जनसंघ का अनुभव और RSS का हाथ, ऐसे बनी बीजेपी अचूक, अभेद्य, अपराजेय

जनसंघ का अनुभव और RSS का हाथ, ऐसे बनी बीजेपी अचूक, अभेद्य, अपराजेय

1980 में 6 अप्रैल को बनी बीजेपी आज देश की सत्ताधारी पार्टी ही नहीं बल्कि इसके खिले हुए कमल में 13 करोड़ से ज्यादा कार्यकर्ताओं का ज्जबा समाया है।

संघर्षों की बुनियाद पर कामयाबियों की बुलंद इमारत कैसे तैयार होती है भारतीय जनता पार्टी इसकी मिसाल है। जिसका हर कदम कामयाबियों को चूमता है, हर निशाना अचूक होता है। जिसकी सियासी सूझबूझ का किला अभेद्य है। आज हिन्दुस्तान की राजनीति में इस पार्टी का कद और ओहदा इतना बड़ा और बुलंद हो गया है कि उसे अपराजेय कहा जाने लगा है। एक पार्टी जहां एक और एक ग्यारह हो जाते हैं। फिर ग्यारह लोग मिलकर 41 साल पहले एक सफर की शुरूआत करते हैं। वो राजनीतिक सफर आज उस मुकाम पर पहुंच गया है कि ग्यारह लोगों की खड़ी की गई पार्टी न सिर्फ केंद्र में बल्कि देश के 17 राज्यों में अपनी सरकार चला रही है। जिसका विजय रथ बगैर किसी रोक-टोक के बढ़ता ही जा रहा है। आज हम उसी भारतीय जनता पार्टी का एमआरआई स्कैन करेंगे जो लोकसभा में कभी दो पर थी आज 303 सांसद हैं। जिसके पास 1 हजार से ज्यादा विधायक और 13 करोड़ से ज्यादा कार्यकर्ता हैं।

1951 में श्याना प्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ बनाया। जब 1952 में पहली बार लोकसभा के चुनाव हो रहे थे तो उस दौर में कांग्रेस के खिलाफ सोशलिस्ट पार्टियां भी लड़ रही थीं और कम्युनिस्ट भी थे। इनके बीच एक दल था भारतीय जनसंघ जिसे चुनावी गणित में खास नोटिस नहीं लिया गया। इस चुनाव में जनसंघ को केवल 3 सीटें मिलीं। इसके बाद जनसंघ का संघर्ष चलता रहा लेकिन उसी जनसंघ के गर्भ से निकली बीजेपी ने आज हिदुस्तान में सभी दलों की राजनीतिक चौहद्दी को समेट दिया है। ये कहानी है एक पुकार की एक यल्गार की ये कहानी है हिन्दुस्तान की नहीं दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी की। ये कहानी है बीजेपी के बनने और राजनीतिक क्षितिज की ओर बढ़ने की।

एक सपना जो चार दशक में किसी राजनीतिक दल के लिए सबसे खूबसूरत सच्चाई बन गया। 1980 में 6 अप्रैल को बनी बीजेपी आज देश की सत्ताधारी पार्टी ही नहीं बल्कि इसके खिले हुए कमल में 13 करोड़ से ज्यादा कार्यकर्ताओं का ज्जबा समाया है। आज देश की सबसे बड़ी पार्टी देश पर राज करने वाली पार्टी बनकर उभरी बीजेपी का जन्म 41 साल पहले मुंबई में समुद्र किनारे हुआ। जनता पार्टी से अलग होकर भारतीय जनसंघ के नेताओं ने 6 अप्रैल 1980 को मुंबई में भारतीय जनता पार्टी बनाई और अटल बिहारी वाजपेयी को इसका पहला अध्यक्ष। उस उमस भरी शाम को ही अटल बिहारी वाजपेयी ने कमल के खिलने की भविष्यवाणी अपनी ओजस्वी वाणी में कर दी थी।

