पटरी पर वापस लौट रही है अर्थव्यवस्था, पर मंजिल तक पहुँचने का सफर लंबा है

By ललित गर्ग | Nov 06, 2020

कोरोना वायरस के संक्रमण से जुड़ी खबरों ने फिलहाल थोड़ी राहत भले ही दी है, लेकिन खतरा टला नहीं है, इसके संकेत भी साफ हैं। जहां तक समाज एवं अर्थव्यवस्था पर पड़े इसके असर का मामला है, अभी इन सबसे उबरने में काफी समय लग सकता है। विशेषतः भारत की अर्थव्यवस्था तो पहले से अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए जूझ रही थी, कोरोना महामारी ने उसे और गहरे घाव दिये हैं। भारत की स्थिति ज्यादा खराब होने का कारण यहां खूब संक्रमण हुआ और बहुत कड़े लॉकडाउन की वजह से अर्थव्यवस्था अपंग हो गई है। सरकार एवं नीति-नियंता शायद सार्वजनिक रूप से इसी स्वीकार नहीं करेंगे, लेकिन यही कठोर वास्तविकता है।

दुनियाभर में यह कटु सच्चाई है कि नीति नियंताओं को वास्तव में नहीं पता कि उन्हें क्या करना है। भारत में अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिये भी ऐसी ही स्थिति है। फिर भी भारत की वर्तमान अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने के लिये अन्यान्य प्रयत्नों के साथ चार मुख्य बिन्दु हैं- गरीबी को मिटाना, जनसंख्या की वृद्धि को रोकना, पर्यावरण में सुधार करना एवं बेरोजगारी का उन्मूलन करना। ऐसा लगता है- गरीबी और जनसंख्या में भी कोई निकट का संबंध है। गरीब के संतान ज्यादा होती है क्योंकि कुपोषण में आबादी ज्यादा बढ़ती है। विकसित राष्ट्रों में आबादी की बढ़त का अनुपात कम है, अविकसित और निर्धन राष्ट्रों में आबादी की बढ़त का अनुपात ज्यादा है। प्राचीन संस्कृत साहित्य में एक प्रसंग आता है- दरिद्रता दुखतर है और उसके साथ जुड़ा दुख है संतान का आधिक्य। दारिद्रता की पीड़ा और संतति के आधिक्य की पीड़ा- दोनों ओर से आदमी पीड़ित होता है। जनसंख्या-वृद्धि के अनेक कारण हो सकते हैं, किन्तु कालखण्ड का प्रभाव और कुपोषण-ये दोनों जनसंख्या वृद्धि के सबसे प्रमुख कारण बनते हैं। विश्व की सारी संपदा, सारे संसाधन गरीबी को मिटाने में लगते तो आज स्थिति बहुत भिन्न होती, किन्तु बीच में व्यवधान आ गए। कोरोना का व्यवधान भी गरीबी मिटाने की दिशा में गति का एक बड़ा अवरोध है। अब तक सम्पदा का उपयोग मानव को सुखी या सामान्य बनाने की दिशा में नहीं हुआ, बल्कि संहारक अस्त्रों के निर्माण में हुआ। एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र से भयभीत हो गया। शस्त्रों की होड़ सी लग गई। यू.एन.ओ. की एक रिपोर्ट के आंकड़ों को देखें तो पता चलेगा कि अर्थशक्ति और संसाधन किस दिशा में लग रहे हैं। दुनिया का अधिकांश अर्थ प्रतिवर्ष सुरक्षा पर व्यय हो रहा है। मानव की सुरक्षा के लिए नहीं, अपनी भौगोलिक सुरक्षा के लिए यह व्यय किया जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र सतत विकास लक्ष्य में यह बताया गया है कि किसी एक विशेष कारण के चलते नहीं बल्कि विभिन्न कारणों की वजह से लोगों को गरीबी में जीवन व्यापन करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। इसलिए यह आवश्यक है कि केवल आय का स्रोत एवं आमदनी ही गरीबी का कारण नहीं है बल्कि भोजन, घर, भूमि, स्वास्थ्य, सुरक्षा आदि भी गरीबी के निर्धारण में भूमिका निभाते हैं।

