महिला सशक्तिकरण की प्रतीक हैं वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई

  •  डॉ. वंदना सेन
  •  जून 18, 2020   09:57
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महिला सशक्तिकरण की प्रतीक हैं वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई
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वीरांगना लक्ष्मीबाई के मन में अंग्रेजों के प्रति किस कदर घृणा थी, वह इस बात से पता चल जाता है कि जब रानी का अंतिम समय आया, तब ग्वालियर की भूमि पर स्थित गंगादास की बड़ी शाला में रानी ने संतों से कहा कि कुछ ऐसा करो कि मेरा शरीर अंग्रेज न छू पाएं।

वीरांगना नाम सुनते ही हमारे मनोमस्तिष्क में रानी लक्ष्मीबाई की छवि उभरने लगती है। भारतीय वसुंधरा को अपने वीरोचित भाव से गौरवान्वित करने वाली झांसी की रानी लक्ष्मीबाई सच्चे अर्थों में वीरांगना ही थीं। वे भारतीय महिलाओं के समक्ष अपने जीवन काल में ही ऐसा आदर्श स्थापित करके विदा हुईं, जिससे हर कोई प्रेरणा ले सकता है। वे वर्तमान में महिला सशक्तिकरण की जीवंत मिसाल भी हैं। कहा जाता है कि सच्चे वीर को कोई भी प्रलोभन अपने कर्तव्य से विमुख नहीं कर सकता। ऐसा ही रानी लक्ष्मीबाई का जीवन था। उसे अपने राज्य और राष्ट्र से एकात्म स्थापित करने वाला प्यार था। वीरांगना के मन में हमेशा यह बात कचोटती रही कि देश के दुश्मन अंग्रेजों को सबक सिखाया जाए। इसी कारण उन्होंने यह घोषणा की कि मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी। इतिहास बताता है कि इस घोषणा के बाद रानी ने अंग्रेजों से युद्ध किया।

वीरांगना लक्ष्मीबाई के मन में अंग्रेजों के प्रति किस कदर घृणा थी, वह इस बात से पता चल जाता है कि जब रानी का अंतिम समय आया, तब ग्वालियर की भूमि पर स्थित गंगादास की बड़ी शाला में रानी ने संतों से कहा कि कुछ ऐसा करो कि मेरा शरीर अंग्रेज न छू पाएं। इसके बाद रानी स्वर्ग सिधार गईं और बड़ी शाला में स्थित एक झोंपड़ी को चिता का रुप देकर रानी का अंतिम संस्कार कर दिया। और अंग्रेज देखते ही रह गए। हालांकि इससे पूर्व रानी के समर्थन में बड़ी शाला के संतों ने अंग्रेजों से भीषण युद्ध किया, जिसमें 745 संतों का बलिदान भी हुआ, पूरी तरह सैनिकों की भांति अंग्रेजों से युद्ध करने वाले संतों ने रानी के शरीर की मरते दम तक रक्षा की।

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जिन महापुरुषों के मन वीरोचित भाव से भरा होता है, उसका लक्ष्य सामाजिक उत्थान और राष्ट्रीय उत्थान ही होता है। वह एक ऐसे आदर्श चरित्र को जीता है, जो समाज के लिए प्रेरणा बनता है। इसके साथ ही वह अपने पवित्र उद्देश्य की प्राप्ति के लिए सदैव आत्मविश्वासी, कर्तव्य परायण, स्वाभिमानी और धर्मनिष्ठ होता है। ऐसी ही थीं महारानी लक्ष्मीबाई। उनका जन्म काशी में 19 नवंबर 1835 को हुआ। इनके पिता मोरोपंत ताम्बे चिकनाजी अप्पा के आश्रित थे। इनकी माता का नाम भागीरथी बाई था। महारानी के पितामह बलवंत राव के बाजीराव पेशवा की सेना में सेनानायक होने के कारण मोरोपंत पर भी पेशवा की कृपा रहने लगी। लक्ष्मीबाई अपने बाल्यकाल में मनु व मणिकर्णिका के नाम से जानी जाती थीं।

