पिता का अनशन तुड़वाने दिल्ली से खुद इंदिरा चलकर आईं, क्या है सोनम वांगचुक का असली सच?

By अभिनय आकाश | Jul 20, 2026

यह कहानी उस अपराजेय डोगरा सेनापति की है, जिसने उत्तर के दुर्जय शिखरों और बर्फीली वादियों को चीरकर भारत की सीमाओं का ऐसा विस्तार किया जिसकी मिसाल इतिहास में विरली ही मिलती है। कहलूर रियासत के एक साधारण से गाँव में जन्मे और ज़मीन के पारिवारिक विवाद के कारण अपना घर छोड़ने वाले जोरावर सिंह कहलुरिया ने हरिद्वार के मैदानों से लेकर जम्मू के दुर्गम क्षेत्रों तक न सिर्फ युद्ध की कलाएँ सीखीं, बल्कि महाराजा रणजीत सिंह, राजा संसार चंद और डोगरा राजा गुलाब सिंह जैसे महान शासकों के भरोसे को जीतकर अपने पराक्रम का लोहा मनवाया। भीमगढ़ किले की कमान से लेकर किश्तवाड़ की गवर्नरशिप तक का सफर तय करने वाले इस वीर की तलवार ने साल 1834 में जब लद्दाख के बर्फीले रास्तों का रुख किया, तो उसने तिब्बत से अफगानिस्तान तक फैले व्यापारिक मार्गों की तकदीर और डोगरा साम्राज्य की सीमाओं का इतिहास हमेशा-हमेशा के लिए बदलकर रख दिया। लद्दाख आधिकारिक तौर पर हमेशा के लिए जम्मू की डोगरा रियासत का हिस्सा बन गया और फिर जम्मू कश्मीर के साथ ही सन 47 में लद्दाख भारत का हिस्सा बना। कट टू आजादी के 72 साल बाद तारीख 5 अगस्त 2019 जगह देश की संसद जहां देश भर से चुनकर आए जनता के प्रतिनिधि बैठे हैं लेकिन एक सांसद महोदय खड़े हैं। देश के गृह मंत्री अमित शाह सफेद कुर्ता और गाढ़े भूरे रंग की सदरी। हाथ में कागजों का पुलिंदा है। जिनमें अलग-अलग पन्नों पर स्टिकी नोट्स चसपा थे। इन कागजों को हाथ में लिए अमित शाह जम्मू कश्मीर से जुड़े दो बिल और दो प्रस्ताव पेश करते हैं। यह बिल और प्रस्ताव पास होते ही जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हमेशा के लिए खत्म हो जाता है। साथ ही जम्मू कश्मीर को दो भागों में बांट दिया जाता है। दोनों को ही केंद्र शासित प्रदेश बना दिया जाता है। पहला जम्मू कश्मीर विधानसभा के साथ, और दूसरा लद्दाख बगैर विधानसभा के।  जो लद्दाख सेनाओं की लड़ाई के बाद जम्मू कश्मीर का हिस्सा बनाया गया था, उसे एक बार फिर कश्मीर से अलग कर दिया गया। इस फैसले को लद्दाख में खुशखबरी की तरह सेलिब्रेट किया गया। सेलिब्रेशन का पहला बयान आया लद्दाख के एक इंजीनियर, साइंटिस्ट, शिक्षाविद और सोशल एक्टिविस्ट की तरफ से जिन्हें हिंदुस्तान ने उनके असली नाम से कम और आमिर खान की फिल्म से मिले नाम से ज्यादा जाना। थ्री इडियट्स वाले फुनसुक बांगरु। असली नाम सोनम वांगचुक। वांगचुक ने 5 अगस्त 2019 की रात सोशल मीडिया पर लिखा, प्रधानमंत्री जी आपका धन्यवाद। लद्दाख नरेंद्र मोदी और पीएमओ का धन्यवाद करता है और उन्होंने लद्दाख के लंबे समय से चले आ रहे सपने को पूरा किया। ठीक 30 साल पहले अगस्त 1989 में लद्दाख के नेताओं ने केंद्र शासित प्रदेश यानी यूटी का दर्जा पाने के लिए आंदोलन शुरू किया था। उन सभी का धन्यवाद जिन्होंने इस लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण में मदद की। लेकिन बहुत जल्द सोनम वांगचुक का शुक्राना अंदाज बदल जाता है और वह कहने लगते हैं कि इससे तो बेहतर था कि हम जम्मू कश्मीर का ही हिस्सा रहते। अब सोनम वांगचुक एक बार फिर से चर्चा में हैं। दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन पर बैठे सोशल एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक अब अस्पताल में भर्ती हैं। पुलिस दिल्ली हाई कोर्ट का निर्देश का हवाला देते हुए 18 जुलाई को उन्हें जबरन सफ़दरजंग अस्पताल ले गई थी। अस्पताल में उन्होंने ड्रिप या मुंह से कोई भी तरल पदार्थ लेने से इनकार कर दिया है और कहा है कि उनका अनशन जारी रहेगा। लेकिन उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर पोस्ट कर अपना अनशन ख़त्म करने के लिए तीन शर्तें रखीं। सोनम वांगचुक ने जो शर्तें रखी हैं उनमें कहा गया है कि सरकार प्रश्नपत्र लीक होने जैसी घटनाओं समेत शिक्षा व्यवस्था की 'हाल की नाकामियों' का जिम्मा लेती है या फिर राजनीतिक दल संसद में इस मुद्दे को उठाने का भरोसा देते हैं या फिर अलग-अलग दलों के सांसद और नेता अस्पताल आकर उनसे मिलकर आश्वासन देते हैं तो वो अपना अनशन ख़त्म कर देंगे। ऐसे में आइए जानते हैं कि सोनम वांगचुक आखिर है कौन? टाइम मैगजीन ने सोनम वांगचुक को लेकर क्या कहा था? वांगचुक को किस काम के लिए रमन मैक्से अवार्ड मिला था? सोनम वांगचुक को एनएसए के तहत क्यों गिरफ्तार किया गया था?

