आज के दौर में अब झाँसी नहीं झाँसियों की जरूरत है

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त | Jun 18, 2020

मरना तो सभी को है लेकिन मरना कोई नहीं चाहता। भोजन सभी को चाहिए लेकिन खेती करना कोई नहीं चाहता। पानी सभी को चाहिए लेकिन पानी बचाना कोई नहीं चाहता। छाया सभी को चाहिए, किन्तु पेड़ लगाना और उसे जिन्दा रखना कोई नहीं चाहता। इसी तरह बहू सभी को चाहिए, पर बेटी बचाना कोई नहीं चाहता। यह पीड़ा ऐसी वैसी नहीं है- कुछ कोख मे मारी जाती हैं / कुछ मरण जन्म पे पाती हैं / कुछ अधिकारों से वंचित कर / जीवन भर तड़पायी जाती हैं। 

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समाज रूपी बैलगाड़ी के दो पहिए कहलाने वाले पुरुष व महिला में अंतर नहीं होना चाहिए। दोनों की समानता समाज की प्रगति के परिचायक हैं। कुछ चंद नामों जैसे- इंदिरा गाँधी, प्रतिभा पाटिल, सुस्मिता सेन, सुनीता विलियम्स, रीता फारिया, पी.वी. सिंधु, कादम्बिनि गांगुली, कमलजीत सिंधु, डायना इदुल, मीरा साहिब फातिमा बीबी, लीला सेठ, किरण बेदी, मदर टेरेसा, देविका रानी, मायावती, सुचेता कृपलानी, हरिता कौर देओल, मीरा कुमार, बछेंद्री पाल आदि के ले लेने मात्र से झांसी लक्ष्मीबाई का देखा हुआ सपना पूरा नहीं होगा। इस देश में झाँसी नहीं झाँसियों की जरूरत है। समाज में बदलाव की आवश्यकता है। हमारे आदि-ग्रंथों में भी कहा गया है- यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते रमंते तत्र देवता। अर्थात जहाँ नारियों की पूजा की जाती है वहां देवता निवास करते हैं। यह सब सुनने में अच्छा लगता है। इसे कथनी से करनी में बदलने की आवश्यकता है। माँ, बहन, भाभी, बुआ, चाची, फुआ, दादी, नानी सभी रूपों में प्रेम बरसाने वाली महिलाओं को हमें समझने का प्रयास करना चाहिए। जिस तरह महिलाओं ने पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर उनका हाथ बंटाया है ठीक उसी तरह पुरुष भी घर परिवार की छोटी-छोटी जिम्मेदारियों में महिलाओं का हाथ बंटाएँ। वे उन्हें आराम करने का अवसर दें, क्योंकि वे भी मनुष्य हैं, यंत्र नहीं। लक्षमीबाई की पुण्यतिथि की सार्थकता मात्र श्रद्धा सुमन चढ़ाने से नहीं मस्तिष्क में बैठी संकीर्ण विचारधारा को बदलने से होगी। लिंगभेद की पीड़ा मिटाने से होगी। हमारे देश की वर्तमान झाँसी संस्कारों को बोने वाली टीचर भी है, हमारा देखभाल करने वाली डॉक्टर भी, सपनों की उड़ान भरती पायलट भी और तथ्यों को पता लगाती शोधार्थी भी। यदि वह ये सब नहीं भी होती, तब भी वह सब कुछ है, आज से नहीं सदियों से वह सब कुछ है इस सृष्ट‍ि की। क्योंकि वह किसी पद पर न भी हो, तो सृजनकर्ता के पद पर सदैव आसीन रहेगी, जब तक यह सृष्ट‍ि है। 

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त

सरकारी पाठ्यपुस्तक लेखक, 

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