By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Oct 26, 2026
अपनी कोई बहन नहीं होने के दर्द को एक शख्स ने इस तरह समाजसेवा में बदला कि आज वह 184 लड़कियों का ‘भाई’ बन चुका है। उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में कारोबारी विनय अग्रवाल अपने संसाधनों से हर साल निर्धन परिवारों की बेटियों की शादी कराते हैं। उनके इस अनूठे प्रयास में न जाति की दीवार आड़े आती है और न ही मजहब का फर्क।
समारोह में एक ओर वैदिक मंत्र गूंजे तो दूसरी ओर इस्लामी आयतों के साथ निकाह की रस्में पूरी हुईं। अग्रवाल ने सोमवार को ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि उनकी कोई सगी बहन नहीं है और उन्हें हमेशा बहनों की कमी खलती थी और इसी भाव ने उन्हें जरूरतमंद परिवारों की बेटियों की शादी में मदद करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने बताया कि शुरुआत में वह ‘बिन बुलाए मेहमान’ की तरह शादियों में पहुंचकर सहयोग करते थे लेकिन बाद में उनकी मां सरोज अग्रवाल की सलाह पर उन्होंने सामूहिक विवाह का आयोजन शुरू किया।
पहले 11, फिर 21 और 51 और अब 101 कन्याओं की शादी कराने तक पहुंचे इस सिलसिले को आगे और बड़ा करने का उनका इरादा है। अग्रवाल के मुताबिक, उनके दिवंगत पिता अशोक अग्रवाल का जन्मदिन रामनवमी के आसपास पड़ता है और इसी दौरान वह हर साल सामूहिक विवाह का आयोजन करते हैं। उन्होंने बताया कि विवाह से करीब दो महीने पहले गांवों में बैठक कर आवेदन मांगे जाते हैं और इस बार लगभग 200 आवेदन आए थे।
अग्रवाल ने बताया कि इस बार भी जरूरतमंद परिवारों की पहचान के लिए तीन चरणों में जांच कराई गई और उसके बाद 101 कन्याओं का चयन किया गया। इस समारोह की खासियत सिर्फ विवाह की रस्में नहीं, बल्कि बेटियों के नए घर को बसाने की तैयारी भी थी। स्थानीय लोगों के मुताबिक सभी कन्याओं को ब्यूटी पार्लर में सजाया गया और वर-वधुओं को 101 कारों में विवाह स्थल तक लाया गया।
साथ ही शादी के बाद प्रत्येक जोड़े को टेलीविजन, फ्रिज, वाशिंग मशीन, पलंग, अलमारी और दैनिक जरूरत का सामान उपहार में दिया गया ताकि नई गृहस्थी शुरू करने में उन्हें आर्थिक दिक्कतों का सामना न करना पड़े। इस पूरे आयोजन में अग्रवाल की पत्नी श्वेता, भाई कुणाल, भाभी नेहा और मां सरोज ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। परिवार के सदस्य विवाह की रस्मों से लेकर व्यवस्थाओं तक में जुटे रहे।
स्थानीय लोगों के मुताबिक ऐसा लग रहा था मानो परिवार अपनी ही बेटियों का विवाह कर रहा हो। समारोह में शामिल मुस्कान (24) की कहानी इस आयोजन के मानवीय पक्ष को सामने लाती है। उसके भाई शाहिद ने बताया कि उनके पिता रिक्शा चलाते हैं और मां एक पान की दुकान चलाती हैं, लिहाजा परिवार के लिए दो वक्त के भोजन का इंतजाम करना भी मुश्किल होता है, ऐसे में बहन की शादी के लिए कर्ज लेना उनकी मजबूरी बन सकता था।
शाहिद ने कहा, “हमारी बहन की शादी इस समारोह में बड़ी धूमधाम से हो रही है। यह अल्लाह का करम है।” जमुका गांव की पूजा के लिए यह दिन एक और मायने में खास था। दोनों पैरों से दिव्यांग पूजा की शादी रामनिवास से तय हुई थी, जो खुद भी दिव्यांग है।
पूजा ने बताया कि उसके और रामनिवास के पास न खेती है और न ही कमाई का कोई नियमित साधन। उसने बताया कि सीमित संसाधनों में गुजर-बसर करने वाले इस जोड़े के लिए विवाह और गृहस्थी की शुरुआत बड़ी चुनौती थी लेकिन सामूहिक विवाह समारोह में शादी संपन्न होने के बाद दोनों परिवार खुश हैं। अग्रवाल ने बताया कि इस आयोजन के लिए वह किसी से आर्थिक सहयोग नहीं लेते।
उन्होंने बताया कि पहले कुछ लोगों ने मदद की पेशकश की थी लेकिन उन्होंने उनसे यह कहते हुए मना कर दिया कि वे लोग मदद करने के बजाय जरूरतमंद लड़कियों की शादी कराएं। शहर के चिकित्सक और समाजसेवी डॉक्टर सत्य प्रकाश मिश्रा ने कहा कि यह अहम बात है कि 101 बेटियों का विवाह पूरे पारिवारिक माहौल में और जरूरत का सामान देकर कराया गया। उन्होंने कहा कि समाज के अन्य लोगों को भी ऐसे प्रयास करने चाहिए।