सन् 1850 मात्र 15 वर्ष की आयु में झांसी के महाराजा गंगाधर राव से मणिकर्णिका का विवाह हुआ। एक वर्ष बाद ही उनको पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। लेकिन चार माह पश्चात ही उस बालक का निधन हो गया। राजा गंगाधर राव को तो इतना गहरा धक्का पहुंचा कि वे फिर स्वस्थ न हो सके और 21 नवंबर 1853 को चल बसे। यद्यपि महाराजा का निधन महारानी के लिए असहनीय था, लेकिन फिर भी वे घबराई नहीं, उन्होंने विवेक नहीं खोया। राजा गंगाधर राव ने अपने जीवनकाल में ही अपने परिवार के बालक दामोदर राव को दत्तक पुत्र मानकर अंगे्रज सरकार को सूचना दे दी थी। परंतु ईस्ट इंडिया कंपनी की सरकार ने दत्तक पुत्र को अस्वीकार कर दिया।

27 फरवरी 1854 को लार्ड डलहौजी ने गोद की नीति के अंतर्गत दत्तक पुत्र दामोदर राव की गोद अस्वीकृत कर दी और झांसी को अंग्रेजी राज्य में मिलाने की घोषणा कर दी। यह सूचना पाते ही रानी के मुख से यह वाक्य प्रस्फुटित हो गया, मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी। यहीं से भारत की प्रथम स्वाधीनता क्रांति का बीज प्रस्फुटित हुआ। 

रानी लक्ष्मीबाई ने सात दिन तक वीरतापूर्वक झांसी की सुरक्षा की और अपनी छोटी-सी सशस्त्र सेना से अंग्रेजों का बड़ी बहादुरी से मुकाबला किया। रानी ने खुलेरूप से शत्रु का सामना किया और युद्ध में अपनी वीरता का परिचय दिया।

वे अकेले ही अपनी पीठ के पीछे दामोदर राव को कसकर घोड़े पर सवार हो, अंग्रेजों से युद्ध करती रहीं। बहुत दिन तक युद्ध का क्रम इस प्रकार चलना असंभव था। सरदारों का आग्रह मानकर रानी ने कालपी प्रस्थान किया। वहां जाकर वे शांत नहीं बैठीं।

उन्होंने नाना साहब और उनके योग्य सेनापति तात्या टोपे से संपर्क स्थापित किया और विचार-विमर्श किया। रानी की वीरता और साहस का लोहा अंग्रेज मान गए, लेकिन उन्होंने रानी का पीछा किया। रानी का घोड़ा बुरी तरह घायल हो गया और अंत में वीरगति को प्राप्त हुआ, लेकिन रानी ने साहस नहीं छोड़ा और शौर्य का प्रदर्शन किया।

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कालपी में महारानी और तात्या टोपे ने योजना बनाई और अंत में नाना साहब, शाहगढ़ के राजा, वानपुर के राजा मर्दनसिंह आदि सभी ने रानी का साथ दिया। रानी ने ग्वालियर पर आक्रमण किया और वहां के किले पर अधिकार कर लिया। विजयोल्लास का उत्सव कई दिनों तक चलता रहा लेकिन रानी इसके विरुद्ध थीं। यह समय विजय का नहीं था, अपनी शक्ति को सुसंगठित कर अगला कदम बढ़ाने का था।

इधर जनरल स्मिथ और मेजर रूल्स अपनी सेना के साथ संपूर्ण शक्ति से रानी का पीछा करते रहे और आखिरकार वह दिन भी आ गया जब उसने ग्वालियर का किला घमासान युद्ध करके अपने कब्जे में ले लिया। रानी लक्ष्मीबाई इस युद्ध में भी अपनी कुशलता का परिचय देती रहीं। 18 जून 1858 को ग्वालियर का अंतिम युद्ध हुआ और रानी ने अपनी सेना का कुशल नेतृत्व किया। वे घायल हो गईं और अंतत: उन्होंने वीरगति प्राप्त की। रानी लक्ष्मीबाई ने स्वातंत्र्य युद्ध में अपने जीवन की अंतिम आहूति देकर जनता जनार्दन को चेतना प्रदान की और राष्ट्रीय रक्षा के लिए बलिदान का संदेश दिया।

