By नीरज कुमार दुबे | Sep 09, 2026
“कायर जज कहलाने से बेहतर है कि मैं मर जाऊं।” मुजफ्फरनगर के अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर का यह बयान उस समय सामने आया है, जब उन्होंने महज पांच महीनों में 23वीं मौत की सजा सुनाई है। सोमवार, 7 सितंबर 2026 को उन्होंने दहेज हत्या के एक मामले में मोहम्मद नदीम को अपनी पत्नी शाहजादी की हत्या का दोषी ठहराते हुए फांसी की सजा सुनाई। अदालत ने इस हत्या को “बेहद क्रूर और बर्बर” बताते हुए इसे ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ यानी विरलतम से विरलतम श्रेणी का अपराध माना।
लेकिन इस फैसले की असली गूंज केवल अदालत के आदेश तक सीमित नहीं रही। फैसला सुनाते हुए न्यायाधीश दिवाकर ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की न्याय व्यवस्था में माफिया और गैंगस्टरों के कथित प्रभाव पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि आपराधिक मामलों को दबाव में लंबा खींचे जाने या वापस लिए जाने की घटनाएं सामने आ रही हैं और ऐसी परिस्थितियों में न्यायाधीशों को भयमुक्त होकर अपने कर्तव्य का निर्वहन करना चाहिए।
दिवाकर ने कहा कि हाल के कुछ घटनाक्रमों से वह “गहराई से आहत और दुखी” हैं और इसी कारण उन्हें अपनी व्यक्तिगत राय व्यक्त करने के लिए मजबूर होना पड़ा। उन्होंने कहा कि उन्हें पता है कि उनके न्यायालय से कुछ आपराधिक मुकदमे क्यों वापस लिए गए, लेकिन फिलहाल उन्होंने इसका खुलासा करने से इंकार यह कहते हुए कर दिया कि वह पद की गरिमा बनाए रखना चाहते हैं। न्यायाधीश के मुताबिक, कुछ केस फाइलें वापस लिए जाने के बाद एक गैंगस्टर की ओर से उन्हें संदेश भेजकर चेतावनी दी गई कि यदि उन्होंने इस मुद्दे को आगे बढ़ाया या कोई टिप्पणी की तो उन्हें दूसरे न्यायालय में भेज दिया जाएगा अथवा जिले से बाहर स्थानांतरित कर दिया जाएगा।
दिवाकर ने कहा कि उनके माता-पिता ने उन्हें केवल ईश्वर से डरना सिखाया है। यदि वह माफिया से डर गए तो इससे न्यायपालिका पर जनता का भरोसा कमजोर होगा। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा, “मैं कायर जज कहलाने से बेहतर मरना पसंद करूंगा।” उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक अपने सिद्धांतों के अनुरूप काम कर सकेंगे, न्यायिक सेवा में बने रहेंगे; लेकिन यदि ऐसा करना संभव नहीं रहा तो इस्तीफा दे देंगे।
हम आपको बता दें कि दिवाकर पहले भी सुर्खियों में रहे हैं। वाराणसी में तैनाती के दौरान उन्होंने ज्ञानवापी मस्जिद परिसर के सर्वेक्षण की अनुमति देने वाले मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने अब दावा किया है कि उस प्रकरण के बाद उन्हें और उनके परिवार को कई बार जान से मारने की धमकियां मिलीं। उनका आरोप है कि स्थानीय प्रशासन ने पर्याप्त सुरक्षा उपलब्ध नहीं कराई और बाद में उनकी सुरक्षा भी कम कर दी गई।
उन्होंने अब्बास अंसारी से जुड़े चित्रकूट मामले और बरेली के मौलाना तौकीर रजा से संबंधित कार्यवाही का भी उल्लेख किया। साथ ही उन्होंने उन न्यायिक अधिकारियों की हत्याओं को याद किया, जो गंभीर आपराधिक मामलों से जुड़े थे। इनमें 1982 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति चंद्रशेखर प्रसाद सिंह और उनके किशोर पुत्र की हत्या, 2001 में लखीमपुर खीरी के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट बलराम की हत्या और 2021 में धनबाद के अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश उत्तम आनंद की हत्या जैसे प्रकरण शामिल थे।
रवि कुमार दिवाकर के मुताबिक ये घटनाएं बताती हैं कि गंभीर अपराधों पर फैसला देने वाले न्यायिक अधिकारी किस तरह असामाजिक तत्वों, माफिया और धमकियों के निशाने पर हो सकते हैं। ऐसे में 23वीं फांसी की सजा से ज्यादा महत्वपूर्ण वह सवाल बन गया है, जो उनके बयान ने न्याय व्यवस्था के सामने खड़ा किया है। सवाल यह है कि क्या न्यायाधीश कानून के मुताबिक फैसला सुनाते समय वास्तव में भयमुक्त हैं?