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42 साल पहले इंदिरा गांधी ने खुद तुड़वाया था अनशन!

सोनम वांगचुक आज देश भर में चर्चा का नाम है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस परिवार से सोनम वांगचुक आते हैं उस परिवार का आंदोलन और लद्दाख की राजनीति से रिश्ता आज का नहीं बल्कि 40 साल से भी ज्यादा पुराना है। आज जिस तरह सोनम वांगचुक भूख हड़ताल पर बैठे हैं, ठीक उसी तरह 42 साल पहले उनके पिता भी अनशन पर बैठे थे। फर्क सिर्फ इतना था कि उस वक्त देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी खुद दिल्ली से लेह पहुंच गई थी और अपने हाथों से उनका अनशन तुड़वाया था। सोनम वांगचुक के पिता का नाम था सोनम वांग्याल। सोनम वांग्याल सिर्फ एक राजनेता नहीं थे बल्कि लद्दाख की पहचान और अधिकारों के लिए लड़ने वाले प्रमुख नेताओं में गिने जाते थे। 1975 में वे जम्मू कश्मीर विधानसभा के सदस्य बने और बाद में राज्य सरकार में मंत्री भी रहे। यही वह दौर था जब लद्दाख के लोगों को लगता था कि उनकी आवाज श्रीनगर की राजनीति में दब जाती है। लद्दाख के लोगों की सबसे बड़ी मांग थी कि उन्हें अनुसूचित जाति यानी कि शेड्यूल ट्राइब का दर्जा मिले ताकि शिक्षा, नौकरी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में उन्हें संवैधानिक सुरक्षा मिल सके। यही मांग आगे चलकर एक बड़े जन आंदोलन में बदल गई। साल था 1984। सोनम वांग्याल ने लद्दाख के लोगों के अधिकारों की मांग को लेकर भूख हड़ताल शुरू कर दी। उनकी मांग साफ थी कि लद्दाख को अनुसूचित जनजाति यानी एसटी का दर्जा दिया जाए। अनशन लंबा खिसने लगा। जैसे-जैसे उनकी तबीयत बिगड़ती गई, मामला दिल्ली तक पहुंच गया। उस समय देश की प्रधानमंत्री थी इंदिरा गांधी। रिपोर्टों के मुताबिक मामला इतना गंभीर हो गया कि इंदिरा गांधी खुद लेह पहुंची। सोनम बांगियाल से मुलाकात की और उन्हें भरोसा दिलाया कि उनकी मांग पर गंभीरता से विचार किया जाएगा। इसके बाद उन्होंने अपने हाथों से जूस पिलाकर उनका अनशन तुड़वाया।  