डॉ. वंदना सेन 

(लेखिका हिंदी साहित्य की सहायक प्राध्यापक हैं)

ग्वालियर मध्यप्रदेश







देश में प्रथम महिला मुख्यमंत्री का खिताब हासिल करने वाली स्वतंत्रता संग्राम सेनानी 'सुचेता कृपलानी'

  •  दीपक कुमार त्यागी
  •  दिसंबर 1, 2020   12:53
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देश में प्रथम महिला मुख्यमंत्री का खिताब हासिल करने वाली स्वतंत्रता संग्राम सेनानी 'सुचेता कृपलानी'
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सुचेता कृपलानी का जन्म 25 जून, 1908 को भारत के हरियाणा राज्य के अम्बाला शहर के एक बंगाली ब्राह्मण परिवार में हुआ था। सुचेता कृपलानी के पिता एस.एन. मजुमदार ब्रिटिश सरकार के अधीन एक डॉक्टर होने के बावजूद बेहद पक्के देशप्रेमी देशभक्त व्यक्ति थे

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर भारत की आजादी के आंदोलन में अपना बचपन से ही अनमोल योगदान देने वाली स्वतंत्रता सेनानी सुचेता कृपलानी एक कुशल राजनीतिज्ञ भी थीं। उनको आजाद भारत में उत्तर प्रदेश की प्रथम महिला मुख्यमंत्री के साथ भारत की किसी भी राज्य की प्रथम महिला मुख्यमंत्री होने का गौरव प्राप्त हुआ था। आज 1 दिसंबर को पुण्यतिथि पर उनके संघर्षशील जीवन के बारे में कुछ जानने का प्रयास करते हैं। सुचेता कृपलानी का जन्म 25 जून, 1908 को भारत के हरियाणा राज्य के अम्बाला शहर के एक बंगाली ब्राह्मण परिवार में हुआ था। सुचेता कृपलानी के पिता एस.एन. मजुमदार ब्रिटिश सरकार के अधीन एक डॉक्टर होने के बावजूद बेहद पक्के देशप्रेमी देशभक्त व्यक्ति थे। बचपन से ही अंग्रेज शासकों की भारतीय जनता के प्रति क्रूरता पूर्ण रवैये के खिलाफ सुचेता मजुमदार के मन में जबरदस्त गुस्सा रहता था, उनके मन में देश सेवा का भाव और देश के लिए कुछ कर गुजरने का जुनूनी जज्बा हर वक्त रहता था। सुचेता की शिक्षा लाहौर और दिल्ली में हुई थी। वह दिल्ली के इन्द्रप्रस्थ कॉलेज और बाद में पंजाब विश्वविद्यालय से पढ़ीं। जिसके बाद वह बनारस हिन्दू विश्विद्यालय में इतिहास की प्राध्यापक बनीं थी।

