'मौत से नहीं डरती', कह कर Bangladesh लौटने का ऐलान करने वाली Sheikh Hasina ने ढाका की राजनीति में खड़ा किया तूफान

By नीरज कुमार दुबे | Jun 29, 2026

भारत में निर्वासन का जीवन बिता रहीं बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने भले ही यह घोषणा की हो कि वह इसी वर्ष अपने देश लौटेंगी और उन्हें मृत्यु का कोई भय नहीं है, लेकिन बांग्लादेश की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियां यह संकेत दे रही हैं कि वहां उनकी प्रतीक्षा केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं बल्कि संभवतः मृत्यु भी कर रही है। वर्ष 2024 में सत्ता से बेदखल होने के बाद से उनके खिलाफ मानवता विरोधी अपराधों के कई मामले दर्ज किए गए हैं और उन्हें मृत्युदंड तक सुनाया जा चुका है। ऐसे माहौल में उनकी वापसी केवल एक राजनीतिक घटना नहीं बल्कि बांग्लादेश की सत्ता, न्याय व्यवस्था और प्रतिशोध की राजनीति की सबसे बड़ी परीक्षा बन सकती है।

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साथ ही शेख हसीना ने अपनी पार्टी अवामी लीग को केवल एक संगठन नहीं बल्कि एक शक्ति बताया। उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यकों पर हमला दरअसल बांग्लादेश की स्वतंत्रता की भावना पर हमला है। उन्होंने कहा कि देश में लोकतंत्र कमजोर हो चुका है, कानून व्यवस्था समाप्त हो रही है, अर्थव्यवस्था संकट में है और उग्रवाद तेजी से फैल रहा है। उन्होंने वर्तमान तारीक रहमान नेतृत्व वाली सरकार तथा पूर्ववर्ती मोहम्मद यूनुस के अंतरिम शासन पर भी तीखा हमला बोला। उनका कहना था कि देश में आम लोगों के राजनीतिक अधिकारों का हनन हो रहा है।

शेख हसीना ने अपने ऊपर चल रहे मामलों और संभावित मृत्युदंड को भी राजनीतिक साजिश बताया। हम आपको बता दें कि उनके खिलाफ मानवता विरोधी अपराधों के कई मामले चल रहे हैं और अदालत से उन्हें मृत्युदंड की सजा भी सुनाई जा चुकी है। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि यह पूरी प्रक्रिया अवैध, असंवैधानिक और राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित है। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने जीवन में पहले भी अनेक षड्यंत्रों और हमलों का सामना किया है। वर्ष 1975 में उन्होंने अपने माता पिता, भाइयों और लगभग पूरे परिवार को खो दिया था। इसके अलावा उन पर ग्रेनेड हमला भी हुआ, लेकिन हर कठिन परिस्थिति से निकलकर वह जनता के साथ खड़ी रहीं।

शेख हसीना के इस बयान के बाद बांग्लादेश की राजनीति में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। सत्तारुढ़ बीएनपी और विपक्षी जमात-ए-इस्लामी के नेताओं ने उनके दावों को राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश बताया है। उनका कहना है कि शेख हसीना अपने समर्थकों को सक्रिय कर वर्तमान राजनीतिक स्थिति को अस्थिर करना चाहती हैं। बीएनपी से जुड़े एक सूत्र ने कहा कि सरकार को उनके बयानों से कोई चिंता नहीं है क्योंकि वर्तमान सरकार को भारी जनसमर्थन प्राप्त है और जनता उसके साथ खड़ी है।

दूसरी ओर, हाल के महीनों में ढाका के राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेज हुई है कि प्रतिबंधित अवामी लीग ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में फिर से सक्रिय हो रही है। इसी कथित पुनरुत्थान के कारण तारीक रहमान सरकार ने अवामी लीग के सदस्यों को स्थानीय चुनावों में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में भाग लेने की अनुमति दी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम बांग्लादेश की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों का संकेत है। जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख एटीएम अजहरुल इस्लाम ने भी इस मुद्दे पर बीएनपी की भूमिका पर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि क्या बीएनपी अवामी लीग को फिर से स्थापित करने की कोशिश कर रही है।

