जैन समाज के लिए सिद्ध क्षेत्र है सम्मेद शिखरजी, जानिए क्या हैं इससे जुड़ी मान्यताएं

By अनन्या मिश्रा | Feb 22, 2023

सम्मेद शिखरजी जैनियों का पवित्र तीर्थ माना जाता है। जैन समुदाय से जुड़े लोग सम्मेद शिखरजी के कण-कण को बेहद पवित्र मानते हैं। बता दें कि झारखंड के गिरिडीह जिले के मधुबन में सम्मेद शिखरजी स्थित है। वहीं सम्मेद शिखरजी को पार्श्वनाथ पर्वत के नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि 24 में से 20 तीर्थंकरों और कई संत-मुनियों और का यहां पर मोक्ष यानि कि महापरिनिर्वाण मिला है। यह स्थान लोगों की आस्था से जुड़ा हुआ है। वहीं हिंदू भी इसे आस्था का बड़ा केंद्र मानते हैं। बता दें कि जैन समुदाय के लोग सम्मेद शिखरजी के दर्शन कर वहां के 27 किमी में फैले मंदिरों में पूजा-अर्चना करते हैं। यहां पर पूजा-अर्चना के बाद ही लोग कुछ खाते पीते हैं। वहीं जैन धर्म के सम्मेद शिखरजी क्षेत्र में जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ ने कठोर तप और ध्यान किया था।

1- सम्मेद शिखरजी को जैन धर्म में अमरतीर्थ कहा जाता है। जैन धर्म की मान्यताओं के मुताबिक सृष्टि रचना के दौरान सम्मेद शिखरजी और अयोध्या दो तीर्थ ही अस्तित्व में थे। कहा जाता है कि अयोध्या और सम्मेद शिखरजी का अस्तित्व सृष्टि के बराबर है। इसलिए इन दोनों स्थानों को अमर तीर्थ की संज्ञा दी गई है।

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2- जैनधर्म के अनेक तीर्थंकरों ने यहां पर तपस्या कर मोक्ष प्राप्त किया है। इसलिए इस स्थान का जैनधर्म में विशेष स्थान है। इसी आस्था के कारण हर वर्ष लाखों जैन श्रद्धालु सम्मेद शिखर तीर्थ यात्रा में यहां आते हैं। वहीं कई तीर्थ यात्री अपनी श्रद्धा के कारण शिखर तक नंगे पैर और उपवास रखकर यहां पहुंचते हैं।

3- जैनधर्म की मान्यता के अनुसार, जो व्यक्ति अपने जीवन में सच्चे मन से एक बार सम्मेद शिखर तीर्थ यात्रा कर लेता है। उसे मृत्यु के बाद मोक्ष की मिलता है। इसके अलावा जो व्यक्ति निष्ठा भाव से भक्ति कर तीर्थंकरों की शिक्षा, उपदेशों, शिक्षाओं का शुद्ध आचरण से पालन करता है, उसे भी मोक्ष प्राप्त होता है। 

4- सम्मेद शिखर तीर्थ यात्रा करने से व्यक्ति जन्म-कर्म के बंधनों से 49 जन्मों तक मुक्त हो जाता है। ऐसा व्यक्ति पशु योनि व नरक में नहीं जाता है। सम्मेद शिखर तीर्थ में पवित्रता और सात्विकता का पूरी तरह से पालन किया जाता है। इसी कारण यहां जंगली जानवर शेर, बाघ आदि पशु हिंसक नहीं होते हैं। जैनधर्म का पालन करने वाले व्यक्ति यहां बिना भय के आते हैं।

5- जैनधर्म की मान्यता है कि जिस तरह से गंगा नदी में स्नान करने से व्यक्ति को सारे पापों से मुक्ति मिल जाती है। ठीक उसी तरह से सम्मेद शिखर की वंदना करने से सभी पापों का जड़ से नाश हो जाता है। कहा जाता है कि यहां के कण-कण में पवित्रता है। यहां स्थित मंदिरों में पूजा-पाठ करने के बाद ही यहां पहुंचने वाले लोग कुछ भी खाते पीते हैं।

6- आदिवासी पारसनाथ पहाड़ को मरांग बुरु कहकर पुकारते हैं। आदिवासी भी इसकी पूजा करते हैं। बता दें कि जैन धर्म के पहले तीर्थकर भगवान ऋषभदेव ने कैलाश पर्वत पर मोक्ष प्राप्त किया था। वहीं 12वें तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य ने चंपापुरी में, 22वें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ ने गिरनार पर्वत, 24 वें तीर्थंकर महावीर स्वामी ने पावापुरी में मोक्षप्राप्त किया था।

आपको बता दें कि यह झारखंड का सबसे ऊंचा पहाड़ है। इस पहाड़ की ऊंचाई 9.6 किलोमीटर है। यहां पर जैन श्रद्धालु पैदल या फिर डोली से जाते हैं। यहां पर अलग-अलग भगवानों के 23 मंदिर स्थित हैं। जिनमें से 20 मंदिर तीर्थकर के बने हुए हैं। इस स्थान पर हर साल लगभग 2 लाख से अधिक श्रद्धालु पहुंचते हैं।

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