सत्ता का सेमीफाइनल गँवाने वाली भाजपा फाइनल भी इसी तरह खेली तो जाना तय

By नीरज कुमार दुबे | Dec 12, 2018

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के जो परिणाम सामने आये हैं वह मोदी सरकार के लिए बड़ा झटका हैं या राज्यों का नेतृत्व कर रहे भाजपाई मुख्यमंत्रियों के लिए, इसका विश्लेषण शुरू करने से पहले अगर गौर करें तो एक बात जो पूरी तरह साफ नजर आ रही है वह यह है कि इन चुनाव परिणामों ने कांग्रेस मुक्त भारत का सपना देखने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के सपने को बुरी तरह तोड़ कर रख दिया है। लोकसभा चुनावों से मात्र छह महीने पहले कांग्रेस को जो संजीवनी मिली है उससे निश्चित ही पार्टी 2019 के लिए मजबूती के साथ उठ खड़ी होगी। वहीं भाजपा के लिए यह वाकई आत्म-अवलोकन का समय है क्योंकि चुनाव परिणाम जनता के बीच गहरी नाराजगी तो दर्शा ही रहे हैं।

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2019 का चुनाव भी मोदी बनाम राहुल

इन चुनावों परिणामों ने एक बात और साफ कर दी है कि 2014 की तरह 2019 का लोकसभा चुनाव भी नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी रहेगा लेकिन 2014 के मोदी और राहुल में अब काफी फर्क आ चुका है। नरेंद्र मोदी ने 2014 में जो वादे किये थे वह पूरे नहीं हुए हैं और राहुल गांधी के नेतृत्व के प्रति जो संशय 2014 में था वह अब धीरे-धीरे दूर होता जा रहा है। मोदी की छवि कट्टर हिन्दूवादी नेता की थी तो राहुल गांधी भी अब हिन्दूवादी नेता नहीं तो कर्मकाण्डी हिन्दू की अपनी छवि बनाने में कामयाब रहे हैं। 2014 में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी जिस तरह पूरे आत्मविश्वास के साथ अपने भाषणों में तत्कालीन कांग्रेस सरकार पर लग रहे घोटालों के आरोपों का जिक्र कर रहे थे अब उसी आत्मविश्वास के साथ राहुल गांधी सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला करते हैं, और कहते हैं कि चौकीदार खुद चोर है। प्रधानमंत्री राहुल गांधी को नामदार और खुद को कामदार बताते हुए अपने चुनावी भाषणों के माध्यम से खूब तंज कसते रहे लेकिन कुछ हासिल नहीं हुआ।

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राहुल की जीत के दावों में कितना दम ?

अब राहुल गांधी ने दावा किया है कि जिस तरह 2018 के विधानसभा चुनाव जीते हैं उसी तरह 2019 का लोकसभा चुनाव भी जीतेंगे। लेकिन यहाँ राहुल गांधी को कांग्रेस की जीत के प्रति ज्यादा गर्वित इसलिए भी नहीं होना चाहिए क्योंकि जिन पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए उनमें से तीन राज्यों में उसका सीधा मुकाबला भारतीय जनता पार्टी से था। भारतीय जनता पार्टी जोकि दो राज्यों- मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 15 वर्षों से सत्ता में थी वहाँ वह सत्ता विरोधी लहर का सामना कर रही थी इसके अलावा तीसरे राज्य राजस्थान की परम्परा ही रही है कि एक बार भाजपा और एक बार कांग्रेस को सरकार की कमान मिलती रही है। इन तीन राज्यों में ही कांग्रेस अपने प्रदर्शन पर गौर करे तो साफ नजर आ जायेगा कि मध्य प्रदेश में वह काँटे के मुकाबले में बस थोड़े से ही अंतर से आगे निकल पाई है। राजस्थान में भी वह भाजपा का सूपड़ा उस तरह नहीं साफ कर पाई है जिस तरह की उम्मीद की जा रही थी। पिछली बार के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस जहां 200 सदस्यीय विधानसभा में मात्र 21 सीटों पर सिमट गयी थी वहीं इस बार भाजपा 73 सीटों पर मौजूदगी दर्ज कराने में सफल रही।

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छत्तीसगढ़ में जरूर कांग्रेस ने जबरदस्त वापसी की है। इसी प्रकार यदि तेलंगाना में देखें तो तेलुगू देशम पार्टी के साथ गठबंधन करने की कीमत कांग्रेस को चुकानी पड़ी और वह दूसरे नंबर पर सिमट गयी। यह एकमात्र ऐसा राज्य रहा जहां संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी ने चुनावी रैली की थी। इसके अलावा मिजोरम की बात करें तो वहां से कांग्रेस साफ हो गयी है और इस राज्य के जाते ही देश का उत्तर-पूर्व भाग कांग्रेस मुक्त हो गया है। इस तरह कांग्रेस को यह ध्यान रखना चाहिए कि उसे सिर्फ उन्हीं राज्यों में जीत मिली है जहां वह भाजपा के साथ सीधे टक्कर में है और सरकार के खिलाफ नाराजगी का फायदा ही उसे मिल पाया है। फिर भी, परिणामों पर कांग्रेस को खुशी तो जतानी चाहिए लेकिन पार्टी को भाजपा को हल्के में लेने की कोशिश नहीं करनी चाहिए क्योंकि भगवा पार्टी ने उसे काँटे की टक्कर दी है।

