Rajya Sabha Elections Candidates के जरिये BJP ने सामाजिक और Congress ने राजनीतिक समीकरणों को साधने पर दिया जोर

By नीरज कुमार दुबे | Jun 05, 2026

राज्यसभा चुनावों के लिए भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस ने अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। इन घोषणाओं ने केवल संसदीय राजनीति ही नहीं, बल्कि आने वाले महीनों में राष्ट्रीय राजनीति की दिशा को लेकर भी कई संकेत दिए हैं। भाजपा ने जहां संगठन के पुराने और भरोसेमंद चेहरों को आगे बढ़ाने के साथ-साथ सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन साधने की कोशिश की है, वहीं कांग्रेस ने भी अपने अनुभवी नेताओं और संगठन से जुड़े चेहरों को प्राथमिकता देकर राजनीतिक संदेश देने का प्रयास किया है।

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भाजपा की सूची में सबसे अधिक चर्चा देबाशीष सामंतराय के नाम को लेकर हुई। सामंतराय ने हाल ही में बीजद से इस्तीफा देकर भाजपा का दामन थामा था और तुरंत उन्हें ओडिशा उपचुनाव में उम्मीदवार बना दिया गया। इससे साफ संकेत है कि भाजपा ओडिशा में अपने पुराने सहयोगी रहे बीजद को लगातार कमजोर करने की नीति पर काम कर रही है। नवीन पटनायक के नेतृत्व वाली बीजद पहले ही कमजोर स्थिति में मानी जा रही है और भाजपा अब वहां अपने प्रभाव को स्थायी रूप से बढ़ाना चाहती है।

भाजपा ने गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर जैसे राज्यों में अपने मजबूत संगठनात्मक आधार का लाभ उठाते हुए ऐसे उम्मीदवार चुने हैं जिनकी जीत लगभग तय मानी जा रही है। गुजरात से राजुभाई शुक्ला, मुकेशभाई राठवा, मानसिंह परमार और जितेंद्र कंजरिया को उतारकर पार्टी ने पिछड़ा और जनजातीय वर्गों को साधने का प्रयास किया है। राजस्थान में अलका गुर्जर और सतीश पूनिया को उम्मीदवार बनाकर भाजपा ने दो प्रभावशाली पिछड़े वर्ग समुदायों को संदेश देने की कोशिश की है। यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि राजस्थान में कांग्रेस संगठनात्मक रूप से सक्रिय दिखाई दे रही है और भाजपा वहां सामाजिक समीकरण मजबूत करना चाहती है।

पंजाब भाजपा नेता तरुण चुघ को मध्य प्रदेश से उम्मीदवार बनाना भी राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। पंजाब में अगले वर्ष चुनाव होने हैं और भाजपा वहां पारंपरिक समर्थक वर्ग को मजबूत करने के साथ-साथ सिख समुदाय में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है। इससे पहले पार्टी ने केवल सिंह ढिल्लों को पंजाब भाजपा अध्यक्ष बनाकर जाट सिख समुदाय तक पहुंच बनाने की कोशिश की थी।

इन चुनावों में भाजपा द्वारा केंद्रीय मंत्रियों रवनीत सिंह बिट्टू और जॉर्ज कुरियन को दोबारा उम्मीदवार नहीं बनाए जाने से भी राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। दोनों वर्तमान में राज्यसभा सदस्य हैं और उनका कार्यकाल जून में समाप्त हो रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इससे केंद्र सरकार में मंत्रिमंडल फेरबदल की संभावना मजबूत हुई है। इससे पहले भी वर्ष 2022 में मुख्तार अब्बास नकवी और आरसीपी सिंह को दोबारा राज्यसभा नहीं भेजा गया था और बाद में उन्हें मंत्रिमंडल से बाहर होना पड़ा था। भाजपा संगठन में भी बदलाव की चर्चा है और माना जा रहा है कि पार्टी नए नेतृत्व और नई सामाजिक रणनीति के साथ आगे बढ़ना चाहती है।

दूसरी ओर कांग्रेस ने भी राज्यसभा चुनाव के लिए अपने उम्मीदवारों की सूची जारी की है। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, प्रवक्ता पवन खेड़ा और मंसूर अली खान को कर्नाटक से उम्मीदवार बनाया गया है। मध्य प्रदेश से मीनाक्षी नटराजन, राजस्थान से नीरज डांगी, तमिलनाडु से प्रवीण चक्रवर्ती और झारखंड से प्रणव झा को उम्मीदवार घोषित किया गया है।

कांग्रेस की सूची से साफ है कि पार्टी अनुभव और संगठनात्मक निष्ठा दोनों को महत्व दे रही है। मल्लिकार्जुन खरगे को फिर राज्यसभा भेजना कांग्रेस नेतृत्व की स्थिरता बनाए रखने का संकेत है। वहीं पवन खेड़ा को उम्मीदवार बनाकर पार्टी ने अपने आक्रामक राजनीतिक और मीडिया चेहरे को संसद में मजबूत करने की कोशिश की है। मीनाक्षी नटराजन को मध्य प्रदेश से उतारकर कांग्रेस ने संगठन के पुराने और वैचारिक रूप से मजबूत नेताओं को महत्व देने का संदेश दिया है।

हम आपको बता दें कि 245 सदस्यीय राज्यसभा में भाजपा के पास अभी 113 सदस्य हैं जबकि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की कुल संख्या 148 है। इसलिए भाजपा इन चुनावों के जरिये अपने संख्याबल को और मजबूत करना चाहती है। वहीं, आंध्र प्रदेश में भी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने राज्यसभा सीटों का बंटवारा कर लिया है। चार सीटों में से तीन तेलुगु देशम पार्टी और एक सीट जन सेना को दी गई है। इससे साफ है कि भाजपा दक्षिण भारत में अपने सहयोगियों के साथ संतुलन बनाकर चलना चाहती है ताकि क्षेत्रीय दलों के सहारे वहां अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत कर सके।

कुल मिलाकर भाजपा और कांग्रेस दोनों की उम्मीदवार सूची केवल संसदीय चुनाव की तैयारी नहीं, बल्कि आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों की रणनीतिक भूमिका भी तय कर रही है। भाजपा जहां सामाजिक विस्तार, संगठनात्मक निष्ठा और विपक्षी दलों में सेंध लगाने की नीति पर आगे बढ़ रही है, वहीं कांग्रेस अनुभवी नेतृत्व और वैचारिक प्रतिबद्धता के सहारे अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

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