सिसमोल की स्थापना, 'ऑपरेशन न्यू होप' और सामाजिक पहल

भारत के उत्तरी कोने पर बसा लद्दाख अब एक केंद्र शासित प्रदेश यानी यूनियन टेरिटरी है। लेकिन साल 2019 से पहले तक वह जम्मू कश्मीर राज्य का हिस्सा हुआ करता था। इसी लद्दाख के लेह जिले के अलची के पास साल 1966 में सोनम वांगचुक का जन्म हुआ। वांगचुक एक इंटरव्यू में बताते हुए कहते हैं कि उनका गांव बहुत छोटा था। केवल पांच ही घर थे गांव में। वहां कोई भी स्कूल नहीं था। 9 साल तक वह किसी भी स्कूल में नहीं गए। 9 साल की उम्र में वांगचुक का दाखिला श्रीनगर के एक स्कूल में करवाया गया। इसके बाद उन्होंने दिल्ली के एक केंद्रीय विद्यालय से पढ़ाई की। 

12वीं करने के बाद वांगचुक दोबारा से श्रीनगर लौटे। यहां उन्होंने नेशनल इंस्टट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी यानी एनआईटी श्रीनगर से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीटेक किया। जब वांगचुक बीटेक कर रहे थे तो साल 1987 का था। इसी दौरान उनकी दिलचस्पी मशीनों में बढ़ी और वांगचुक ने किताबों की थ्योरी रटने के बजाय स्किल सीखने और सिखाने पर जोर दिया। वांगचुक की इंजीनियरिंग की पढ़ाई जब खत्म हुई तो उन्होंने कहीं नौकरी करने के बजाय साल 1988 में अपने भाई और पांच अन्य दोस्तों के साथ मिलकर सिसमोल यानी स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख नाम का एक स्कूल खोला। उनके इस स्कूल में बेहद प्रैक्टिकल तरीके से एजुकेशन दी जाती थी। बाद के दिनों में वांगचुक ने अपने स्कूल में ऑपरेशन न्यू होप नाम से एक प्रोग्राम शुरू किया। इस प्रोग्राम के तहत लद्दाख के सरकारी स्कूलों में एजुकेशन रिफॉर्म शुरू हुआ। इस रिफॉर्म में लोकलाइज्ड टेक्स्ट बुक्स और टीचर्स की ट्रेनिंग दी जाने लगी। यह सोनम वांगचुक का एजुकेशन को लेकर बेहद सुंदर विज़न था। अब साल आता है 1993 का। जून का महीना था। सोनम वांगचुक ने लद्दाख में एक मैगज़ीन का प्रकाशन शुरू किया। इस मैगज़ीन का नाम था लद्दाख स्मेलोंग। यह बात बड़ी हैरतनुमा लगती है कि अगस्त 2005 तक यह मैगज़ीन लद्दाख की एकमात्र प्रिंट मैगज़ीन थी और इसके संपादक थे सोनम वांगचुक। ऐसा कोई भी साल नहीं है जब वांगचुक ने लद्दाख और उससे जुड़े मुद्दों के लिए कोई सकारात्मक काम नहीं किया हो। साल 2002 में उन्होंने लद्दाख वंटरी नेटवर्क एलवीएन की स्थापना की। दरअसल यह संगठन लद्दाख में काम कर रहे एनजीओ को एक मंच पर लाने के लिए बनाया गया था। खुद वांगचुक साल 2005 तक इस संगठन की एग्जीक्यूटिव कमेटी के सेक्रेटरी रहे। 2004 की बात है। केंद्र में नई यूपीए सरकार आ चुकी थी। मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री थे। उसी साल लद्दाख हिल काउंसिल सरकार का विज़न डॉक्यूमेंट लद्दाख 2025 नाम से तैयार किए जाने के लिए एक कमेटी बनाई गई। इसी कमेटी में वांगचुक को शिक्षा और पर्यटन पर नीति को तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। साल 2005 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस रिपोर्ट को लॉन्च किया। वांगचुक ने नई तकनीकी और नए मेथड से काम करना कभी बंद नहीं किया।

