मूरख जो खोजन मैं चला... (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त | Apr 01, 2021

एक दिन मुझे लगा कि मेरे चारों ओर मूर्खों की संख्या अधिक हो गयी है। मुझे इन मूर्खों का पता लगाने की इच्छा हुई। इसके लिए मैंने अपने एक घनिष्ठ मित्र की सहायता ली। चूँकि मेरा मित्र मुझे और मेरे ईर्द-गिर्द रहने वालों को अच्छी तरह से जानता था, सो यह जिम्मेदारी उसे सौंप दी। मैंने उससे कहा कि तुम जल्दी से मूर्खों की सूची बनाओ जिससे मैं वैसे लोगों से दूर रह सकूँ। उनके कारण आए दिन मेरा समय और पैसा दोनों बर्बाद हो रहा है।

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काफी हाथ-पैर मारने के बाद मित्र ने एक सूची बनायी। सूची देखकर मेरे तोते उड़ गए। मेरे चारों खाने चित्त थे। उस सूची में एक मात्र मेरा नाम लिखा था। यह देखकर मैं अपना आपा खो बैठा। मैंने मित्र से पूछा कि तुम्हें कुछ अक्ल-वक्ल भी है या नहीं? तुम्हें मेरा नाम लिखते हुए शर्म नहीं आयी? तुमने ऐसे-कैसे मेरा नाम लिख दिया? उसने मेरा गुस्सा शांत करने की लाख कोशिश की। मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर था। आव देखा न ताव। बाल नोंचते हुए कहा कि मैं मित्रता बहुत सोच-समझकर करता हूँ। हाँ यह अलग बात है कि इनमें एकाध लोग मूर्ख हो सकते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि तुम मेरा ही नाम लिख दो। मैं तुमसे शर्त लगाता हूँ कि यदि तुम मुझे मूर्ख साबित कर दोगे तो मैं तुम्हारा हर कहा मानूँगा। 


इस पर मित्र ने कहा कि सबसे पहले तो आपके दिमाग में यह बात आयी ही क्यों कि कौन बुद्धिमान है और कौन मूर्ख? बुद्धिमान लोगों पर संदेह करना या उनकी बुद्धिमता पर प्रश्नचिह्न लगाना मूर्खों का लक्षण नहीं तो और क्या है? इसीलिए मेरी नजर में आपसे बढ़कर कोई दूसरा मूर्ख हो ही नहीं सकता। 


मैं अपना आपा खो चुका था। मित्र से कहा कि तुम्हें मैंने मेरे मूर्ख मित्रों की सूची बनाने की जिम्मेदारी क्या सौंप दी, तुम स्वयं को बड़ा बुद्धिमान समझने लगे। तुमने मेरे सभी मित्रों को मूर्ख बताने की बहुत बड़ी भूल की है। मैं तुम्हें यह साबित कर दिखाऊँगा कि मूर्ख मैं नहीं तुम हो। इस पर मित्र ने कहा कि यदि ऐसा होता भी है तो आप ही मूर्ख साबित होंगे। सबसे पहली बात तो यह कि जो व्यक्ति स्वयं को बुद्धिमान मानता हो और वही मूर्ख मित्रों की खोज में लगा हो तो वह मूर्ख नहीं तो और क्या होगा? इसीलिए आपसे बढ़कर मूर्ख और कौन हो सकता है? सच तो यह है कि मूर्ख-वूर्ख नाम का कोई प्राणी होता ही नहीं है। जो हमारे काम आ जाए वह समझदार, बुद्धिमान लगने लगता है। यदि वह किसी काम न आए तो उसे हम बेकार और बात न मानने पर बेवकूफ कहने लगते हैं। 

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मुझे उस दिन पहली बार लगा कि मूर्खता तो एक अवस्था है। महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन के मुताबिक समझदारी और मूर्खता में मोटा फर्क यह है कि समझदारी की एक सीमा होती है, जबकि मूर्खता की कोई सीमा नहीं होती। मूर्खता की खोज किसी बुराई की खोज से कम नहीं है। वास्तव में मेरे मित्र ने मूर्खों की सूची के नाम पर एकमात्र मेरा नाम लिखकर उसने कबीर के बदले हुए शब्दों में सिद्ध कर दिया कि मूरख जो खोजन मैं चला, मूरख न मिलिया कोय/ जो मूरख खोजा आपने, मुझसे मूरख न कोय।


- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त

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