हम आपको बता दें कि बांग्लादेश की राजनीति लंबे समय से तीव्र ध्रुवीकरण, प्रतिशोध और कठोर दमन के लिए जानी जाती रही है। वहां सत्ता परिवर्तन के बाद राजनीतिक विरोधियों पर मुकदमे, गिरफ्तारी, निर्वासन और कई मामलों में मृत्युदंड तक की घटनाएं सामने आती रही हैं। इस समय पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना और उनकी अवामी लीग के खिलाफ व्यापक कार्रवाई का दौर चल रहा है। वर्ष 2025 में शेख हसीना को मानवता विरोधी अपराधों के मामले में मृत्युदंड सुनाया गया। उनके अनेक सहयोगियों पर भी मुकदमे चल रहे हैं। सरकार ने अवामी लीग की गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा दिया था और उसके हजारों समर्थकों को जेलों में रखा गया है।

यदि शेख हसीना वास्तव में बांग्लादेश लौटती हैं तो सबसे पहले उन्हें तत्काल गिरफ्तार किए जाने की संभावना प्रबल मानी जा रही है। चूंकि उनके खिलाफ मृत्युदंड सहित कई फैसले पहले से मौजूद हैं, इसलिए सरकार उन पर कानूनी कार्रवाई को तेज कर सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनकी वापसी देश में भारी तनाव पैदा कर सकती है, क्योंकि अवामी लीग अब भी ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में प्रभाव रखती है। उनकी गिरफ्तारी या कठोर दंड से उनके समर्थकों में व्यापक विरोध प्रदर्शन और हिंसक टकराव की स्थिति बन सकती है। दूसरी ओर यदि सरकार उन्हें खुली राजनीतिक गतिविधि की अनुमति देती है, तो अवामी लीग फिर से मजबूत होकर सत्ता संतुलन बदल सकती है। यही कारण है कि वर्तमान सत्ता पक्ष उनकी वापसी को राजनीतिक और सुरक्षा चुनौती के रूप में भी देख रहा है।

हम आपको यह भी बता दें कि बांग्लादेश में राजनीतिक विरोधियों को मृत्युदंड दिए जाने के उदाहरण पहले भी मौजूद हैं। हालिया समय के उदाहरणों पर ही गौर करें तो आपको बता दें कि वर्ष 2013 से 2016 के बीच जमात-ए-इस्लामी के कई शीर्ष नेताओं को 1971 के मुक्ति युद्ध के दौरान मानवता विरोधी अपराधों के आरोप में फांसी दी गई थी। इनमें अब्दुल कादिर मोल्ला, अली अहसान मुजाहिद, सलाहुद्दीन कादर चौधरी और मतीउर रहमान निजामी जैसे प्रमुख नेता शामिल थे। इन सजाओं को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बहस हुई थी और मानवाधिकार संगठनों ने न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाए थे। अब शेख हसीना के खिलाफ भी उसी प्रकार की कठोर कार्रवाई ने यह संकेत दिया है कि बांग्लादेश की राजनीति में प्रतिद्वंद्विता अक्सर कानूनी संघर्ष से आगे जाकर अस्तित्व की लड़ाई का रूप ले लेती है।

बहरहाल, शेख हसीना के बयानों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बांग्लादेश की राजनीति अभी भी गहरे विभाजन और अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है। एक ओर निर्वासन में रह रही पूर्व प्रधानमंत्री अपने समर्थकों को संगठित करने में जुटी हैं, वहीं दूसरी ओर वर्तमान सत्ता पक्ष उनके प्रभाव को सीमित रखने का प्रयास कर रहा है। आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि शेख हसीना वास्तव में बांग्लादेश लौट पाती हैं या नहीं और उनका यह कदम वहां की राजनीति को किस दिशा में ले जाता है।

-नीरज कुमार दुबे

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