राजनीति की सखी मॉडलिंग (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | May 26, 2021

उनसे मिलने जाना ही पड़ा क्यूंकि और कोई चारा खाने के लिए नहीं रह गया था। राजनीति बांचने वालों का चारा सामाजिक पशुओं को एक न एक दिन खाना पड़ता है। जनाब अभी अभी अपने चुनाव क्षेत्र से लौटे थे। आम लोगों को लकड़ी के बेंच या प्लास्टिक की कुर्सी पर ही बिठाया जाता है। आजकल तो चाय भी डिस्पोजल में निबटा दी जाती है। हमारे साथ उनके ख़ास भी थे लेकिन नए सख्त दरबान ने उन्हें हमारे जैसा हल्का बंदा ही समझा। साहब अभी ठीक से नहा रहे थे इसलिए समय लगना ही था। नहाने के बाद ही उन्हें सूचित किया जाना था। स्वागत चाय के बाद दाल भात का समय होने लगा था। खैर, साहब को सूचित किया गया कि दो आम आदमी बाहर बैठे हैं आपके दर्शन करना चाहते हैं।

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मॉडलिंग और राजनीति में कई चीज़ें कॉमन देखी जा सकती है तभी दोनों सखियां जैसी हैं। वहां कॅरियर दुनिया, देश, प्रांत जिला शहर से मोहल्ले तक चलता है। अलग-अलग मंच व मापदंडों पर परखा जाता है तब कहीं बंदा आगे खिसकता है। इसमें बुरा मानने वाली बात नहीं है, राजनीति की तरह वहां भी कहीं थोडा कहीं ज़्यादा नंगा होना पड़ता है। वह अलग बात है कि वहां शालीनता व सलीका साथ होता है, हां राजनीति के हमाम में नंगई ज़्यादा है। अपनी छिपाई जाती है दूसरे की ढूंढ ढूंढ कर सबको दिखाई जाती है। विश्वास, आत्मविश्वास, विश्वासघात, चलने, चाल बदलने का तरीका, बात करने व बात फेंकने का अंदाज़ मॉडलिंग जैसा ही होता है।  

दोनों व्यवसायों में चुनाव जीतने के बाद ध्यानपूर्वक यह बयान दिया जाता है कि देश और समाज के लिए क्या क्या करेंगे। क्या नहीं करना है यह भी लगे हाथ दिमाग में सुनिश्चित कर लिया जाता है। फिटनेस का फंडा दोनों जगह है वहां उत्तम स्वास्थ्य ज़रूरी है तो राजनीति में सफल होते ही फिटनेस खुद शरीर में प्रवेश कर जाती है। सम्प्रेषण क्षमता, दूसरों से जुड़ाव, परिधान व व्यक्तित्व ज़रूरी है मगर राजनीति में जाति, धर्म, धन और ताक़त के पीछे सब छिप जाता है। राजनीति तकनीक, डिजायनर नारे, विज्ञापन और भाषण प्रयोग करती है जिन्हें देश के लिए मॉडल बना दिया जाता है। विशेषज्ञ यह काम करके नुमांया हो जाते हैं और राजनीतिज्ञों की जीत के मॉडल हो जाते हैं। 

- संतोष उत्सुक

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