कैसे संघ ने 'दरबार साहिब' को दो बार बचाने में मदद की और हिंदू-सिख एकता को रखा बरकरार

कैसे संघ ने 'दरबार साहिब' को दो बार बचाने में मदद की और हिंदू-सिख एकता को रखा बरकरार

इतिहास पर नज़र डालें तो 1947 के दौर में एक नहीं बल्कि दो-दो बार संघ ने दरबार साहिब को मुस्लिम लीग के नेतृत्व वाली भीड़ से बचाने के लिए सामने आया। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 के सिख विरोधी दंगे के दौरान भी आरएसएस उनके बचाव के लिए खड़ा रहा।

एसजीपीसी ने आरएसएस के खिलाफ एक प्रस्ताव पास किया है। जिसके बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए एसजीपीसी के अध्यक्ष बीबी जगीर कौर ने कहा कि आरएसएस उनके और अल्पसंख्यकों के धर्म में अपनी दखलअंदाज़ी को बंद करे। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी भारत में मौजूद संस्था है जो गुरुद्वारों के रख-रखाव के लिये उत्तरदायी है।

आरएसएस ने सिखों के पवित्र स्थल दरबार साहिब की रक्षा दो बार की। इतिहास पर नज़र डालें तो 1947 के दौर में एक नहीं बल्कि दो-दो बार संघ ने दरबार साहिब को मुस्लिम लीग के नेतृत्व वाली भीड़ से बचाने के लिए सामने आया। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 के सिख विरोधी दंगे के दौरान भी आरएसएस उनके बचाव के लिए खड़ा रहा। प्रिंट की रिपोर्ट के अनुसार 25 जून 1989 को 21 स्वयंसेवकों ने पंजाब में आतंकवाद की वजह से अपने प्राणों की आहुति दी। मोगा के एक पार्क में आयोजित संघ की शाखा में आतंकवादी हमला हुआ था। सभी स्वयंसेवकों को गोली मारा गया था।

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आरएसएस और सिखों के बीच संबंध का एक ऐतिहासिक संदर्भ है। 1947 में भारत के विभाजन के दौरान, आरएसएस ने बड़ी संख्या में सिखों की जान भी बचाई और पंजाब की एक बड़ी आबादी को मुस्लिम लीग के नेतृत्व वाली भीड़ से बचाने में प्रमुख भूमिका निभाई। इसके साथ ही उन्हें सुरक्षित स्थान पर भी पहुँचाया। 





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