांग्रेस संसद से सड़क तक येन-केन-प्रकरेण राफेल पर भाजपा को घेरने में जुटी है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने तो राफेल मामले में सीधी उंगुली प्रधानमंत्री मोदी की तरफ उठाने में गुरेज नहीं किया। लेकिन पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या विवाद की सुनवाई की तारीख दो महीने आगे बढ़ाकर राम मंदिर के मुद्दे को पुनः राजनीति के केन्द्र में खड़ा कर डाला है। सुप्रीम कोर्ट के रवैये से साधु-संतों, हिन्दुवादी संगठनों और भाजपा के बाहर और भीतर नाराजगी का माहौल कायम हुआ है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने भी चेतावनी की भाषा में मोदी सरकार को अपने इरादे बता दिये हैं। राम मंदिर को लेकर देशभर में मची हलचल और बहस से आरएसएस और हिन्दूवादी संगठनों की बांछें खिल गयी हैं। भाजपा भी इस लहर के सियासी नफे-नुकसान का आकलन कर रही है। दिवाली के अवसर पर अयोध्या में भव्य दीपदान, दक्षिणी कोरिया की प्रथम महिला का आगमन, फैजाबाद का नाम अयोध्या किया जाना, साफ संकेत है कि राम मंदिर का मुद्दा शीघ्र शांत होने वाला नहीं है। 

कांग्रेस के रणनीतिकारों को यह लग रहा है कि राफेल विमान सौदे से ही उसकी नैया पार लगेगी। 2014 का लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण हारना पड़ा था और साठ साल तक देश पर राज करने वाली पार्टी महज 44 सीटों पर सिमट गई। ऐसे में कांग्रेस के लिए राफेल विमान सौदा बदले का चुनावी अस्त्र है। कांग्रेस राफेल सौदे को शायद इसलिए चुनावी मसला बना रही है क्योंकि वह जानती है कि बोफोर्स तोप सौदे में दलाली के मसले के साथ संप्रग शासन में घपले-घोटालों के मामलों ने उसे कैसे-कैसे दिन दिखाए? निःसंदेह उच्च स्तर का भ्रष्टाचार सदैव से लोगों का ध्यान आकर्षित करता रहा है लेकिन यह कहना कठिन है कि आम जनता राफेल सौदे में कथित गड़बड़ी के कांग्रेस के आरोप को भ्रष्टाचार के मसले के तौर पर देखेगी।

कांग्रेस जिस तरह से राफेल सौदे के मसले पर भाजपा पर हमलावर थी, उससे प्रधानमंत्री मोदी, उनकी सरकार और उनकी पार्टी भाजपा कुछ उसी तरह से घिरती नजर आ रही थी जिस तरह 1980 के दशक के अंत में बोफोर्स के मुद्दे पर राजीव गांधी और कांग्रेस घिरे थे। बोफोर्स मामले में पैसे खाने के आरोपों की आंच तब राजीव गांधी तक पहुंच गई थी। उस समय राजीव गांधी सरकार में वित्त मंत्री रहे विश्वनाथ प्रताप सिंह ने कांग्रेस से अलग होकर इसे बहुत बड़ा मुद्दा बना दिया था। बोफोर्स तोप सौदे में दलाली के मसले पर केंद्रीय मंत्री वीपी सिंह ने तत्कालीन राजीव गांधी मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद उस मंत्रिमंडल में इस्तीफों की झड़ी लग गई थी। उसके बाद वीपी सिंह ने पूरे देश में घूम-घूम कर सौदे में दलाली का प्रचार किया। उसमें भाजपा से लेकर वामपंथी पार्टियों ने वीपी सिंह का साथ दिया। अपनी हर चुनावी सभा में वीपी सिंह एक कागज दिखाते थे और कहते थे कि इसमें उन लोगों के नाम हैं जिन्होंने बोफोर्स सौदे में पैसे खाए हैं और वे प्रधानमंत्री बनते ही इन सभी को जेल भेज देंगे। बोफोर्स मामले से ऐसा माहौल बना कि मिस्टर क्लीन की छवि रखने वाले राजीव गांधी और उनकी प्रचंड बहुमत वाली सरकार को हार का सामना करना पड़ा और वह आधी सीटों पर सिमट कर रह गई। इस चुनाव में बोफोर्स भ्रष्टाचार का प्रतीक बना और उसका निशाना सीधे-सीधे गांधी परिवार बना। इसके बाद वीपी सिंह देश के प्रधानमंत्री बन गए। हालांकि, प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने ऐसी किसी लिस्ट को कभी सार्वजनिक नहीं किया जिसकी बात वे अपनी चुनावी सभाओं में किया करते थे।

