संघ का असल रूप देखना हो तो जरा नागपुर आकर उसका सेवा कार्य देखें

By तरुण विजय | Apr 14, 2021

जो संघ को नहीं जानते, वे संघ के बारे में सबसे ज्यादा कहते और लिखते हैं, पर जो जानते हैं वे संघ की केशव-सृष्टि के साथ इतने एकात्म हो रहते हैं कि उसके बारे में कहना, लिखना कम ही होता है। गत सप्ताह मैं नागपुर गया, स्मृति मंदिर की पुण्य प्रभा के दर्शन किए और श्रीराम जोशी जी से मिलने गया। उनसे पहली बार मिलना हुआ था 19 जून, 1997 को, जब पांचजन्य के प्रचारक माताओं पर केंद्रित अंक हेतु सौ. सविता श्रीराम जोशी जी का साक्षात्कार किया था। अभी कुछ समय पहले उन पुण्यशाली माँ का निधन हुआ। वे उन संघ-माताओं में हैं जिनके पुत्र प्रचारक बन भारत माता की सेवा हेतु निकले। श्रीराम जोशी जी अभी 84 वर्ष के हैं, परन्तु सिंह साहसी फौलादी स्वयंसेवक। उनके यहाँ जो चर्चा हुई वह अलग विषय है पर आबा जी थत्ते की स्मृति में बन रहे राष्ट्रीय कैंसर संस्थान की चर्चा निकली। आबा जी थत्ते अर्थात् डॉ. वासुदेव केशव थत्ते संघ के प्रचारक थे, पूज्य श्री गुरुजी तथा पूज्य बाला साहब देवरस के निजी सहायक के नाते उन्होंने 45 वर्ष बिताए। वे एन.एम.ओ. यानी राष्ट्रीय मेडिकोज संगठन के भी संस्थापक हैं। उनकी स्मृति में स्वयंसेवकों द्वारा नागपुर में डॉ. आबा जी थत्ते सेवा और अनुसंधान संस्था गठित जिसके अनेक वर्षों तक श्री देवेंद्र फडणवीस अध्यक्ष रहे और जब वे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने तो इसका दायित्व मनोहर जी को मिला। श्री देवेंद्र फडणवीस के पिता गंगाधर राव जी कैंसर के कारण ही दिवंगत हुए।

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कल्पना करिए, कैंसर पीड़ित रोगियों को अभी तक टाटा या दिल्ली के राजीव गाँधी अस्पताल जैसे संस्थानों में ही आना होता था। प्रतिवर्ष सात लाख कैंसर पीड़ित भारतीय या तो उचित चिकित्सा के अभाव में अथवा रोग की सही समय पर पहचान न होने के कारण काल कवलित होते हैं। जिन चिकित्सा संस्थानों में निराशा-हताशा कुंठा और आर्थिक बोझ से दबे रोगी तथा उनके निकट संबंधियों पिता, पुत्र, माँ, पत्नी के लिए भविष्य अंधकारमय दिखता है- उनके लिए चिकित्सालय में रुकने की जगह नहीं होती, वे या तो फुटपाथ, या अस्पताल के गलियारों या धर्मशालाओं में रुकते हैं, जमीन, मकान बेचकर या गिरवी रखकर अपने प्रियजन को ठीक, स्वस्थ करने की कोशिश करते हैं, वे जब पांच सितारा होटलों की तरह चलाए जा रहे निजी अस्पतालों में जा फंसते हैं तो उन पर क्या गुजरती होगी?

डॉ. हेडगेवार और अरबाजी थत्ते की स्मृति को संजोए स्वयंसेवकों ने इसी वेदना को अंतरतम में धरा और कैंसर शोध संस्थान को मूर्त्त रूप देने में जुटे। शैलेश जोगलेकर बताते हैं- यह देश का प्रथम कैंसर (कर्क रोग) चिकित्सा संस्थान है, जहाँ बाल- रोगियों (पेडियाट्रिक्स) के लिए पृथक चिकित्सा खंड है- और प्रत्येक कैंसर पीड़ित बाल रोगी की चिकित्सा निशुल्क है। यदि रोगी के अभिभावक समृद्ध हैं तो भी पर वे जो उचित समझें, वह राशि दान रूप में दे सकते हैं। इतना ही नहीं- यह देश का प्रथम चिकित्सा संस्थान होगा जिसमें प्रत्येक रोगी को कर्क सेवक मिलेगा यानी उसे सलाह देने, उसके पिछले रिकॉर्ड लेने, उसकी पुरानी चिकित्सा एवं अन्य किसी भी प्रकार की सहायता हेतु स्वयंसेवी सहायक। और फिर यहाँ होंगे कर्क योद्धा- यानी वे डॉक्टर जो शोध करेंगे। नवीनतम औषधियों तथा पद्धतियों से कर्क रोगी (कैंसर रोगी) को चिकित्सा लाभ देंगे तथा उसे मानसिक तनाव से यथासंभव राहत दिलाने जा प्रयास करेंगे।

और बड़ा प्रश्न होता है- रोगी तो भर्ती हो गया- पर उसे सहायता देने वाले कहाँ रहेंगे? तो उसे धर्मशाला कहें या सराय, निकट ही 50 अपार्टमेंट ले लिए गए जहाँ वे रुक सकेंगे।

बाजार से सी.टी स्कैन, एम.आर.आई. के लिए 3-4 हजार से 7-8 हजार और पेट स्कैन करने के लिए 22 हजार से 27 हजार रुपए तक लगते हैं। यहाँ 1200 रुपए से तीन हजार रुपए और पेट स्कैन के सिर्फ बारह से पंद्रह हजार लिए जा रहे हैं- केवल कर्क रोगियों के लिए।

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मैं डॉक्टर नहीं, स्वयंसेवक के नाते यह सब शैलेश जी से सुनते हुए मेरी आंखें नम हो आयीं। कितने-कितने रोगियों को डॉ. हेडगेवार और अरबाजी थत्ते एक नयी आशा, विश्वस्तरीय चिकित्सा और नया जीवन दे रहे हैं। राजनीति तो (छद्म) है, देवेंद्र फडणवीस, शैलेश जोगलेकर, सतीश साल्पेकर, अधिवक्ता मनोहर एब स्वयंसेवक यदि आ जुटे तो इसलिए क्योंकि एक थे डॉक्टर केशव राव बलिराम हेडगेकर। उन्होंने स्वयं को पीछे रखते हुए ऐसे भारतीय निर्मित किये जिनके लिए सर्वोच्च आराध्य है भारत माता और श्रेष्ठतम मार्ग है सेवा।

इसलिए यदि डॉ. हेडगेकार को देखना है तो उन्हें आप यहाँ जीवन्त रूप में देख सकेंगे सेवा करते हुए, सेवा जो जीवन को पाथेय बनाने की प्रेरणा देती है।

-तरुण विजय

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राज्यसभा के पूर्व सदस्य हैं।)

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