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अपनी आत्मकथा ‘ऐन अनफिनिश्ड ऑटोबायोग्राफी‘ में उन्होंने बचपन के एक ऐसे ही किस्से का जिक्र किया है। सुचेता और उनकी बड़ी बहन सुलेखा एक ही स्कूल में पढ़ते थे। बहन सुलेखा उनसे करीब एक डेढ़ साल बड़ी थी। एक दिन उनको स्कूल की कुछ लड़कियों के साथ कुदसिया गार्डन ले जाया गया। उन दिनों प्रिंस वेल्स (महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के सबसे बड़े बेटे) दिल्ली आने वाले थे, तो उनके स्वागत के लिए कुछ लड़कियों की जरूरत थी। यह सबकुछ जलियांवाला बाग हत्याकांड के कुछ दिनों बाद हो रहा था। जिसकी वजह से देश में हर तरफ भयंकर गुस्से और अंग्रेजों के अत्याचार के चलते बेहद आक्रोश व लाचारी का माहौल था। ऐसे समय में सुचेता और उनकी बहन सुलेखा को जब कुदसिया गार्डन के पास प्रिंस के स्वागत में खड़ी लड़कियों की पंक्ति में खड़े हो जाने का निर्देश मिला, तो वो स्वाभिमान व गुस्से से लाल हो गईं लेकिन उनमें उस समय खुलकर विरोध करने की हिम्मत नहीं थी। लाचारी और गुस्से में दोनों बहन प्रिंस का स्वागत करने की जगह लाइन में पीछे छिपकर चुपचाप खड़ी हो गयी। उस समय अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज ना उठा पाने के अफसोस में सुचेता मजुमदार सालों बाद भी इस घटना को याद कर के शर्मिंदगी महसूस करती रहीं। वर्ष 1936 में उनका विवाह महात्मा गांधी जी के सहयोगी स्वतंत्रता सेनानी आचार्य जे. बी. कृपलानी से हुआ और वह सुचेता मजुमदार से कृपलानी बन गयी। उस समय की परिस्थितियों में सुचेता की शादी आसान नहीं थी, उनके खुद के घर वालों के साथ ही महात्मा गांधी भी सुचेता की शादी के विरोध में थे, जिसका कारण जे.बी. कृपलानी यानी जीवतराम भगवानदास कृपलानी का उनसे उम्र में 20 साल बड़े होना था। वहीं जे.बी. कृपलानी जहां एक सिंधी परिवार से ताल्लुक रखते थे, वहीं सुचेता मजुमदार एक बंगाली परिवार से ताल्लुक रखती थीं। हालांकि दोनों की उम्र और जन्म-स्थान में भले ही बहुत अंतर था लेकिन असल में दोनों एक जैसे ही बेहद जुझारू व जुनूनी थे और देश सेवा के लिए मर मिटने के लिए पूर्ण रूप से समर्पित थे। इसी वजह से दोनों ने विवाह के बंधन में बंधने का निर्णय लिया था।

सुचेता कृपलानी अरुणा आसफ अली और ऊषा मेहता के साथ देश की आजादी के आंदोलन में शामिल हुई। उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में अपना योगदान दिया, बंगाल के दंगाग्रस्त क्षेत्र नोआखली में महात्मा गांधी के साथ दंगा पीडित इलाकों में पीड़ित महिलाओं व अन्य लोगों की हर संभव मदद की, दंगों में महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों की वजह से वह खुद की सुरक्षा के लिए साइनाइड का कैप्सूल हर समय अपने साथ लेकर चलती थी। वह एक ऐसी निड़र महिला थीं, जिसमें देशभक्ति व जुझारूपन कूट-कूट कर भरा था। जिसका उदाहरण उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान दिया। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब अंग्रेजी सरकार ने सारे पुरुष नेताओं को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था, उस समय सुचेता कृपलानी ने अपनी कुशाग्र बुद्धिमत्ता व जुझारूपन का परिचय देते हुए कहा था कि ‘बाकियों की तरह मैं भी जेल चली गई तो आंदोलन को आगे कौन बढ़ाएगा।’ इस दौरान उन्होंने भूमिगत होकर कांग्रेस का महिला विभाग बनाया और अंग्रेजी पुलिस से छुपते-छुपाते दो साल तक जोरशोर से आंदोलन भी चलाया। उन्होंने नौकरी छोड़कर देश को आजाद करवाने का वीणा उठा लिया था, उन्होंने इसके लिए एक ‘अंडरग्राउण्ड वालंटियर फोर्स’ बनाई और महिलाओं और लड़कियों को ड्रिल, लाठी चलाना, प्राथमिक चिकित्सा प्रदान करना और आत्मरक्षा के लिए हथियार चलाने की ट्रेनिंग भी दी थी। इसके साथ-साथ उन्होंने राजनैतिक कैदियों के परिवार की सहायता करने की जिम्मेदारी का बेहद कुशलतापूर्वक निर्वहन किया था। आजादी के बाद जब देश में संविधान बनाने के लिए संविधान सभा की जब उपसमिति बनी तो उसमें शामिल होकर सुचेता देश की महिलाओं का प्रतिनिधित्व कर रही थीं। संविधान बना इसमें महिलाओं के अधिकारों को लेकर सुचेता बेहद मुखर रही थीं। 14 अगस्त 1947 के जवाहरलाल नेहरू के ट्रिस्ट विद डेस्टिनी स्पीच से पहले इन्होंने वंदे मातरम का गायन किया था, सुचेता एक फेमस सिंगर भी थीं।

