गांधीजी का चश्मा (व्यंग्य)

By विजय कुमार | Sep 08, 2020

कुछ सुना आपने ? गांधीजी का सौ साल पुराना चश्मा ढाई करोड़ रुपये में बिक गया। ब्रिस्टल की एक नीलामी एजेंसी ने उसे बेचा। एजेंसी ने बताया कि चश्मा जिसके पास था, वह उसे बिक्री वाले डिब्बे में डाल गया था। इससे उसकी किस्मत ऐसी खुली कि छप्पर फटने के साथ पूरा मकान ही ढह गया।

मैं भी पिछले 20-22 साल से चश्मा लगा रहा हूं। साल में दो बार जांच भी कराता हूं। अपने काम के सिलसिले में मैं कई जगह रहा। वहां मेरा पाला अच्छे और कम अच्छे, दोनों तरह के डॉक्टरों से पड़ा है। अच्छे डॉक्टर मरीज का अधिक ध्यान रखते हैं, जबकि कम अच्छे डॉक्टरों की निगाह मरीज की आंख के साथ उनकी जेब पर भी रहती है।

लखनऊ में डॉ. शर्मा साल में दो बार बुला कर आंख में डालने की एक दवा देकर छुट्टी कर देते थे। जबकि दिल्ली में डॉ. वर्मा साल में चार बार बुलाते थे। हर बार आंख में डालने की दो दवा लिखते थे। सुबह-शाम खाने की कोई महंगी गोली भी देते थे, जो उनके पड़ोस के मेडिकल स्टोर में ही मिलती थी। उनका चश्मा न जाने कैसा था कि वे मरीज के आते ही उसकी जेब की मोटाई भांप लेते थे। उसी हिसाब से उनका इलाज चलता था। धन्य हैं डॉ. वर्मा और उनका जादुई चश्मा।

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यहां मुझे अपने बाबाजी के चश्मे की याद आती है। उन्हें स्वर्गवासी हुए लम्बा समय हो गया। वे अपने चश्मे को 40 साल पुराना बताते थे। यद्यपि कई बार उसका फ्रेम बदला और कई बार शीशे; पर चश्मा 40 साल पुराना ही रहा। ये बड़ा दुर्भाग्य है कि निधन के बाद उनका सामान फेंक दिया गया। वरना आज वह चश्मा कम से कम 80 साल का तो होता ही। यदि गांधीजी का चश्मा ढाई करोड़ में बिक सकता है, तो बाबाजी के प्राचीन चश्मे के भी ढाई हजार रु. तो मिल ही जाते; पर हम नासमझ थे, जो उसे फेंक दिया।

पर अब मैं सावधान हो गया हूं। मैंने अपनी वसीयत में लिख दिया है कि मेरे जाने के बाद मेरा चश्मा बिल्कुल न फेंकें। कई बार इन्सान की कीमत उसके जाने के बाद ही पता लगती है। गांधीजी खुद इसके प्रमाण हैं। ऐसे ही मेरे आज के साहित्य पर भले ही लोग ध्यान न दें; पर मुझे विश्वास है कि मेरे जाने के बाद उसे नोबेल या बुकर पुरस्कार के योग्य अवश्य समझा जाएगा। तब लोग मेरा सामान अपने घर में रखना गर्व की बात समझेंगे। हो सकता है तब मेरे चश्मे के दिन भी बहुर जाएं।

जो साहित्यप्रेमी मेरा चश्मा खरीदने के इच्छुक हों, वे नीलामी में अभी से नाम लिखा दें। फिर न कहना कि हमें खबर नहीं मिली। क्योंकि कोरोना काल में कौन कब निकल ले, पता नहीं।

-विजय कुमार

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