Sambhaji Birth Anniversary: संभाजी ने औरंगजेब को घुटने टेकने पर कर दिया था मजबूर, ऐसे संभाला मराठा साम्राज्य

By अनन्या मिश्रा | May 14, 2024

देश के इतिहास में कई ऐसे मोड़ आए, जिन्होंने इसकी दशा और दिशा दोनों बदल दी। आज ही के दिन यानी की 14 मई को संभाजी भोसले का जन्म हुआ था। संभाजी भोसले छत्रपति शिवाजी से सबसे बड़े पुत्र थे औऱ उनकी गिनती महान योद्धाओं में होती है। बता दें कि शिवाजी महाराज के निधन के बाद वह मराठा साम्राज्य बने थे। आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर संभाजी महाराज के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...

शिवाजी महाराज के सबसे बड़े पुत्र संभाजी भोसले का जन्म 14 मई 1657 को हुआ था। वह शिवाजी महाराज और उनकी पत्नी साईबाई की संतान थे। महज दो साल की उम्र में साईबाई का निधन हो गया था। जिसके बाद शिवाजी का मां जीजाबाई ने उनका पालन-पोषण किया था। जीजाबाई ने बचपन से ही उनको उन मूल्यों और संस्कारों का पाठ पढ़ाया जिससे कि उन्हें आत्मिक शक्ति मिली और उन मूल्यों को शिवाजी महाराज ने हमेशा हवा दी।

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ऐसे मिला मराठा साम्राज्य

बता दें कि छत्रपति शिवाजी महाराज के निधन के बाद संभाजी के खिलाफ कई षड़यंत्र रचे गए। लेकिन संभाजी सारे षड़यंत्रों से लड़ते हुए आखिरकार मराठा साम्राज्य पर काबिज होने में सफल रहते हैं। वहीं उनका कार्यकाल काफी चुनौतियों से भरा रहा। शिवाजी की मृत्यु के बाद मुगल बादशाह औरंगजेब को लगता है कि उसे मराठाओं को हराने का इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा। इस वजह से औरंगजेब हजारों सैनिकों के साथ दक्षिण की तरफ कूच करता है। लेकिन आठ साल तक लगातार प्रयास के बाद भी संभाजी के नेतृत्व में वह मराठों के गौरव रायगढ़ सहित उनके सैकड़ों किलों का कुछ नहीं बिगाड़ पाता है। औरंगजेब मराठों के आगे घुटने टेकने पर मजबूर हो जाता है। 

संभाजी के शासनकाल में मराठा और मुगल कट्टर दुश्मन थे। संभाजी ने मुगलों के खिलाफ पहली बड़ी लड़ाई मध्य प्रदेश के बुरहानपुर में लड़ी थी। यहां से दक्कन में औरंगजेब अपने शासन के विस्तार की योजना बना रहा था। जब संभाजी को यह पता चला तो उन्होंने पहले ही हमला कर इस पर कब्जा कर लिया। जोकि मुगलों के लिए बड़ा झटका था। औरंगजेब का मानना था कि यदि उसका संभाजी जैसा एक भी बेटा होता, तो वह आराम से कुरआन और तसबीह लेकर मक्का-मदीना में बस जाता। लेकिन उसके चारों शहजादे किसी काम के नहीं हैं।

निधन

जब संभाजी राजा बने तो उन्होंने अपने पिता के सहयोगियों को पद से बर्खास्त कर दिया। उन्होंने कवि कलश को अपना नया सलाहकार नियुक्त किया। जोकि मथुरा के रहने वाले थे। साथ ही कवि कलश को मराठी भाषा का ज्ञान नहीं था। वहीं शिवाजी के सहयोगियों ने इसको अपना अपमान समझा और संभाजी के खिलाफ आंतरिक विद्रोह का बिगुल फूंक दिया। इसी विद्रोह के कारण संभाजी मुगलों से हार गए। इस हार के बाद उनको बंदी बना लिया गया औऱ उनको गंभीर शारीरिक व मानसिक यातनाएं दी गईं। लेकिन संभाजी ने मरते दम तक हार नहीं मानी। वहीं 11 मार्च 1689 को संभाजी की मृत्यु हो गई।

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