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वर्ष 1952 में आचार्य जे. बी. कृपलानी के जवाहरलाल नेहरू से संबंध खराब हो गये थे, तो उन्होंने अपनी अलग पार्टी 'कृषक मजदूर प्रजा पार्टी' बना ली थी और यह पार्टी आजाद भारत में जब पहले लोकसभा चुनाव हुए तो कांग्रेस के खिलाफ खड़ी हो गई थी। वर्ष 1952 के लोकसभा चुनाव में सुचेता कृपलानी इसी पार्टी से लड़ीं और नई दिल्ली से चुनाव जीत करके आईं। वर्ष 1957 में वह कांग्रेस से सुलह होने के चलते लगातार दूसरी बार नई दिल्ली से कांग्रेस की सांसद चुनी गईं थी और जवाहरलाल नेहरू ने इनको राज्यमंत्री बनाया। इसके बाद नेहरू ने इनको उत्तर प्रदेश में राजनीति करने के लिए भेज दिया और वह उत्तर प्रदेश विधानसभा की बस्ती जनपद की मेंढवाल विधानसभा से सदस्य चुनीं गयीं। सन 1963 में उन्हें उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया। करीब 3 साल 162 दिनों तक वह वर्ष 1967 तक मुख्यमंत्री पद पर बनी रहीं। उनके कार्यकाल के दौरान सबसे ज्यादा चर्चा में जो मामला था, वो था कर्मचारियों की हड़ताल का। लगभग 62 दिनों तक चली इस हड़ताल का सुचेता कृपलानी ने बहुत ही बखूबी से सामना किया। सुचेता एक बेहद मंझे हुए नेता की तरह प्रशासनिक फैसले लेते समय दिल की नहीं बल्कि अपने दिमाग की सुनती थीं। उसी के बलबूते उन्होंने अंत में कर्मचारियों की मांगों को पूरा किए बिना हड़ताल को सफलतापूर्वक तुड़वा दिया था। वर्ष 1971 में सुचेता कृपलानी ने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया था। 1 दिसंबर 1974 के दिन इस महान स्वतंत्रता सेनानी ने दुनिया को अलविदा कह दिया और आखिरी सांस ली। आज 1 दिसंबर को महान स्वतंत्रता सेनानी सुचेता कृपलानी को पुण्यतिथि पर हम सभी देशवासी कोटि-कोटि नमन करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

दीपक कुमार त्यागी

स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार







गुरु नानक देव जी की यह 10 शिक्षाएं सभी को अपने जीवन में अपनानी चाहिए

  •  शुभा दुबे
  •  नवंबर 29, 2020   11:34
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गुरु नानक देव जी की यह 10 शिक्षाएं सभी को अपने जीवन में अपनानी चाहिए
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गुरु नानक देवजी ने जात−पांत को समाप्त करने और सभी को समान दृष्टि से देखने की दिशा में कदम उठाते हुए 'लंगर' की प्रथा शुरू की थी। लंगर में सब छोटे−बड़े, अमीर−गरीब एक ही पंक्ति में बैठकर भोजन करते हैं। आज भी गुरुद्वारों में उसी लंगर की व्यवस्था चल रही है।