मोदी लहर का अब नामोनिशां नहीं

भाजपा जब भी अपनी इस हार की समीक्षा करेगी तब उसे इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि क्यों उसके अधिकांश नेताओं, प्रवक्ताओं, मंत्रियों आदि में अहंकार आ गया है और वह आम जन से कटते जा रहे हैं और खुद को ही सबसे बुद्धिमान समझते हैं। भाजपा को तीन बड़े राज्य खोने के साथ ही जो एक और बड़ा नुकसान हुआ है वह है इसके क्षेत्रीय क्षत्रपों का प्रभुत्व खत्म होना। शिवराज सिंह चौहान, डॉ. रमन सिंह और वसुंधरा राजे भाजपा के प्रमुख स्तम्भों में से थे और यदि यह फिर से सत्ता में आ जाते तो आगे चलकर पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार भी बन सकते थे लेकिन अब ऐसा शायद ही हो पाये। इन तीनों बड़े नेताओं को अब अपनी जमीन फिर मजबूत करने में ही काफी समय लग सकता है। 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद भाजपा का जो विजय रथ निकला था उसने धीरे-धीरे एक एक करके कई राज्यों पर कब्जा जमाया। हालांकि बीच में बिहार और दिल्ली में इस रथ पर ब्रेक भी लगे। इससे साफ है कि 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद यह पहली बार है जब भाजपा ने कांग्रेस के साथ सीधे मुकाबले में सत्ता गँवाई हैं। भाजपा जिस मोदी लहर के सहारे 2019 के चुनावी समर में उतरने की तैयारी कर रही है उसे इन परिणामों से धक्का पहुँचा है।

हार के कारणों पर सरसरी नजर

भाजपा की सरकार वाले तीनों राज्यों में यदि हार के कारणों पर सरसरी तौर पर नजर डालें तो यह साफ दिखता है कि छत्तीसगढ़ में पार्टी को अति-आत्मविश्वास और कांग्रेस के घोषणापत्र में किये गये बड़े-बड़े वादे ले डूबे तो राजस्थान में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की अहंकारपूर्ण शैली ही हार का प्रमुख कारण बनी। वहीं मध्य प्रदेश में सवर्णों की नाराजगी का असर भाजपा के प्रदर्शन पर साफ-साफ दिखाई देता है क्योंकि अगर वहां भाजपा और कांग्रेस को मिले कुल मतों के अंतर की बात की जाये तो वह मात्र 47827 बैठता है जबकि सवर्णों की पार्टी सपाक्स ने 156486 मत हासिल किये इसके अलावा इस राज्य में नोटा को 542295 मत हासिल हुए। इसके अलावा भाजपा ने पहले विधानसभा चुनावों में विकास को मुद्दा बनाया लेकिन फिर धीरे-धीरे ध्रुवीकरण की राजनीति होने लगी। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को आगे करकर हिन्दुत्व की राजनीति करने का प्रयास किया गया इसके अलावा समानांतर रूप से राम मंदिर मुद्दा खड़ा किया गया लेकिन जनता के लिए भाषणबाजी और जुमलेबाजी नहीं बुनियादी जरूरतें ज्यादा जरूरी हैं।

क्षेत्रीय दलों को कम नहीं आंकें

इस जनादेश ने यह भी साबित कर दिया है कि क्षेत्रीय दलों की भूमिका भारतीय राजनीति में बरकरार है। तेलंगाना में टीआरएस को दोबारा मिले भारी बहुमत और मिजोरम में एमएनएफ की वापसी ने दर्शाया है कि जहां-जहां भाजपा और कांग्रेस लोगों की भावनाओं को नहीं समझ रही हैं वहां लोग क्षेत्रीय दलों को महत्व दे रहे हैं। टीआरएस का जादू इसलिए भी सर चढ़कर बोला है क्योंकि राज्य सरकार बहुत सारी जनकल्याणकारी नीतियां लेकर आयी थीं और उसे अमली जामा भी पहनाया था। 

बहरहाल, विधानसभा चुनावों के परिणाम के बाद जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने बड़ी ही विनम्रता का परिचय दिया है उससे इस बार के चुनाव प्रचार के दौरान कही गयी बातें याद आ गयी हैं। जब कोई किसी के गौत्र के बारे में पूछ रहा था तो कोई किसी की माता-पिता पर टिप्पणी कर रहा था। भगवान तक की जाति और वर्ग का उल्लेख करने से नेतागण बाज नहीं आये। यकीनन इस बार के विधानसभा चुनाव भाषा की मर्यादा को गिराने में पिछले चुनावों से आगे निकल गये।

-नीरज कुमार दुबे

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