ठीक ऐसे ही कांग्रेस राफेल सौदे को लेकर बदले की राजनीति करना चाहती है। वह बताना चाहती है कि जैसे तुमने हमारे साथ किया, हम तुम्हारे साथ करेंगे। लेकिन राफेल विमान सौदे को लेकर राजनेताओं को छोड़कर इस मुद्दे को लेकर आम लोगों के बीच कोई चर्चा नहीं है। सभी कुछ बयानबाजी तक सिमटा हुआ था। यही कारण है कि कांग्रेस कुछ-कुछ शगूफे छोड़कर इस मुद्दे को हवा देना चाहती है। इसमें संदेह है कि कांग्रेसी नेताओं के कहने भर से जनता राफेल सौदे में भ्रष्टाचार होने की बात सही मान लेगी क्योंकि मोदी सरकार ने यह छवि बनाई है कि वह भ्रष्टाचार को सहन करने के लिए तैयार नहीं है। यह एक तथ्य भी है कि सरकार के उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार का कोई मामला अब तक सामने नहीं आया है।

भाजपा का राजनीतिक उत्थान राम मंदिर मुद्दे की वजह से ही हुआ है। राम मंदिर का निर्माण हमेशा से बीजेपी के चुनावी मैनिफेस्टो का हिस्सा रहा है, लेकिन पार्टी पर हमेशा से इलजाम ये रहा है कि उसने इस पर गंभीरता से अमल नहीं किया। पार्टी के खिलाफ ये भी आरोप है कि इसने इस मुद्दे को केवल चुनाव जीतने के लिए इस्तेमाल किया है। इस मुद्दे को जिंदा रखना उसके फायदे में है। सरयू में न जाने कितना पानी बह चुका है। लेकिन अयोध्या के विवादित ढांचे पर अदालती कार्यवाही अब भी जारी है। अयोध्या विवाद की गरमी को देश का कोई न कोई हिस्सा महसूस करता रहता है। इस विवाद में कई मोड़ आए, कई घटनाएं भारतीय इतिहास की गवाह बन गईं। सुप्रीम कोर्ट के रूख के बाद अब ये तय हो गया है कि 2019 के आम चुनाव से पहले राम मंदिर पर फैसला नहीं आने वाला है। राम मंदिर मुद्दे की लहर एक बार फिर देशभर में बनती देखकर संघ परिवार, भाजपा और हिन्दू संगठनों में अंदर ही अंदर खुशी की लहर है। फैजाबाद का नाम बदलकर अयोध्या करने की घोषणा यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कर चुके हैं। 

इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि मोदी सरकार के सत्ता संभालने के बाद से विपक्ष संसद से लेकर सड़क तक अपना प्रभाव नहीं दिखा पाया। अधिकतर मुद्दों पर विपक्ष जनता का समर्थन हासिल नहीं कर सका। भाजपा के रणनीतिकार भी भली भांति जानते हैं कि विकास के मुद्दे और मोदी सरकार के साढ़े चार साल के कार्यकाल की उपलब्धियों के बल पर चुनाव नहीं जीता जाएगा। ऐसे में राम मंदिर का मुद्दा वो ब्रह्मास्त्र है जिससे समूचे विपक्ष को एक ही वार में परास्त किया जा सकता है। राजनीतिक जानकारों को लगता है कि राफेल सौदे के मसले पर मोदी सरकार जिस तरह की हीलाहवाली कर रहा है, उसे अगर कांग्रेस ने ठीक से मुद्दा बना दिया तो इसका चुनावी फायदा कांग्रेस को कुछ उसी तरह से मिल सकता है जिस तरह का फायदा बोफोर्स की वजह से वीपी सिंह को मिला था। कांग्रेस इस मुद्दे को उसी दिशा में ले जाना चाहती है, इसके संकेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव से मिल रहे हैं। लेकिन जिस तरह राम मंदिर के मुद्दे की गूंज देशभर में सुनाई दे रही है, उससे राफेल डील की आवाज धीमी पड़ गयी है। और भाजपा कभी नहीं चाहेगी कि राम मंदिर का शोर कम हो।

-आशीष वशिष्ठ

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