रिवेंज शॉपिंग ने भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास को दी है नई रफ्तार

By डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा | Oct 06, 2022

गुस्सा या यों कहें कि बदला भी इकोनोमी को बूस्ट कर सकता है। इसका जीता जागता उदाहरण है कोरोना के साये से निकलने के बाद खरीदारी की आजादी का। कोरोना ने लोगों की सोच ही बदल डाली थी और लोग भविष्य के लिए इस कदर चिंतित होने लगे थे कि भविष्य के लिए बचत और बचत ही एक मात्र ध्येय हो गया था। लोगों का ध्यान केवल बचत और खाने-पीने की सामग्री का संग्रहण, इन दो पर ही हो गया था। इसका कारण भी साफ था कि कोरोना के दौर में कब घर में कैद होना पड़े इसका अंदाज ही नहीं लगाया जा सकता था। ऐसे में लोग समुचित खाद्य सामग्री घर पर रखने पर जोर देने लगे तो आवश्यक सामग्री के अलावा अन्य चीजों पर ध्यान देना ही लगभग छोड़ दिया था। सालाना मोबाइल बदलने की आदत लोगों की छूटी तो लोगों ने कपड़ों आदि की खरीदारी से भी मुंह मोड़ लिया।

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रिवेंज शॉपिंग को यों समझा जा सकता है कि इंग्लैण्ड की प्रिंसेज डायना को जब यह पता चला कि प्रिंस विलियम की जिंदगी में दूसरी औरत है तो उन्होंने उसी दिन ब्लैक ऑफ सोल्डर ड्रेस पहनी जो आज भी लोगों की जेहन में है। जिस तरह से बाड़े में बंद जानवरों को बाड़े से निकाला जाता है तो वह दौड़ लगा देते हैं, उसी तरह से कोरोना त्रासदी से मुक्ति का जश्न लोग रिवेंज शॉपिंग के माध्यम से मनाने लगे हैं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की हालिया रिपोर्ट को देखें तो भारतीयों में घरेलू बचत की जो आदत थी वह घट कर पिछले पांच वर्ष के निचले स्तर पर आ गई है जबकि कोरोना काल में घरेलू बचत का आंकड़ा जीडीपी की 21 फीसदी तक पहुंच गया था। देखा जाए तो ऋणं कृत्वा घृतम पिवेत की संस्कृति विकसित हुई है और यही कारण है कि छोटे लोन से लेकर ऋण सेगमेंट में अच्छी खासा बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। हालांकि अब ब्याज दरों में बढ़ोतरी होने लगी है इससे ऋणियों पर ईएमआई का बोझ बड़ेगा।

दरअसल जब लोगों के पास पैसा आता है या यों कहें कि पैसों की सहज उपलब्धता होने लगती है तो बाजार में बूम आता ही है। इकोनोमी के लिए यह जरूरी भी है। मजे की बात यह है कि यह सब कुछ तब है जब बाजार में हर वस्तुओं के दामों में बढ़ोतरी हो रही है। कोरोना काल में जो लोगों की सोच विकसित हुई थी अब उसमें तेजी से बदलाव आया है। कोरोना काल में लोगों का सोच यही थी कि दो पैसा है तो अड़ी-बड़ी वक्त में काम आयेगा, वहीं अब लोगों की सोच में यह बदलाव देखने को मिल रहा है कि जिंदगी का दो घड़ी का भरोसा नहीं है तो फिर काहे की बचत। घूमो फिरो और मौज करो की भावना आने लगी है।

वैसे भी अब बाजार विशेषज्ञों की त्यौहारी खरीदारी पर नजर है। जिस तरह से मार्केट रिएक्शनस आने लगे हैं उससे सभी क्षेत्र में अच्छी खरीदारी के संकेत आने लगे हैं। जानकारों की मानें तो दीपावली के त्यौहारी सीजन में 125 करोड़ रु. के कारोबार की संभावनाएं व्यक्त की जा रही हैं। पिछले दिनों में सर्राफा बाजार में तेजी देखने को मिल रही है तो इलेक्ट्रोनिक उद्योग भी गति पकड़ रहा है। चौपहिया और दुपहिया वाहनों का बाजार तो पूरी तरह से गुलजार दिखाई दे रहा है। जानकारों की मानें तो रिवेंज शॉपिंग का पूरा असर इस त्यौहारी सीजन में दिखाई देगा। लाख महंगाई की चर्चा हो रही हो पर यह साफ है कि इकोनोमी और खासतौर से घरेलू मार्केट को बूम मिलना साफ दिखाई दे रहा है।

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रिवेंज शॉपिंग का असर हमारे यहां ही नहीं अपितु दुनिया के अन्य देशों में भी साफ दिखाई दे रहा है। हमारे देश में यह नया चलन है। जिस तरह से आक्रोश दबा रहता है तो उसका असर दिखाई देता है, उसी तरह से रिवेंज शॉपिंग का असर दिखाई देगा और यही भारतीय इकोनोमी की चहुंमुखी बहार का कारण बनेगा, इसमें कोई दो राय नहीं दिखाई देती है। रिवेंज शॉपिंग का असर एमएसएमई से लेकर घरेलू दस्तकारों, शिल्पकारों और निर्माताओं तक को मिलेगा। हालांकि अब ई-मार्केटिंग की ओर तेजी से रुझान बढ़ता जा रहा है। ऐसे में कोरोना के बाद रिवेंज शॉपिंग को भारतीय घरेलू इकोनोमी के लिए शुभ संकेत के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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