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 उस वक्त बीजेपी के पास जनता पार्टी की सरकार का अनुभव था और पुराने जनसंघ के कार्यकर्ताओं का समर्थन था और पीठ पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का हाथ। फिर भी  बीजेपी ने जनसंघ के पुराने तेवरों को छोड़ते हुए गांधीवादी समाजवाद का रास्ता चुना। लेकिन इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए 1984 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की ऐसी दुर्गति हुई कि वो महज दो पर सिमट गई। तब कांग्रेस ने उनका खूब मजाक भी उड़ाय़ा था। उस चुनाव में दो सीटे जीतने वाली बीजेपी में एक चंदू पाटिया थे जिन्होंने नरसिम्हा राव को मात दी थी वहीं गुजरात के मेहसाणा से एके पटेल को जीत मिली थी। 1984 की हार ने बीजेपी को रास्ता बदलने पर मजबूर कर दिया। आखिर वाजपेयी तक हार गए थे। थोड़े कट्टर छवि के माने जाने वाले लाल कृष्ण आडवाणी बीजेपी के नए अध्यक्ष बन गए। अब बीजेपी में नेतृत्व आडवाणी का था और नियंत्रण संघ का।

1987 में आडवाणी, वाजपेयी और आरएसएस के तत्कालीन सरसंघचालक बाला साहेब देवरस के बीच हुई मीटिंग में सवाल उठा कि बीजेपी कैसे कांग्रेस से आगे निकल पाएगी। देवरस ने कहा- राम मंदिर के रास्ते से। आडवाणी ने लाइन पकड़ ली।