इसे भी पढ़ें: अँधेरा छँटा, सूरज उगा... भारतीय अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में हो रही है तेज वृद्धि

भारत में गरीबी का मुख्य कारण बढ़ती जनसंख्या, कमजोर कृषि, भ्रष्टाचार, रूढ़िवादी सोच, जातिवाद, अमीर गरीब में ऊंच-नीच, नौकरी की कमी, अशिक्षा, बीमारी आदि है। भारत एक कृषि प्रधान देश है जिसकी एक बड़ी जनसंख्या कृषि पर निर्भर है, आज देश के यही किसान गरीबी की मार झेल रहे हैं। खराब कृषि और बेरोजगारी की वजह से लोगों को भोजन की कमी से जूझना पड़ता है। यही कारण है कि महंगाई ने भी पंख फैला रखे हैं। बढ़ती जनसंख्या भी गरीबी का एक प्रमुख कारण है।

केंद्र सरकार ने वर्ष 2012 में बताया कि भारत में 21.9 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से नीचे रहती है। विश्व बैंक की वर्ष 2011 रिपोर्ट में कहा गया कि भारत की 23.6 प्रतिशत जनसंख्या (लगभग 276 मिलियन) की प्रतिदिन क्रय शक्ति 1.25 डॉलर प्रतिदिन है। इसके अतिरिक्त 2016 में जारी अंतरराष्ट्रीय भुखमरी सूचकांक में भारत को 97वां स्थान मिला है। इसमें विकासशील देशों के लिए औसत दर 21.3 रखी गयी थी जबकि भारत की यह दर 28.5 प्रतिशत थी। गरीबी उन्मूलन की दिशा में योगदान देने के लिए भारतीय मूल के अभिजीत बनर्जी का नोबेल पुरस्कार हेतु चयनित होना सुखद है। लेकिन दुखद पहलू यह है कि उनके ही देश के अधिकत्तर लोग गरीबी भरा जीवन जीने को विवश हैं।

भारत लंबे समय से गरीबी का दंश झेल रहा है। स्वतंत्रता पूर्व से लेकर स्वतंत्रता पश्चात भी देश में गरीबी का आलम पसरा हुआ है। गरीबी उन्मूलन के लिए अब तक कई योजनाएं बनीं, कई प्रयास हुए, गरीबी हटाओ चुनावी नारा बना और चुनाव में जीत हासिल की गई। लेकिन इन सबके बाद भी न तो गरीब की स्थिति में सुधार हुआ और न गरीबी का खात्मा हो पाया। सच्चाई यह है कि गरीबी मिटने की बजाय देश में दिनोंदिन गरीबों की संख्या में बढ़ावा हो रहा है। सत्ता हथियाने के लिए गरीब को वोटबैंक के रूप में इस्तेमाल किया गया तो सत्ता मिलने के बाद उसे हमेशा के लिए अपने हाल पर छोड़ दिया गया। इसलिए गरीब आज भी वहीं खड़ा है जहां आजादी से पहले था। आज भी सवेरे की पहली किरण के साथ ही गरीब के सामने रोटी, कपड़ा और मकान का संकट खड़ा हो जाता है। दरअसल, यह कम विडंबना नहीं है कि सोने की चिड़िया के नाम से पहचाने जाने वाले देश का भविष्य आज गरीबी के कारण भूखा और नंगा दो जून की रोटी के जुगाड़ में दरबदर की ठोकरें खा रहा है। नरेन्द्र मोदी सरकार की गरीबी उन्मूलन एवं जनसंख्या नियंत्रण की योजनाओं से कुछ उजाला होता हुआ दिख रहा है।

-ललित गर्ग

(लेखक, पत्रकार, स्तंभकार)

प्रमुख खबरें

Tech कंपनी में बड़ा फेरबदल: Layoffs के बाद Hillary Maxson बनीं नई CFO, AI पर होगा बड़ा निवेश

Aviation Sector से MSME तक को मिलेगी Oxygen, सरकार ला रही नई Loan Guarantee Scheme

Air India के Top Level पर बड़ा फेरबदल, CEO Campbell Wilson का इस्तीफा, नए बॉस की तलाश तेज

Candidates Tournament: Tan Zhongyi की एक गलती पड़ी भारी, Vaishali ने मौके को जीत में बदला