By नीरज कुमार दुबे | Aug 10, 2026
पश्चिम एशिया में जारी अस्थिरता और समुद्री व्यापार मार्गों पर बढ़ते जोखिम के बीच रूस ने भारत के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को एक नई दिशा देने वाला बड़ा प्रस्ताव सामने रखा है। रूस के उप प्रधानमंत्री मरात खुसनुलिन ने मॉस्को से हिंद महासागर तक सीधे रेल संपर्क की संभावनाएं तलाशने की बात कही है। उन्होंने कहा है कि बोस्फोरस और होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे रणनीतिक समुद्री मार्गों पर बढ़ते जोखिमों को देखते हुए रूस और भारत के बीच वैकल्पिक जमीनी संपर्क विकसित करना जरूरी हो गया है। रूसी समाचार एजेंसी TASS के हवाले से खुसनुलिन ने कहा कि तुर्कमेनिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के रास्ते भारत तक पहुंचने वाले विकल्पों पर विचार किया जा सकता है और भारत तक पहुंच उपलब्ध कराने वाला कोई भी विकल्प स्वीकार्य होगा।
रूस के इस प्रस्ताव को समझने के लिए मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियों को देखना जरूरी है। 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल की ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के बाद पश्चिम एशिया में तनाव तेजी से बढ़ा। ईरान की जवाबी मिसाइल और ड्रोन कार्रवाइयों के बाद फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री यातायात पर गंभीर असर पड़ा। रिपोर्टों के मुताबिक होर्मुज से होकर गुजरने वाला वैश्विक तेल व्यापार का करीब पांचवां हिस्सा प्रभावित हुआ।
हम आपको बता दें कि होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है और यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में शामिल है। इसी तरह तुर्किये के नियंत्रण वाला बोस्फोरस जलडमरूमध्य काला सागर को मरमारा सागर से जोड़ता है। ऐसे समुद्री ‘चोकपॉइंट’ किसी भी संकट की स्थिति में अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकते हैं। यही वजह है कि मॉस्को अब समुद्री मार्गों के साथ-साथ वैकल्पिक स्थलीय व्यापार नेटवर्क विकसित करने पर जोर दे रहा है।
इस प्रस्ताव का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि रूस ने संभावित रेल मार्ग के अंतिम गंतव्य के रूप में भारत को विशेष महत्व दिया है। यह संयोग नहीं है। भारत और रूस पहले से ही International North-South Transport Corridor (INSTC) के प्रमुख साझेदार हैं। लगभग 7200 किलोमीटर लंबा यह बहु-माध्यमीय कॉरिडोर रूस को ईरान और भारत से जोड़ने की महत्वाकांक्षी परियोजना है। इसमें रेल, सड़क और समुद्री परिवहन का संयोजन शामिल है।
मौजूदा व्यवस्था में रूस से आने वाला माल कजाखस्तान और तुर्कमेनिस्तान होते हुए ईरान पहुंच सकता है। वहां से रेल नेटवर्क के जरिए बंदर अब्बास जैसे बंदरगाहों तक और फिर समुद्री रास्ते से भारत भेजा जा सकता है। पूर्वी शाखा में कजाखस्तान-तुर्कमेनिस्तान-ईरान मार्ग की भूमिका महत्वपूर्ण है।
इस लिहाज से रूसी उप प्रधानमंत्री खुसनुलिन का प्रस्ताव बिल्कुल शून्य से शुरू होने वाली परियोजना नहीं, बल्कि मौजूदा कनेक्टिविटी ढांचे को और आगे बढ़ाने की सोच है। लक्ष्य यह हो सकता है कि आने वाले समय में रूस और भारत के बीच माल ढुलाई को ज्यादा तेज, भरोसेमंद और बहुविकल्पीय बनाया जाए।
हालांकि इस खबर ने यात्रियों और रेलवे प्रेमियों की कल्पना को जरूर हवा दी है, लेकिन फिलहाल इसे मॉस्को से दिल्ली या मुंबई तक चलने वाली सीधी यात्री ट्रेन समझना जल्दबाजी होगी। अभी तक रूस या भारत की ओर से इस तरह की यात्री सेवा या पर्यटन केंद्रित ट्रेन की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। रूसी उप प्रधानमंत्री के प्रस्ताव का मूल उद्देश्य फ्रेट, लॉजिस्टिक्स और रणनीतिक कनेक्टिविटी है।
वैसे भी यात्री सेवा शुरू करने में कई व्यावहारिक अड़चनें होंगी जैसे कई देशों के वीजा, अलग-अलग रेल गेज, सीमा और सुरक्षा जांच, विभिन्न देशों के रेलवे के बीच समय-सारिणी का तालमेल तथा यात्री सुविधाओं का अभाव। लेकिन भविष्य की संभावना को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता। यदि कॉरिडोर स्थिर, सुरक्षित और आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनता है तो बाद में यात्री रेल सेवा की संभावना तलाशना संभव होगा। ऐसी ट्रेन यूरेशिया के विशाल भूभाग, मध्य एशिया और ऐतिहासिक सिल्क रूट के शहरों को जोड़ने वाली असाधारण यात्रा बन सकती है।
