Gyan Ganga: सीताजी की खोज में लगे वानरों को मुश्किल में फंसे देख हनुमानजी ने की थी बड़ी मदद

By सुखी भारती | Sep 02, 2021

भगवान श्रीराम जी का युग परिवर्तन कार्य वानरों के माध्यम से आगे बढ़ रहा था। वानर अपने लक्ष्य की ओर प्रस्थान कर चुके थे। जैसा कि गोस्वामी जी ने वर्णन किया कि सभी वानर इतने उत्साहित हैं, कि वे अपने शरीर का भान भी भूल गए हैं। उन्हें श्रीसीता जी की खोज के अलावा अन्य कोई भी धुन नहीं है। जहाँ-जहाँ से वानर लांघ रहे हैं, वहाँ-वहाँ पर मानो वे धरा का चप्पा-चप्पा छान दे रहे हैं। उनकी ऐसी लगन व मेहनत देख कर त्रिदेव भी साधु-साधु कह कर नतमस्तक हो रहे हैं। संपूर्ण अभियाण सुंदर ढंग से आगे बढ़ रहा था। लेकिन तभी क्या होता है कि सभी वानरों को अतिअंत ही प्यास सताने लगती है-

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‘लागि तृषा अतिसय अकुलानो।

मिलइ न जल घन गहन भुलाने।।

मन हनुमान कीन्ह अनुमाना।

मरन चहत ससब बिनु जल पाना।।’


श्री हनुमान जी ने देखा कि सभी वानर तो पानी की प्यास से यूं व्याकुल व दुखी प्रतीत हो रहे हैं, मानो वे सब अभी प्राण त्याग देंगे। इस प्यास का सबसे बड़ा कुप्रभाव यह पड़ा कि इस घने वन में सब भूल गए, कि हमने किधर जाना है, और किधर नहीं। मानो वे मार्ग ही भूल गए हों। सज्जनों क्या आपने विचार किया कि गोस्वामी जी यहाँ कितनी रहस्य की बात कह गए। वे कह रहे हैं कि-‘मिलइ न जल घन गहन भुलाने।।’ अर्थात सभी वानर को मार्ग ही भूल गया। अब कोई गोस्वामी जी से पूछ ले कि वनों में तो वैसे भी कोई मार्ग नहीं होता। फिर वानर कौन-से मार्ग पर अग्रसर थे, जोकि वे भूल गए थे। वास्तव में वे साधक वानरों के मन की अवस्था के आधार पर कुछ कहना चाह रहे थे। क्योंकि वानर अपने जीवन की सर्वोत्तम यात्र पर थे। यह यात्र थी, माया से भक्ति पथ की यात्र। पहली बात तो यह है कि इस पर वही जीव कदम रखते हैं, जो अतिअंत भाग्यशाली होते हैं। और जिनके मन में संसार के समस्त मोह व राग को त्यागने की तीव्र इच्छा व ललक होती है। निःसंदेह इस आध्यात्मिक यात्रा पर निकलने वाले सभी वानर ऐसे हृदय के धनी थे। इस यात्रा पर निकलने वाले जितने भी साधक होते हैं, आरम्भ के उनके संकल्प पर दृष्टिपात करेंगे तो पायेंगे, कि हिमालय भी एक बार के लिए, यह सोचकर ठिठक जाए कि ऐसी अड़िगता तो मुझमें भी नहीं है, जैसी कि इस साधक में विद्यमान है। जैसा कि उन वानरों के साथ घटित हुआ, जब यात्रा आरम्भ क्या हुई, सभी वानर इतने सजग व कर्मठ प्रतीत हो रहे हैं, कि अपने तन की सुधि तक भूले बैठे हैं- ‘राम काज लयलीन मन बिसरा तन कर छोह।।’ सामने अवगुण रूपी छोटा-सा भी राक्षस आता है, तो वे एक-एक चपट मार कर ही उसे मार डालते हैं। और कोई ऋर्षि अथवा संत से भेंट हो जाए, तो वे अपने मन की जिज्ञासा शांत करने हेतु उन्हें घेर कर बैठ जाते हैं। लेकिन उन साधक वानरों की यह अवस्था बहुत दिनों तक विद्यमान नहीं रह पाती है। शीघ्र ही उन्हें प्यास व्याकुल करने लगती है। प्यास किसे नहीं लगती, सबको लगती है। यह तो इस पंचभूतक शरीर का धर्म है। पानी पीओ और प्यास बुझाकर अपने कार्य पर संलग्न हो जाओ। इसमें क्या दिक्कत या परेशानी है। परेशानी है, लेकिन कब? जब चारों दिशाओं में दूर-दूर तक पानी की कोई बूँद तक दिखाई न दे। और वानरों के साथ यही घट रहा था। उन्हें लग रहा था, कि माता सीता जी को खोजना कौन-सी बड़ी बात है। हम इतने वानर हैं, दसों दिशाओं में अपने लक्ष्य को लेकर सब तत्पर हैं। तो माता सीता जी को तो हम यूं ही चुटकी में ढूंढ़ लेंगे। एक माह क्या, एक सप्ताह भी नहीं लगने वाला।


