By अजय कुमार | Mar 11, 2024
समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश की बदायूं लोकसभा सीट को लेकर गफलत में नजर आ रही है। चर्चा है कि एक बार फिर सपा आलाकमान ने वहां से शिवपाल यादव की उम्मीदवारी खारिज कर दी है। शिवपाल स्वयं चुनाव नहीं लड़ना चाह रहे थे या फिर यह पार्टी आलाकमान का फैसला है इस पर अभी स्थिति साफ नहीं हो पाई है। लोकसभा चुनाव को लेकर बदायूं में सपा की सियासी करवट पर सपा के दिग्गजों में हर स्तर पर दो तरह की राय सामने आईं हैं। एक बड़ा वर्ग बदायूं से सांसद रहे धर्मेंद्र यादव को फिर से उम्मीदवार बनाना चाहता है, जबकि सपा के ही कुछ नेता धर्मेंद्र यादव से नाराज बताये जाते हैं। वह उनको न लड़ाए जाने का आग्रह पिछले दिनों सपा मुखिया अखिलेश यादव से भी कर चुके हैं। इसके बाद ही धर्मेंद्र यादव के स्थान पर शिवपाल सिंह यादव का नाम आया था। अब सपा के सूत्रों का कहना है कि खुद शिवपाल सिंह यादव बदायूं से चुनाव लड़ने के लिए उत्साहित नहीं हैं।
गौरतलब है कि बदायूं मुस्लिम और यादव बहुल सीट है। इसी समीकरण से किसी समय यह सपा की मजबूत सीट मानी जाती थी, लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के चचेरे भाई और सांसद रहे धर्मेंद्र यादव को शिकस्त देने के लिए संघमित्रा मौर्य को मैदान में उतारा था। भाजपा प्रत्याशी से धर्मेंद्र यादव हार गए थे। चुनाव के बाद सियासी घटनाक्रम बदलता रहा। संघ मित्रा के पिता स्वामी प्रसाद मौर्य सपा में रहे। सपा में रहते केंद्र व प्रदेश सरकार पर जमकर सियासी हमले किए। तब से भाजपा के अंदर उनकी बेटी के टिकट लेकर संशय हो गया है। पहली लिस्ट में नाम न आने पर संशय और बढ़ा है।
स्वामी प्रसाद मौर्य के सपा से नाता तोड़ने के बाद सपा आलाकमान बदायूं सीट को लेकर काफी गंभीर हो गया है। इस सीट को सपा ने अपने पाले में करने के लिए शिवपाल सिंह यादव को मैदान में उतारा है। यह अलग बात है कि शिवपाल सिंह के आने के बाद पूर्व केंद्रीय मंत्री सलीम इकबाल शेरवानी और सपा केराष्ट्रीय सचिव रहे आबिद रजा की चुनौती सामने आई है। दोनों ने सेक्युलर फ्रंट बनाकर सहसवान में बड़ी रैली की। इसके बाद सपा के लिए बड़ी चुनौती सामने आ रही है। पार्टी बदायूं में जिस तरह से अंतरकलह से जूझ रही है, उससे लगता है कि सपा के लिये यहां चुनाव जीतना थोड़ा मुश्किल हो सकता है।
-अजय कुमार