गुरु नानक देव जी सिखों के पहले गुरु थे। अंधविश्वास और आडंबरों के कट्टर विरोधी गुरु नानक का प्रकाश उत्सव (जन्मदिन) कार्तिक पूर्णिमा को मनाया जाता है हालांकि उनका जन्म 15 अप्रैल 1469 को हुआ था। पंजाब के तलवंडी नामक स्थान में एक किसान के घर जन्मे नानक के मस्तक पर शुरू से ही तेज आभा थी। तलवंडी जोकि पाकिस्तान के लाहौर से 30 मील पश्चिम में स्थित है, गुरु नानक का नाम साथ जुड़ने के बाद आगे चलकर ननकाना कहलाया। गुरु नानक के प्रकाश उत्सव पर प्रति वर्ष भारत से सिख श्रद्धालुओं का जत्था ननकाना साहिब जाकर वहां अरदास करता है।

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गुरु नानक बचपन से ही गंभीर प्रवृत्ति के थे। बाल्यकाल में जब उनके अन्य साथी खेल कूद में व्यस्त होते थे तो वह अपने नेत्र बंद कर चिंतन मनन में खो जाते थे। यह देख उनके पिता कालू एवं माता तृप्ता चिंतित रहते थे। उनके पिता ने पंडित हरदयाल के पास उन्हें शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजा लेकिन पंडितजी बालक नानक के प्रश्नों पर निरुत्तर हो जाते थे और उनके ज्ञान को देखकर समझ गए कि नानक को स्वयं ईश्वर ने पढ़ाकर संसार में भेजा है। नानक को मौलवी कुतुबुद्दीन के पास पढ़ने के लिए भेजा गया लेकिन वह भी नानक के प्रश्नों से निरुत्तर हो गए। नानक ने घर बार छोड़ बहुत दूर दूर के देशों में भ्रमण किया जिससे उपासना का सामान्य स्वरूप स्थिर करने में उन्हें बड़ी सहायता मिली। अंत में कबीरदास की 'निर्गुण उपासना' का प्रचार उन्होंने पंजाब में आरंभ किया और वे सिख संप्रदाय के आदिगुरु हुए।

सन् 1485 में नानक का विवाह बटाला निवासी कन्या सुलक्खनी से हुआ। उनके दो पुत्र श्रीचन्द और लक्ष्मीचन्द थे। गुरु नानक के पिता ने उन्हें कृषि, व्यापार आदि में लगाना चाहा किन्तु यह सारे प्रयास नाकाम साबित हुए। उनके पिता ने उन्हें घोड़ों का व्यापार करने के लिए जो राशि दी, नानक ने उसे साधु सेवा में लगा दिया। कुछ समय बाद नानक अपने बहनोई के पास सुल्तानपुर चले गये। वहां वे सुल्तानपुर के गवर्नर दौलत खां के यहां मादी रख लिये गये। नानक अपना काम पूरी ईमानदारी के साथ करते थे और जो भी आय होती थी उसका ज्यादातर हिस्सा साधुओं और गरीबों को दे देते थे।

सिख ग्रंथों के अनुसार, गुरु नानक नित्य प्रातः बेई नदी में स्नान करने जाया करते थे। एक दिन वे स्नान करने के पश्चात वन में अन्तर्ध्यान हो गये। उस समय उन्हें परमात्मा का साक्षात्कार हुआ। परमात्मा ने उन्हें अमृत पिलाया और कहा− मैं सदैव तुम्हारे साथ हूं, जो तुम्हारे सम्पर्क में आयेंगे वे भी आनन्दित होंगे। जाओ दान दो, उपासना करो, स्वयं नाम लो और दूसरों से भी नाम स्मरण कराओ। इस घटना के पश्चात वे अपने परिवार का भार अपने श्वसुर को सौंपकर विचरण करने निकल पड़े और धर्म का प्रचार करने लगे। उन्हें देश के विभिन्न हिस्सों के साथ ही विदेशों की भी यात्राएं कीं और जन सेवा का उपदेश दिया। बाद में वे करतारपुर में बस गये और 1521 ई. से 1539 ई. तक वहीं रहे।