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 राजीव सरकार भ्रष्टाचार, शाहबानों केस और अयोध्या में राम मंदिर का ताला खुलवाकर घिर चुकी थी। बीजेपी एक तरफ संयुक्त विपक्ष का हिस्सा बनी तो दूसरी तरफ संघ के प्रखर हिन्दुत्व का प्रतीक बनी विश्व हिंदू परिषद। बीजेपी को इसका फायदा मिला जब 1989 के चुनाव में जनता दल से हाथ मिलाकर उसने 86 सीटें जीत ली। हिमाचल के पालमपुर में 1988 में अयोध्या आंदोलन में शामिल होने का फैसला किया और फिर सोमनाथ से अयोध्या रथयात्रा के कार्यक्रम से मिली लोकप्रियता ने आडवाणी को संघ और पार्टी की नजर में अलग पहचान दी। 1991 का चुनाव बीजेपी ने राम मंदिर के मुद्दे पर लड़ा और उसने 120 सीटें जीत लीं। इस साल बीजेपी देश की नंबर दो पार्टी बन गई। बीजेपी को लग गया कि सत्ता की संजीवनी चाहिए तो राम नाम से राष्ट्रवाद पर जाना होगा। इसी दौर में बीजेपी में मुरली मनोहर जोशी अध्यक्ष बन गए थे। दिसंबर 1991 में उनकी तिरंगा यात्रा निकली जिसका मकसद 26 जनवरी 1992 को श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराना था। साल 1993 में आडवाणी एक बार फिर बीजेपी के अध्यक्ष बनते हैं। आडवाणी को ये अंदाजा था कि पार्टी को नंबर टू से नंबर 1 बनाने और इससे भी आगे प्रधानमंत्री देने के लिए कोई उदार छवि वाला चेहरा चाहिए। 1995 में वाजपेयी जी से बगैर पूछे ही उनको प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया और उनके इस ऐलान के बाद सब के सब हैरान रह गए थे। अटल जी के नेतृत्व में बीजेपी सरकार बनाने में कामयाब रही। इसी दौर में भारतीय जनता पार्टी में पितृ पुरुष कहे जाने वाले कुशाभाऊ ठाकरे की बीजेपी के अध्यक्ष पद पर ताजपोशी होती है। 2000 में आंध्र प्रदेश से आने वाले बंगारू लक्ष्मण बीजेपी के अध्यक्ष बनाए जाते हैं। लेकिन बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण तहलका कांड में फंसते हैं जिसके बाद न सिर्फ उनकी कुर्सी गई बल्कि पार्टी की छवि पर भी सवाल उठा। जेना कृष्णमूर्ती के बाद बीजेपी की कमान 2002 में वेंकैया नायडू को सौंपी गई थी। साल 2004 में इंडिया शाइनिंग के बुरी तरह फेल होने के बाद एक बार फिर से बीजेपी की कमान लालकृष्ण आडवाणी के हाथों में आ जाती है। लेकिन आडवाणी के नेतृत्व में बीजेपी को 2009 के चुनाव में भी शिकस्त ही मिलती है। इस दौरान बीजेपी ने राजनाथ सिंह से लेकर नितिन गडकरी तक अपने अध्यक्ष बदलते गए। 2004 से सत्ता से बाहर भाजपा ने 2013 में अटल-आडवाणी के दौर के बाद नए नेता के रूप में अपना चेहरा बनाया था। उस दौर में यह शायद पहला ऐसा मौका था जब भाजपा के किसी अध्यक्ष ने अपने टीम के गठन में इतने बड़े स्तर पर बदलाव किए थे। जिनमें 12 में से दस उपाध्यक्ष और सभी महासचिव नए थेl। छह साल पहले संसदीय बोर्ड से हटाए गए नरेंद्र मोदी को फिर बोर्ड में शामिल कर भाजपा ने अपने इरादे साफ़ जाहिर कर दिए थे। जिसके बाद मोदी को सेंट्रल इलेक्शन कैंपेन कमिटी का चेयरमैन बनाया गया। वो एकमात्र ऐसे पदासीन मुख्यमंत्री थे, जिन्हें संसदीय बोर्ड में शामिल किया गया था। याद कीजिए 2014 की मोदी की यात्राएं और सभाएं। भ्रष्टाचार के आरोपों से धूमिल मनमोहन के मंत्रिमंडल के मुकाबले उन्होंने राजनीति में अलादीन का चिराग रख दिया। गुजरात की चौहद्दी से निकले मोदी ने 2014 के चुनाव में उतरते ही एक इतनी बड़ी लकीर खींच दी थी जिसके सामने सब अपने आप छोटे हो गए थे। बीजेपी तो पहले भी जीत चुकी है लेकिन ऐसी जीत पहले कभी नहीं मिली। 182 की चौखट पर हांफने वाली बीजेपी अपने बूते बहुमत के आंकड़े को पार किया। एक चाय वाले ने भारतीय राजनीति के प्याले में तूफान ला दिया। दसों दिशाओं से आने वाली जीत मोदी की इस शख्सियत के सामने झुकती चली गई। वो आए तो सबने कहा आने दो देख लेंगे, उसने देखा तो सबने कहा देखने दो कोई फर्क नहीं पड़ता है। लेकिन उसने जीत लिया तो सबने कहा भारतीय लोकतंत्र का इतिहास नेपोलियन हिटलर को देख रहा है। लेकिन इन सब बातों से बेपरवाह उसने वो पुरानी कहावत को सोलह आने सच साबित करके दिखाया कि ‘वो आया, उसने देखा और जीत लिया’। सोलहवीं लोकसभा अपनी सोलहों कलाओं के साथ उस शख्स पर कुर्बान हो गई और पार्टी की कमान बीजेपी की जीत के सूत्रधार अमित शाह को पार्टी की कमान सौंपी गई। 17वीं लोकसभा में नरेंद्र मोदी ने खुद को प्रधानमंत्री और निरंतर प्रधानमंत्री के दोराहे पर मूर्धन्य की तरह स्थापित कर दिया। वहीं राम से आगे बढ़ चुकी बीजेपी आज जेपी नड्डा के नेतृत्व में विकास के अखाड़े में सारे विरोधियों को धूल चटा चुकी है। एक के बाद एक चुनावी नतीजों ने सिद्ध कर दिया कि जनता बीजेपी पर उठे हर सवालों को खारिज कर चुकी है और इतनी ही नहीं उसे हर सवाल का जवाब मान चुकी है। वर्तमान दौर में बीजेपी के करिश्मे ने देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस को इतिहास की राजनीति का डब्बा बना दिया और गुजरती हुई सत्ता और आती हुई सत्ता के संधिस्थल पर खुद को सियासी सफलता का साम्राज्य।- अभिनय आकाश







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