By अजय कुमार | Dec 22, 2021
एक वर्ष से अधिक समय तक नये कृषि कानून के खिलाफ सफल आंदोलन चलाकर पूरी दुनिया में सुर्खियां बटोरने और मोदी सरकार को नया कृषि कानून वापस लेने के लिए मजबूर कर देने वाले भारतीय भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत राजनीति से दूरी बनाकर चलेगें, वह न तो किसी के पक्ष में नजर आएंगे, न ही किसी का विरोध करते दिखेगें। इससे उन दलों के नेताओं के अरमानों पर पानी फेर दिया है, जो टिकैत की उंगली पकड़ कर विधानसभा तक पहुंचना या अपनी पार्टी की सीटें बढ़ाने का सपना पाले हुए थे, टिकैत ने समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव के चुनाव लड़ने के प्रस्ताव को ‘धन्यवाद’ के साथ ठुकरा दिया है। टिकैत के फैसले से उन लोगों की शंका पर विराम लग गया है जो टिकैत का अगला कदम क्या होगा, इसको लेकर तमाम अटकलें लगा रहे थे। खासकर टिकैत के राजनीतिक रुख को लेकर लोग कुछ ज्यादा ही परेशान थे। टिकैत की तरफ से राजनीति को लेकर काफी कुछ स्पष्ट किया जा चुका है। उनके हाल तक के बयानों और रवैये से तो यही लग रहा है कि वह राजनीति से पूरी तरह से दूरी बनाकर रखेंगे, इसका कारण भी है। राकेश टिकैत ने किसानों के पक्ष में बड़ा आंदोलन चलाकर जो अपनी छवि बनाई है वह उसे राजनीति के पचड़े में पड़कर खराब होता नहीं देखना चाहते हैं। टिकैत जानते हैं कि राजनीति में कदम रखते हैं उनके ऊपर कई तरह के आरोप लगने लगेंगे। वैसे भी टिकैत संयुक्त किसान मोर्चा जिसके बैनर तले किसान आंदोलन चला था, उसने भी फैसला कर रखा है कि मोर्चा चुनावी राजनीति से दूरी बनाकर चलेगा। बात टिकैत की कि जाए तो वह स्वयं भी राजनीति के मैदान में कभी सफल खिलाड़ी नहीं साबित हुए हैँ। टिकैत ने पहली बार 2007 के यूपी विधानसभा चुनाव में किस्मत आजमाई थी। उस समय प्रदेश में बसपा की हुकूमत थी। टिकैत ने मुजफ्फरनगर की खतौली विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा था। हालांकि, उन्हें जीत नसीब नहीं हुई थी। इस हार के बाद राकेश टिकैत ने साल 2014 में राष्ट्रीय लोकदल के टिकट पर अमरोहा लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था। लेकिन, इस चुनाव में भी टिकैत को हार का सामना करना पड़ा था। इस चुनाव में टिकैत को केवल 9,359 वोट मिले थे।
बहरहाल, हो सकता है किसान आंदोलन खत्म नहीं हुआ होता तो राकेश टिकैत खुद या अपने किसी करीबी को विधानसभा चुनाव लड़ा देते या फिर किसी दल का समर्थन करते, लेकिन आंदोलन खत्म हो गया है। केंद्र सरकार ने किसानों की बातें मान ली हैं, इस लिए किसानों की मोदी सरकार से नाराजगी काफी कम हो चुकी है। इसके अलावा भी मोदी-योगी सरकार द्वारा किसानों के लिए जो कुछ किया जा रहा है वह किसी से छुपा नहीं है। एक बात और ध्यान देने वाली है कि राकेश टिकैत ने आंदोलन के सहारे जो अपनी संघर्ष वाली इमेज बनाई है, वह इमेज उनके किसी दल से चुनाव लड़ने से टूट सकती है। फिर वह आगे कभी कोई आंदोलन भी नहीं चला पाएंगे। वैसे भी आंदोलन के दौरान बार-बार टिकैत पर कांग्रेस और सपा समर्थक तथा भाजपा विरोधी होने का आरोप लग रहा था। अपनी छवि को लेकर टिकैत इतना अलर्ट हैं क़ि उन्हें जब पता चला कि कुछ लोग उनकी फोटो का अपने बैनर पोस्टर में इस्तेमाल कर रहे हैं तो उन्होंने साफ कह दिया उनकी फोटो या उनकी यूनियन अथवा किसान आंदोलन के सहारे कोई अपना ‘खेत जोतने’ की कोशिश ना करें। सपा प्रमुख अखिलेश यादव के चुनाव लड़ने के प्रस्ताव को भी राकेश टिकैत ने ठुकरा दिया है। राकेश टिकैत अगर अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव से तटस्थ रहते हैं तो इसका भाजपा को बड़ा फायदा मिल सकता है। वहीं सपा-रालोद के गठबंधन के लिए यह शुभ संकेत नहीं होगा, क्योंकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सपा-राष्ट्रीय लोकदल के गठबंधन का पूरा चुनावी तानाबान भाकियू नेता राकेश टिकैत के इर्दगिर्द ही घुमता नजर आ रहा है। इसके साथ ही आंदोलन चलने के दौरान यह अटकलें भी लगाई जा रही थीं कि टिकैत के विरोध के चलते बीजेपी को यहां बड़ा नुकसान उठाना पड़ेगा, लेकिन आंदोलन खत्म होने और टिकैत के बीजेपी को लेकर नरम रूख के चलते भाजपा ने राहत महसूस की है तो सपा परेशान है।
- अजय कुमार