गुरु नानक देवजी ने जात−पांत को समाप्त करने और सभी को समान दृष्टि से देखने की दिशा में कदम उठाते हुए 'लंगर' की प्रथा शुरू की थी। लंगर में सब छोटे−बड़े, अमीर−गरीब एक ही पंक्ति में बैठकर भोजन करते हैं। आज भी गुरुद्वारों में उसी लंगर की व्यवस्था चल रही है, जहां हर समय हर किसी को भोजन उपलब्ध होता है। इस में सेवा और भक्ति का भाव मुख्य होता है। नानक देवजी का जन्मदिन गुरु पूर्व के रूप में मनाया जाता है। तीन दिन पहले से ही प्रभात फेरियां निकाली जाती हैं। जगह−जगह भक्त लोग पानी और शरबत आदि की व्यवस्था करते हैं। गुरु नानक जी का निधन सन 1539 ई. में हुआ। इन्होंने गुरुगद्दी का भार गुरु अंगददेव (बाबा लहना) को सौंप दिया और स्वयं करतारपुर में 'ज्योति' में लीन हो गए।

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गुरु नानक जी की शिक्षा का मूल निचोड़ यही है कि परमात्मा एक, अनन्त, सर्वशक्तिमान और सत्य है। वह सर्वत्र व्याप्त है। मूर्ति−पूजा आदि निरर्थक है। नाम−स्मरण सर्वोपरि तत्त्व है और नाम गुरु के द्वारा ही प्राप्त होता है। गुरु नानक की वाणी भक्ति, ज्ञान और वैराग्य से ओत−प्रोत है। उन्होंने अपने अनुयायियों को जीवन की दस शिक्षाएं दीं जो इस प्रकार हैं− 

1. ईश्वर एक है। 

2. सदैव एक ही ईश्वर की उपासना करो। 

3. ईश्वर सब जगह और प्राणी मात्र में मौजूद है। 

4. ईश्वर की भक्ति करने वालों को किसी का भय नहीं रहता। 

5. ईमानदारी से और मेहनत कर के उदरपूर्ति करनी चाहिए। 

6. बुरा कार्य करने के बारे में न सोचें और न किसी को सताएं। 

7. सदैव प्रसन्न रहना चाहिए। ईश्वर से सदा अपने लिए क्षमा मांगनी चाहिए। 

8. मेहनत और ईमानदारी की कमाई में से ज़रूरतमंद को भी कुछ देना चाहिए। 

9. सभी स्त्री और पुरुष बराबर हैं। 

10. भोजन शरीर को जि़ंदा रखने के लिए ज़रूरी है पर लोभ−लालच व संग्रहवृत्ति बुरी है।

-शुभा दुबे







प्रख्यात वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस उम्दा लेखन भी करते थे

  •  प्रज्ञा पाण्डेय
  •  नवंबर 30, 2020   08:45
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प्रख्यात वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस उम्दा लेखन भी करते थे
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जगदीश चंद्र बोस वर्ष 1885 में भारत लौटे और सहायक प्राचार्य के रूप में प्रेसीडेंसी कॉलेज में काम किया। यहां उन्होंने 1915 तक कार्य किया लेकिन उनके साथ अंग्रेज भेदभाव करते थे। उन्हें अंग्रेज शिक्षकों की तुलना में एक तिहाई वेतन मिलता था।

जगदीश चन्द्र बोस एक वैज्ञानिक होने के साथ भौतिक शास्त्री, लेखक और वनस्पति विज्ञानी थे। बहुमुखी प्रतिभा के धनी श्री बोस का 30 नवम्बर को जन्मदिन है तो आइए हम आपको उनके जीवन के बारे में कुछ रोचक बातें बताते हैं।

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भारतीय वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने रेडियो और माइक्रोवेव ऑप्टिक्स के अविष्कार के साथ पेड़-पौधों के जीवन पर भी बहुत सी खोज की। वह भौतिक वैज्ञानिक होने के साथ-साथ जीव वैज्ञानिक, वनस्पति वैज्ञानिक, पुरातत्वविद और लेखक भी थे। रेडियो विज्ञान के क्षेत्र में उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके कार्य को देखते हुए ‘इंस्टिट्यूट ऑफ इलेक्टि्रकल एंड इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर’ ने उन्हें रेडियो वैज्ञानिक जनकों में से एक माना। जेसी बोस की खोज का नतीजा है कि आज हम रेडियो, टेलिविजन, भुतलीय संचार रिमोट सेन्सिग, रडार, माइक्रोवेव अवन और इंटरनेट का उपभोग कर रहे हैं। 