वैसे रूस के इस प्रस्ताव का सबसे बड़ा फायदा भारत को कनेक्टिविटी की रणनीतिक विविधता के रूप में मिल सकता है। भारत की विदेश और आर्थिक नीति लंबे समय से यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रही है कि उसकी व्यापारिक आपूर्ति किसी एक मार्ग या एक देश पर निर्भर न रहे। इसलिए रूस से भारत तक मजबूत स्थलीय नेटवर्क बनने पर भारतीय कारोबारियों को रूसी बाजार तक पहुंच का एक वैकल्पिक रास्ता मिलेगा। इससे मशीनरी, ऊर्जा संसाधन, उर्वरक, धातु, कृषि उत्पाद और अन्य वस्तुओं की आवाजाही अधिक लचीली हो सकती है।
दूसरा बड़ा लाभ समय और लागत का हो सकता है। INSTC का मूल उद्देश्य भी पारंपरिक समुद्री मार्गों की तुलना में माल परिवहन को तेज और अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना है। पूर्ण रूप से विकसित नेटवर्क भारत-रूस व्यापार को नई गति दे सकता है।
एक और सबसे महत्वपूर्ण लाभ ऊर्जा सुरक्षा है। होर्मुज जैसी किसी एक संवेदनशील समुद्री पट्टी पर निर्भरता कम होने से भारत वैश्विक संकटों के दौरान अपनी आपूर्ति श्रृंखला को ज्यादा प्रभावी ढंग से संभाल सकता है।
हालांकि प्रस्तावित मार्ग में पाकिस्तान का नाम आना इसे रणनीतिक रूप से बेहद दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण बनाता है। रूस ने संभावित विकल्पों में तुर्कमेनिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान का उल्लेख किया है। लेकिन भारत-पाकिस्तान संबंधों की मौजूदा जटिलताओं को देखते हुए इस रास्ते को तत्काल व्यवहार्य मानना कठिन होगा। यही कारण है कि भारत के लिए ईरान और मध्य एशिया के रास्ते विकसित होने वाले वैकल्पिक नेटवर्क अधिक व्यावहारिक महत्व रखते हैं।
इस परियोजना का एक व्यापक भू-राजनीतिक प्रभाव चीन पर भी पड़ सकता है। चीन ने वर्षों से Belt and Road Initiative के जरिए यूरेशिया में अपनी परिवहन और आर्थिक पहुंच बढ़ाई है। इसके मुकाबले भारत-रूस समर्थित INSTC और उससे जुड़े नए रेल नेटवर्क यूरेशिया में एक वैकल्पिक आर्थिक गलियारा मजबूत कर सकते हैं। भारत को इससे यह अवसर मिलेगा कि वह चीन केंद्रित कनेक्टिविटी मॉडल के समानांतर अपना प्रभाव क्षेत्र विकसित करे। मध्य एशिया, ईरान और रूस के साथ भारत के आर्थिक संबंधों को भी इससे मजबूती मिल सकती है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह प्रस्ताव भारत और रूस के रिश्तों को केवल रक्षा और ऊर्जा सहयोग तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उन्हें कनेक्टिविटी और व्यापार की नई धुरी पर ले जाता है। रूस के लिए भारत हिंद महासागर तक पहुंच का महत्वपूर्ण द्वार है, जबकि भारत के लिए रूस यूरेशिया के विशाल बाजार तक पहुंच का प्रमुख साझेदार है। इसलिए दोनों देशों के हित इस परियोजना में स्वाभाविक रूप से एक-दूसरे से जुड़ते हैं।
देखा जाये तो बदलती दुनिया में समुद्री रास्तों पर जोखिम बढ़ रहे हैं और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं लगातार नए झटकों का सामना कर रही हैं। ऐसे में रूस का मॉस्को से हिंद महासागर तक रेल संपर्क का विचार भले ही अभी शुरुआती चरण में हो, लेकिन इसकी रणनीतिक दिशा बेहद स्पष्ट है। यानि व्यापार के लिए सिर्फ एक रास्ते पर निर्भर मत रहिए, विकल्पों का ऐसा नेटवर्क तैयार कीजिए जिसे संकट भी आसानी से बाधित न कर सके।
बहरहाल, भारत के लिए यह सिर्फ रूस तक पहुंचने वाली रेल लाइन नहीं होगी। यह यूरेशिया से हिंद महासागर तक भारत की रणनीतिक पहुंच, ऊर्जा सुरक्षा, व्यापारिक स्वायत्तता और वैश्विक कनेक्टिविटी को मजबूत करने वाला संभावित नया गलियारा बन सकती है। और अगर भारत-रूस की पुरानी मित्रता इस परियोजना को राजनीतिक इच्छाशक्ति और आर्थिक निवेश का आधार देती है, तो आने वाले वर्षों में यह कॉरिडोर एशिया की बदलती भू-आर्थिक तस्वीर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।
-नीरज कुमार दुबे