आत्मा से सम्बद्ध उदगार (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Apr 04, 2026

सठियाने नहीं बलिक सत्तरियाने यानी सत्तर साल का होने के बाद मुझे विश्वास हो चला है कि आत्माएं कई प्रकार की होती हैं। साठ साल तक मैं ऐसा नहीं मानता था। अब धर्म का प्रभाव भी बढ़ रहा है, शायद इसका भी कुछ तो असर होगा ही। मैंने यह मानना शुरू कर दिया है कि आत्मा की आवाजें भी होती हैं जो अलग अलग किस्म की होने के कारण तरह तरह के प्रभाव लिए होती हैं। मिसाल के तौर पर सादी, सरल व सभ्य आत्मा की आवाज़ दबी दबी मरियल सी होती है और आम तौर पर अनसुनी की जाती है। आम आत्मा शरीर छोड़ जाए तो जान पहचान के लोग दुनिया की प्रसिद्ध किताब फेसबुक में आरआईपी यानी ‘आत्माजी, स्वर्ग में शांति से रहना’ लिखकर अपना कर्तव्य निभाते हैं। 

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ऐसी आवाजों से यह ज्ञान भी प्राप्त होता है कि जीवित शरीर में आत्मा कभी चैन से नहीं रहती। भला जो आत्मा दुनियावी मसलों में, हाड़मांस के पुतले इंसान को ऐसे, वैसे न जाने कैसे कैसे गलत परामर्श दे रही हो, उसे निवृत होने के बाद तो नरक में ही जाना पडेगा न। उसे स्वर्ग में आसानी से अस्थायी सीट भी मिलने का सवाल पैदा नहीं होता। यह बात आम इंसान नहीं समझता तभी तो आत्मा के शरीर छोड़ने के अप्रत्याशित अवसर पर फेसबुक पर ‘लाइक’ का बटन भी दबा देता है, यह मानते हुए कि अमुक आत्मा  इस नश्वर संसार के जंजाल से छूट गई है। वास्तव में बेचारी ज़्यादातर आत्माएं, इंसान की गलत करतूतों के कारण नरक में जाकर, निश्चित ही भांति भांति के कष्ट भोग रही होती हैं और इधर ज़्यादातर लोग यही कामना कर रहे होते हैं कि आत्मा को शांति मिले, स्वर्ग में आत्मा शांति से रहे। 

कुछ आत्माओं को महान घोषित किए जाने की राष्ट्रीय परम्परा भी है। जीवित बंदे शारीरिक मोह से छूट चुकी आत्माओं को झूठे ख़्वाब दिखा रहे होते हैं जबकि आत्मा इन तुच्छ विचारों से दूर शांत ही रहती हैं। छोटे छोटे स्वार्थों की गिरफ्त में फंसा आदमी, आत्मा को किसी महंगी चीज़ का टुकडा समझता है जिसे नरक में नहीं स्वर्ग में ही रखा जाना चाहिए। जब आत्मा, नश्वर शरीर में कुलबुला रही होती है, हम उसकी आवाज़ दबाते फिरते हैं और बाद में आत्मा की अंतरात्मा की ईमानदार आवाजें सुनने और सुनाने की कोशिशें करते रहते हैं।

- संतोष उत्सुक

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