जगदीश चन्द्र बोस का जन्म 30 नवम्बर, 1858 को मेमनसिंह के ररौली गांव में हुआ था जो वर्तमान में बांग्लादेश में मौजूद है। उनके पिता का नाम भगबान चन्द्र बोस था जो ब्रिटिश इंडिया गवर्नमेंट में विभिन्न कार्यकारी पदों पर कार्यरत थे। जगदीश चन्द्र के जन्म के समय उनके पिता फरीदपुर के उप मजिस्ट्रेट थे। उनका बचपन फरीदपुर में ही बीता था। साथ ही उनकी प्रारम्भिक शिक्षा भी वहीं पर हुई थी। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव की एक पाठशाला से शुरू की क्योंकि उनके पिता चाहते थे कि जगदीश चन्द्र अपनी मातृभाषा सीखी और संस्कृत का ज्ञान अर्जित करें। इसलिए अंग्रेजी स्कूल पास होने के बावजूद भी उनके पिता ने अपने बेटे को सामान्य सी पाठशाला में भेजा। उसके बाद वर्ष 1869 में उनको कोलकाता भेजा गया जहां वह कुछ दिनों बाद सेंट जेवियर स्कूल में पढ़े। 

कुछ दिनों बाद उन्होंने 1879 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से भौतिक-विज्ञान में स्नातक किया। उसके बाद चिकित्साशास्त्र की पढ़ाई करने के लिए वह लंदन गए। लेकिन सेहत खराब होने के कारण वह लंदन से कैम्ब्रिज चले गए और वहां उन्होंने क्राइस्ट कॉलेज में पढ़ाई की।

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जगदीश चंद्र बोस वर्ष 1885 में भारत लौटे और सहायक प्राचार्य के रूप में प्रेसीडेंसी कॉलेज में काम किया। यहां उन्होंने 1915 तक कार्य किया लेकिन उनके साथ अंग्रेज भेदभाव करते थे। उन्हें अंग्रेज शिक्षकों की तुलना में एक तिहाई वेतन मिलता था। इसका उन्होंने तीन साल तक विरोध करते हुए आर्थिक तंगी झेली। उसके बाद चौथे साल जगदीश चंद्र बोस की जीत हुई और उन्हें पूरी सैलरी दी गयी। बोस एक बहुत अच्छे शिक्षक भी थे और उनके कुछ छात्र सत्येंद्रनाथ बोस प्रसिद्ध भौतिक शास्त्री भी बने। प्रेसिडेंसी कॉलेज से रिटायर होने के बाद 1917 ई. में इन्होंने बोस रिसर्च इंस्टिट्यूट, कलकत्ता की स्थापना की और 1937 तक इसके डायरेक्टर पद पर कार्यरत रहे।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी जगदीश चन्द्र बोस को जीवन भर कई प्रकार के पुरस्कार तथा सम्मान प्राप्त हुए। उन्हें 1896 में लंदन विश्‍वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि मिली। उसके बाद 1920 में रॉयल सोसायटी के फेलो चुने गए। इंस्टिट्यूट ऑफ इलेक्ट्रिकल एण्ड इलेक्ट्रोनिक्स इंजीनियर्स ने जगदीष चन्द्र बोस को अपने ‘वायरलेस हॉल ऑफ फेम’ में सम्मिलित किया गया। उसके बाद 1903 में ब्रिटिश सरकार ने बोस को कम्पेनियन ऑफ़ दि आर्डर आफ दि इंडियन एम्पायर से सम्मानित किया। 1917 में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें नाइट बैचलर की उपाधि भी प्रदान की। 

- प्रज्ञा पाण्डेय