लेकिन सज्जनों हुआ इसके बिल्कुल विपरीत। जिन श्रीसीता जी को ढूंढ़ने के लिए सबने आरम्भ में ही इतना प्रयास व बल लगा दिया, कि यूं मान लिया गया था, कि बस अब कुछ ही क्षणों में अपने लक्ष्य पर पहुंच ही जायेंगे। वही लक्ष्य अब सबको दूर की कौड़ी प्रतीत होने लगा था। श्रीसीता जी का मिलना तो दूर, उनकी परछाई तक की सुधि किसी को नहीं मिल पा रही थी। ऐसे में एक तो, जो भी बल व सामर्थ्य था, वह प्रयोग में ले लिया गया था। और दूसरे थकान व प्यास ने ऐसा घेरा था, कि सभी मृतक समान महसूस कर रहे थे। ऐसे में किसी भी वानर साधक से क्या आशा की जा सकती थी। परिणाम यह हुआ कि सभी हतोत्साहित होकर नीचे बैठ गए।

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आध्यात्मिक यात्रा का यही सबसे दुखद पहलु है कि साधक जब अपनी इस पावन यात्रा को आरम्भ करता है, तो पूरे उत्साह व समर्पित भाव से करता है। और यही मानकर करता है, कि अपना लक्ष्य बस चुटकी में ही पाकर निवृत्त हो जायेंगे। लेकिन तनकि-सी बाधा क्या आई, सारा उत्साह व लगन, धरी की धरी रह जाती है। और अधिकतर साधक अपनी इस यात्रा को बीच में ही छोड़कर वापस लौट पड़ते हैं। निःसंदेह यही वह पड़ाव होता है, जब आगे बढ़ते गए, तो परमपद आपकी राह देख रहा होता है। और पीछे मुड़ गए, तो अधोगति का खाई तो फिर तैयार ही है। वानर भी शायद यहाँ वापस लौटने का निर्णय कर बैठते। लेकिन वापसी पर तो मृत्य निश्चित ही थी। क्योंकि सुग्रीव ने यह घोषणा पहले ही कर रखी थी, कि जो भी वानर बिना श्रीसीता जी की खोज के वापिस लौटा, उसका वध, मैं स्वयं अपने हाथों से करूँगा। वानर बेचारे क्या करते, आगे जीवन की समस्त कलियां मुरझाई प्रतीत हो रही थीं। और पीछे सुग्रीव साक्षात मृत्यु बनकर खड़ा था। ऐसे में मरता क्या न करता। कुछ तो करना ही था, लेकिन क्या करते, यही तो निर्णय नहीं हो रहा था। वानरों की ऐसी स्थिति देख श्रीहनुमान जी ने अनुमान लगाया कि सभी वानर अब प्राण त्यागने का प्रण लेने ही वाले हैं-


‘मन हनुमान कीन्ह अनुमाना। 

मरन चहत सब बिनु जल पाना’ 


ऐसे में तो घोर अनर्थ हो जायेगा। अब मुझे अवश्य ही कुछ उपाय करना चाहिए। ताकि सभी वानर भाईयों की पीड़ा का हरण किया जा सके। तभी श्रीहनुमान जी ‘एक्शन’ में आते हैं, और---!

श्रीहनुमान जी क्या कदम उठाते हैं, जानेंगे अगले अंक में...(क्रमशः)...जय श्रीराम...!


-सुखी भारती

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