आइस स्तूप' का आविष्कार, हायल यूनिवर्सिटी और मैगसेसे पुरस्कार

 साल 2013 में उन्होंने आइस स्तूप नाम से एक अद्भुत प्रोजेक्ट शुरू किया। दरअसल जब गर्मी का मौसम आता है तो लद्दाख के किसानों को खेती के लिए पानी की कमी का सामना करना पड़ता है। अमूमन पानी की कमी अप्रैल और मई के महीने में ही होती है और उसी समय बुवाई का समय होता है यानी खेती का पीक टाइम। वांगचुक ने इसका तोड़ आइस स्तूप प्रोजेक्ट से निकाला। लद्दाख में ठंड के मौसम में भारी बर्फबारी होती है। वांगचुक ने बर्फबारी के समय ही उस बर्फ को इकट्ठा करके स्तूप बना दिया। यह एक आर्टिफिशियल ग्लेशियर जैसा था और जैसे-जैसे गर्मी का मौसम आता इस स्तूप की बर्फ पिघलकर पानी में तब्दील होती। साल 2014 के आखिर तक वांगचुक ने दो मंजिला कई आई स्तूप का स्ट्रक्चर बनाया जिसमें करीब 1.5 लाख लीटर पानी स्टोर किया जा सकता था। यह इस प्रोजेक्ट की सफलता को दिखाता था। बाद में यह तकनीक बहुत मशहूर हुई और इसे विदेशों में भी पहचान मिली। इसे लद्दाख के अलावा हिमालय और आल्प्स के क्षेत्रों में भी अपनाया गया। साल 2016 में वांगशुक ने हिमालयन इंस्टट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव्स लद्दाख यानी हायल की स्थापना की। यह एक अलग तरह की यूनिवर्सिटी है जिसमें पहाड़ी इलाकों के युवाओं को नए ढंग से पर्यावरण और सांस्कृतिक सहित तमाम एजुकेशन दी जाती है। इस यूनिवर्सिटी की स्थापना के 2 साल बाद साल 2018 में एजुकेशन रिफॉर्म और कम्युनिटी बिल्डिंग के लिए वांगचुक को रमन मैक्ससे अवार्ड से सम्मानित किया गया।

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लद्दाख के पर्यावरण को लेकर समय-समय पर आंदोलन करते रहे

उनके पिता वांगियाल कांग्रेस के नेता रहे हैं। उनके पिता सोनम वांग्याल साल 1975 में जम्मू कश्मीर सरकार में मंत्री थे। वांगचुक भी लद्दाख के पर्यावरण को लेकर समय-समय पर आंदोलन करते रहे। 26 जनवरी 2023 को उन्होंने लद्दाख के जलवायु परिवर्तन से बिगड़ते हालात पर खारदंगला पास के पास जाकर अनशन शुरू किया। हालांकि प्रशासन ने उन्हें पहले ही हाउस अरेस्ट कर लिया था। प्रशासन का दावा था कि दर्रे का तापमान शून्य से -40° तक होता है। इसलिए वहां अनशन करने से वांगचुक की जान को खतरा था। 30 सितंबर 2024 को अपनी मांगों के समर्थन में लद्दाख से दिल्ली तक पैदल मार्च के दौरान सोनम वांगचुक और उनके समर्थकों को दिल्ली पुलिस ने सिंधु बॉर्डर पर हिरासत में ले लिया। बाद में उन्हें 2 अक्टूबर 2024 को रिहा कर दिया गया।

सोनम वांगचुक के अनशन ख़त्म करने की शर्तों को लेकर क्यों उठ रहे हैं सवाल?

सोनम वांगचुक नीट परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के लिए धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग को लेकर ही अनशन पर बैठे थे। वांगचुक की शर्तों में धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की शर्त का न होना लोगों को चौंका रहा है।

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