गोली लगी फिर भी झंडा नहीं छोड़ा...वो महिलाएं जिन्होंने तिरंगे के लिए सब दांव पर लगा दिया

By अभिनय आकाश | Aug 15, 2026

घायल पति के हाथ पर कपड़े की पट्टी बाँध, हाथों में तिरंगा थामे वे निडर होकर आगे बढ़ीं। उनकी आँखों के आक्रोश ने अंग्रेज़ अफ़सरों को भयभीत कर दिया और उन्होंने बेखौफ होकर तिरंगा फहराया। आज़ादी के इस संघर्ष में उषा मेहता का त्याग भी अविस्मरणीय है, जिन्हें 4 साल तक जेल में अमानवीय यातनाएँ दी गईं, लेकिन हर ज़ुल्म के बदले उन्होंने केवल एक नारा दिया "अंग्रेज़ों भारत छोड़ो"। गुप्त रूप से आंदोलन की कमान सँभालने वाली अरुणा आसफ़ अली जैसी वीरांगनाओं के नाम भले ही इतिहास के पन्नों में कम सुनाई दें, लेकिन उनका योगदान ही स्वतंत्र भारत का वास्तविक आधार है।

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अरुणा आसफ अली

अन्य महिला सह-कैदियों ने परिसर छोड़ने से इनकार कर दिया जब तक कि उन्हें भी रिहा नहीं किया गया। महात्मा गांधी के हस्तक्षेप के बाद ही अंदर दिया गया। बाद में  महात्मा गांधी के हस्तक्षेप के बाद ही उन्हें छोड़ दिया गया।भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक अविस्मरणीय दिन। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की अध्यक्षता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन बॉम्बे के गोवालिया टैंक मैदान में हुआ। सम्मेलन ने भारत छोड़ो संघर्ष शुरू करने का एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया। महात्मा गांधी ने दिया स्पष्ट आह्वान; करो या मरो और तब तक आराम मत करो जब तक अंग्रेज भारत छोड़ नहीं देते। गांधी के भाषण के बाद, एक 33 वर्षीय महिला ने भारतीय तिरंगा फहराया, जिस पर तब प्रतिबंध लगा दिया गया था। वीर महिला थी अरुणा आसफ अली। जिन्हें अगस्त क्रांति की रानी भी कहा जाता है। पंजाब के कालका में एक प्रमुख ब्रह्म समाजी बंगाली ब्राह्मण परिवार में जन्मी अरुणा गांगुली कॉलेज में पढ़ाई के दौरान ही स्वतंत्रता आंदोलन में दिलचस्पी बढ़ी। नमक सत्याग्रह में भाग लेने के कारण अरुणा को गिरफ्तार किया गया।

उषा मेहता

जन्म 25 मार्च 1920 को गुजरात में हुआ। बचपन से ही गांधीवादी विचारों से जुड़ी रही। सिर्फ 8 साल की उम्र में उन्होंने पहला विरोध प्रदर्शन देखा था। 1942 में उषा महज 22 साल की थी जब वो भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़ी। पढ़ाई छोड़ दी। फिर कारनामा कर दिखाया। कारनामे का नाम कांग्रेस रेडियो। एक सीक्रेट रेडियो स्टेशन। 14 अगस्त 1942 को उषा मेहता ने अपने साथियों के साथ इसकी शुरुआत की। यह रेडियो स्टेशन महात्मा गांधी के संदेश, देशभक्ति के गाने और आंदोलन की खबरें चलाता था। उस दौर में जब अंग्रेजी सरकार हर खबर पर सेंसर लगा रही थी। यह रेडियो लोगों की उम्मीद की आखिरी किरण बना। पुलिस महीनों तक इस रेडियो के संचालक को ढूंढती रही। आखिरकार पकड़ी गई। जेल में टॉर्चर किया गया। उनसे राम मनोहर लोहिया का पता मांगा जा रहा था। रिहाई का लालच भी दिया गया। लेकिन उषा ने कुछ नहीं बताया। लगभग 4 साल जेल में रही। बाद में लोग उन्हें प्यार से रेडियो बेन कहने लगे। 

मातंगिनी हजरा

मातंगिनी को गांधी बुढ़ी के नाम से भी जाना जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि मातंगिनी हाजरा एक कट्टर गांधी अनुयायी थीं। वह स्वयं महात्मा से प्रेरित होकर स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हुईं। उनकी तरह, उन्होंने सभी विदेशी वस्तुओं को अस्वीकार कर दिया और सूत काता। गांव में मानवीय कार्यों के लिए लोग अक्सर उन्हें याद करते थे। महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन में उनकी जोरदार भागीदारी ने उन्हें पुलिस बैरक में बदनाम कर दिया, खासकर नमक सत्याग्रह आंदोलन में उनकी भूमिका के कारण। उन्होंने अलीनान नमक बनाने वाली फैक्ट्री में नमक बनाया। अलीनान उनके दिवंगत पति का गांव है। इससे उसकी गिरफ्तारी हुई और लोगों ने एक नाजुक बूढ़ी औरत को उसके चेहरे पर एक भी शिकन के बिना कई मील तक चलते देखा। उसे तुरंत रिहा कर दिया गया। बंगाली में गांधी बरी का मतलब बूढ़ी औरत गांधी होता है। स्वतंत्रता संग्राम के गांधीवादी सिद्धांतों का पालन करने के प्रति उनके समर्पण के कारण स्थानीय लोग उन्हें बुढ़िया गांधी कहते थे। उनकी गिरफ्तारी उन्हें स्वतंत्रता संग्राम में योगदान देने से नहीं रोक सकी। अगस्त 1942 में स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने 73 वर्षीय मातंगिनी हाजरा के नेतृत्व में मेदिनीपुर जिले के विभिन्न पुलिस स्टेशनों और सरकारी कार्यालयों के पास विरोध प्रदर्शन करने की योजना बनाई।एक विरोध प्रदर्शन के लिए मातंगिनी हाजरा लगभग पांच हजार लोगों के साथ सरकारी डाक बंगले पर पहुंच गई। पुलिस ने आईपीसी की धारा 144 का हवाला देकर जुलूस को रोकने की कोशिश की। पुलिसकर्मियों से गोली न चलाने की अपील की गई। बदले में अंग्रेजों ने 73 साल की मातंगिनी हाजरा को गोलियों से छलनी कर दिया। पहली गोली मातंगिनी हाजरा के कंधे पर लगी, लेकिन वह झंडा ऊंचा उठाए हुए आगे बढ़ती रही। अगली गोली चलाई गई, और वह उसके माथे में लगी और उसकी जान चली गई। उन्होंने मरते दम तक तिरंगे को नहीं गिरने दिया। उनके मुंह से वंदे मातरम निकलता रहा। 

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